ब्रह्मचर्य का मतलब अपनी ऊर्जा में विश्राम;
ब्रह्मचर्य का मतलब वो नही है जो हम साधारणतः समझते हैं। ब्रह्मचर्य से हमारा मतलब है शादी नही करना और शारीरिक सम्बंध नही बनाना। नहीं, ब्रह्मचर्य का यह मतलब क़तई नही है। ब्रह्मचर्य शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - ब्रह्म और चर्या से। ब्रह्म का अर्थ परमात्मा से है और चर्या का अर्थ दैनिक चर्या से अर्थात् आपके रोज़ाना के आचरण (daily living) से है। अतः ब्रह्मचर्य का मतलब हुआ, ब्रह्म जैसी चर्या एवं ब्रह्मचारी का अर्थ हुआ, जिसकी दैनिक चर्या ब्रह्म जैसी हो। जो ब्रह्म की तरह रहता है और ब्रह्म की तरह रहने का मतलब है जो पूरी तरह से ब्रह्म या परमात्मा को समर्पित है। जो हमेशा ब्रह्म में लीन रहता है उसी को ब्रह्मचारी कहा है। ब्रह्मचर्य का सन्यास या शादी से कोई लेना-देना नही है। घर में रहते हुए भी येदि आप ब्रह्म में लीन रहते है तो आप ब्रह्मचारी है और जंगल में रहकर भी येदि आप ब्रह्म में नही रहते तो आप सांसारिक है, ब्रह्मचारी नही।
ब्रह्म या परमात्मा का अर्थ समझ लेना ज़रूरी है। ब्रह्म हमारी तरह कोई शारीरिक स्वरूप नही है। ब्रह्म या परमात्मा का अर्थ है चेतना (consciousness) या ऊर्जा। ऊर्जा हमारी वास्तविकता है। हमारी ही नही, बल्कि इस अस्तित्व की वास्तविकता है। जो भी कुछ आपको दिखाई देता है वह और कुछ नही उसी ऊर्जा की ही अभिव्यक्ति (manifestation) है। अतः चेतना ही ब्रह्म या परमात्मा है। इसलिए ब्रह्मचारी का अर्थ हुआ, जो हमेशा अपनी चेतना, अपनी ऊर्जा, अपनी वास्तविकता या अपने स्वरूप में स्थित रहता है। अपनी चेतना में स्थित रहने का मतलब अपने स्व या स्वभाव में स्थित रहना भी है। एक ब्रह्मचारी हमेशा अपने स्वभाव में रहता है। कभी स्वभाव को छोड़कर विभाव या मन में नही रहता। मन में रहना अपने विभाव में रहना है, क्योंकि मन (mind) हमारी वास्तविकता नही है। अतः ब्रह्मचारी और संसारी में इतना ही फर्क है कि जो अपने मन के तल पर रहे वह संसारी, भले ही वह जंगल में रहता है और जो अपने स्व या ऊर्जा में रहता है वह ब्रह्मचारी चाहे वह संसार में ही रहता है।
एक ब्रह्मचारी पूरी तरह से स्वयं में स्थित एवं आनंद (bliss) मय है। आनंद बाहर की विषय-वस्तु से नही बल्कि अपनी ऊर्जा या स्वयं में स्थित होने का है। Bliss is of the consciousness. एक ब्रह्मचारी अपनी ऊर्जा में ठहरने के आनंद से इतना लबालब होता है की उसे बाहर से विषयी सुख (pleasure) खोजने की ज़रूरत ही नही होती। यही नही बल्कि उसका अपने होने का आनंद हमेशा उसके साथ भी होता है। आनंद (bliss) का कोई विपरीत (opposite) नही है, जैसे आदमी का उल्टा औरत या दुःख का उल्टा सुख क्योंकि विपरीत या उल्टा सांसारिक या द्वेत के संदर्भ में है। जबकि आनंद अद्वैत से सम्बंधित है। अद्वेत (oneness) में दूसरा नही है। दूसरा मतलब संसार एवं एक मतलब चेतना (consciousness) या दिव्य (divine) से है।
ऊर्जा में ठहर जाना या ऊर्जा में विश्राम यानि ब्रह्म या परमात्मा में ठहेर जाना है। ऊर्जा का बाहर की और बहना संसार की दौड़ है। ऊर्जा जब बाहर की और दौड़ती है तो संसार को निर्मित करती है। लेकिन यही ऊर्जा जब भीतर ठहर जाए यानि बाहर की और बहना बंद कर दे तो ऊर्जा का रूपांतरण होता है। ऊर्जा का शुद्धीकरण होता है। इसी रूपांतरण या ऊर्जा के भीतर ठहेर जाने को ही आत्माका परमात्मा से मिलन या शक्ति का शिव से मिलन कहा गया है। यह मिलन, जब शरीर के तल पर होता है तो उसे संभोग (sex) कहते हैं एवं यही मिलन (union) येदि ऊर्जा के स्तर पर होता है तो उसे शिव का शक्ति से मिलन कहा है। उसे समाधि कहा है। ऊर्जा एक ही है लेकिन उसके रूप अनेक है. इसीलिये वही ऊर्जा बाहर बहे तो भोतिक या संसार को निर्मित करती है लेकिन उसी ऊर्जा का रुख़ अंदर की ओर हो जाए तो परमात्मा से एकाकार करातीहै। एक ब्रह्मचारी पूरी तरह से अंतर्मुखी होता है। वह अपनी ऊर्जा के आनंद से हमेशा परिपूर्णहै।
ध्यान (meditation) ब्रह्मचारी बनने की विधि का नाम है क्योंकि की ध्यान ऊर्जा का ऊर्जा से मिलन है, ध्यान ऊर्जा का ऊर्जा में विश्राम है, ध्यान ऊर्जा का रूपांतरण है, ध्यान शक्ति का शिव से मिलन है, ध्यान आत्मा का परमात्मा से मिलन है और ध्यान सम्भोग से समाधि का नाम है।
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