आध्यात्मिक होने का अर्थ है, समय से पहले अपने ग़ुब्बारे को फोड़ देना

आध्यात्मिक होने का अर्थ है, समय से पहले अपने ग़ुब्बारे को फोड़ देना। आपने देखा की, एक गुब्बारा जो शुरू में हवा से पूरा भरा हुआ होता है, वही ग़ुब्बारा कुछ समय के बाद स्वतः ही पिचक जाता है यानी की बिना कुछ किये उस ग़ुब्बारे की सारी हवा निकल जाती है। अब ऐसा इसलिए होता है क्योंकि समय के साथ उस ग़ुब्बारे की हवा भी धीरे धीरे रिसती है और एक समय आता है जब उसकी हवा पूरी निकल जाती है। अब यह एक तरीक़ा है ग़ुब्बारे की हवा के निकलने का। और, दूसरा तरीक़ा है की आप उस ग़ुब्बारे को स्वयं फोड़ दें, बजाय इसके की उसे समय के भरोसे पर छोड़ें। तो पहला तरीक़ा है, प्राकृतिक और दूसरा तरीक़ा है, आपके अपने प्रयासों से उसकी हवा को निकाल देना।

अध्यात्म का मतलब भी कुछ ऐसा ही है। आध्यात्मिक होने का मतलब है समय से पहले अपने प्रयासों से इस शरीर रूपी ग़ुब्बारे को फोड़ कर इसकी हवा को निकाल देना। यह जो शरीर आप देखते हैं वह और कुछ नहीं बल्कि एक ग़ुब्बारा ही है जिसमें अस्तित्व की यह ऊर्जा यानी की चेतना क़ैद है, इस शरीर से बँधी हुई है। चेतना हमारी ही नहीं बल्कि जो भी यहाँ दिखाई देता है उस सभी की वास्तविकता है।

अब जो सामान्यतः हमे देखने को मिलता है और जो प्रकृति का एक रास्ता भी है, वह है इस ऊर्जा का धीरे-धीरे एक समयावधि के साथ इस शरीर से निकल जाना। इस सामान्य तरीक़े को प्रारब्ध द्वारा अपने कर्मों को चुकता करना भी कहा गया है जो हम एक ज़िंदगी यानी की इस शरीर से पूरा करते है। प्रारब्ध के खर्च के साथ ही इस ऊर्जा का खर्च भी होता है और एक समय आता है जब प्रारब्ध के पूरा होने के साथ ही यह ऊर्जा भी पूरी हो जाती है और यह शरीर गिर जाता है यानी की यह गुब्बारा पूरी तरह से ख़ाली हो जाता है जिसको हमने सामान्य शब्दों में मृत्यु कहा है।

प्राकृतिक मृत्यु हमेशा प्रारब्ध के पूरा होने के साथ ही हो जाती है। प्रारब्ध के भुगतान के साथ ही यह शरीर भी गिर जाता है, यानी की यह यह ग़ुब्बारा स्वतः ही फूट जाता है और आप एक क्षण के लिये भी इस शरीर में नहीं रह सकते है। तो यह प्रकृति का एक तरीक़ा है, व्यवस्था है ग़ुब्बारे को धीरे धीरे पिचकाने यानी की उसके रिसाव का, जो एक निश्चित समयावधि के साथ होता है।

अब दूसरा जो तरीक़ा है वह अध्यात्म का रास्ता है और यह रास्ता उन लोगों के लिए है जो जल्दी में है और जो प्रकृति की व्यवस्था के हिसाब से नहीं चलना चाहते है। क्योंकि प्रकृति के प्रारब्ध की व्यवस्था जोखिम पूर्ण है। जोखिम से भरीहुई इसलिए, क्योंकि प्रारब्ध के भुगतान के साथ ही आदमी कई और नये कर्म भी बांध लेता है और इस तरह यह शरीर और कर्मों के निपटारे का हिसाब भी कभी समाप्त नहीं होता है। और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी बेहोशी में जीने की आदत हो गई है। और इस तरह यह यात्रा बनी रहती है।और आदमी यह जान भी नहीं पाता है कि और कितने जन्मों तक यह हिसाब चलता रहेगा। और इसलिए अध्यात्म की ज़रूरत पड़ी और अध्यात्म का यह रास्ता उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो अपना सारा हिसाब यानी की सभी कर्मों का निपटारा इसी ज़िंदगी यानी की इसी शरीर में होते हुए करना चाहते है। उसी का मतलब आध्यात्मिक होना है। आध्यात्मिक होने का अर्थ है की प्रकृति के भरोसे ना चल कर अपने प्रयासों से इस ग़ुब्बारे को समय के पहले ही फ़ोड देना, हमेशा के लिए। आध्यात्मिक होना ही एक रास्ता है जो आपको ऐसा करने में आपकी सहायता कर सकता है।

अब आध्यात्मिक होने का मतलब है अपने होश को जगाना यानी की यह जानना की मैं यह शरीर और मन नहीं बल्कि शुद्ध चेतना यानी की ऊर्जा हूँ और यहाँ पर शुद्ध चेतना यानी की ऊर्जा होकर होना। सजगता यानी की होश का जीवन, शरीर की इस चेतना यानी की ऊर्जा का पुनः शुद्ध चेतना में रूपान्तरण है। होश यानी की अवेयरनेस से जीने का मतलब ही आध्यात्मिक होना है और होश का जीवन आपको इस शरीर रूपी ग़ुब्बारे को हमेशा के लिए फोड़ने में आपकी मदद करेगा और इस आवागमन को हमेशा के लिए रोक देगा। ध्यान यानी की मैडिटेशन का अभ्यास और कुछ नहीं बल्कि सजगता को, होश को जगाने का अभ्यास है जो आपकी चेतना का पुनः शुद्ध चेतना में रूपांतरण करता है और आपको इस शरीर के परे जाने में आपकी मदद करता है। एक बात जानिये की शरीर की ज़रूरत बेहोशी को है होश यानी की शुद्ध चेतना को नहीं। चेतना सभी भौतिक के परे है। 

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