बंधन और मुक्ति, ऊर्जा के संदर्भ में है, शरीर के संदर्भ में नही
बंधन (bondage) और मुक्ति (liberation) शब्दों का इस्तेमाल शरीर के संदर्भ में नही बल्कि ऊर्जा या चेतना के संदर्भ में है। ऐसा इसलिए की हमारी वास्तविकता या हमारा असली स्वरूप शरीर नही बल्कि ऊर्जा है। वैसे हम अपने बारे में कुछ भी सोच ले या समझ ले लेकिन वास्तव में हम और कुछ नही बल्कि ऊर्जा की थोड़ी सी मात्रा ही है। यह ऊर्जा बंधन में है, शरीर नही । शरीर तो मृत्यु के साथ ही मुक्त हो जाता है एवं मृत्योपरांत पुनः अपने स्त्रोत (source) यानि मिट्टी में जा मिलता है, जहां से निकला था। शरीर तो एक अस्थायी आवरण (covering) मात्र है, ऊर्जा पर। पहनावे की भाँति।
अतः समझने की बात यह है की, बंधन में यह चेतना है न की शरीर। शरीर तो केवल साधन (tool) मात्र है, चेतना की यात्रा के लिये। वास्तव में यह यात्रा, चेतना की है न कि शरीर की। चेतना ही जन्म लेती है और चेतना ही मृत्यु को प्राप्त होती है। और जब तक यह ऊर्जा बंधन में है, तब तक शरीर की कमी नही रहेगी। यह ऊर्जा नये- नये शरीर धारण करती रहेगी। ऊर्जा बंधन में होने के कारण ही शरीर में पक्षी की भाँति कैद रह सकती है, अन्यथा नही क्योंकि ऊर्जा स्वभाव से ही मुक्त है।
यह ऊर्जा वैसे तो शुद्ध चेतना, जो की इस अस्तित्व की वास्तविकता है, उसी का अंश है लेकिन अपनी शुद्धता को खो देने के कारण अपने स्त्रोत (Source) से अलग हो गयी है। इस अशुद्धता की मुख्य वजह है, ऊर्जा या चेतना पर संस्कारों की छाप पड़ जाना। इन्ही संस्कारों को हमने कर्म कहा है। कर्म याददाश्त (karmic memory) की वजह से इस ऊर्जा या चेतना ने अपना मूल स्वभाव जो मुक्ति (freedom) है उसे भूल कर सीमित (limited) स्वभाव यानि बंधन या शरीर में रहना स्वीकारा है। येदि इस ऊर्जा को इन संस्कारों से मुक्त कर दिया जाए तो यह ऊर्जा मुक्त हो जाएगी और पुन्ह अपने स्त्रोत (Source) में जा मिलेगी उसे ही मुक्ति या मोक्ष बोला गया है।
अब सवाल यह उठता है की इस ऊर्जा की मुक्ति के लिए हमें करना क्या है? इस सवाल का जवाब, सवाल में ही छिपा हुआ है और वह है- ऊर्जा को मुक्त रखना। ऊर्जा को बंधनो से मुक्त रखना। यह ऊर्जा अभी हमारे विचारों से बंधी हुई है। जो विचार (thoughts) दिन भर हमारे मन (mind) में, बिना रुके , चलते रहते है उनके साथ बंधी या उलझी हुई है। विचार भटकाव है क्योंकि विचारों का मतलब दूसरा और दूसरा यानि संसार। चेतना का विचारों में उलझना, संसार या दूसरों से उलझना है। और दूसरा मतलब बंधन। दूसरा या संसार या विचार मतलब,पर का चिंतन। अब येदि आप अपनी नियमित जिंदगी में इस चेतना को मुक्त (free) रखें यानि विचारों में न उलझा कर पूरी तरह से खुला रखे तो आपकी चेतना मुक्त रहेगी और इसी के साथ ऊर्जा मुक्ति की शुरुआत हो जाएगी। चेतना को खुला रखना या मुक्त रखने का मतलब जो भी कुछ हो रहा है - बाहर या भीतर- उसके प्रति केवल उपस्थिति। केवल मोजूद या मात्र होना। उपस्थिति या केवल होने का मतलब, जो कुछ हो रहा है उसके प्रति अपनी कोई प्रतिक्रिया या प्रतिरोध नहीं. जो कुछ होता है उसको पूरी तरह से स्वीकार लेना, ऊर्जा को मुक्त रखना है। येदि आप इस पल में मोजूद है तो आपकी चेतना मुक्त है। इसी मोजूदगी को वर्तमान में या इस क्षण में होना बोला गया है। हर पल जो कुछ होता है उसके प्रति उपस्थित होना, चेतना को मुक्त रखना है।
ऊर्जा को मुक्त कैसे रखा जाए इसको समझने के लिए मैं आपको दो उदाहरण देता हूँ। पहला बरसात का। याद है आपको, मौसम की पहली बारिश में आप कैसे भीगते है? स्वयं को पूरी तरह से खुला छोड़ देते हैं और बिना किसी प्रतिरोध के आप बारिश का स्वागत करते हैं। बस उसी तरह आपको भीतर से खुला रहना या ऊर्जा को खुला रखना है बिना किसी प्रतिरोध के। दूसरा उदाहरण ठंडी हवा का है। गर्मी के मौसम में जब ठंडी हवा ( cool breeze) चलती है और आप उसके सामने खड़े हो जाते है पूरे स्वागत के भाव से। एक क्षण आता है जब आपको लगता है की आपका शरीर बीच में है ही नही और आप पूरी तरह से पारदर्शी हो गए है। जो कुछ हो रहा है उसके प्रति बिना किसी प्रतिरोध या प्रतिक्रिया के उपस्थित रहने को ही ऊर्जा को मुक्त रखना है।
अभी इस क्षण में आप अपनी ऊर्जा को पूरी तरह से खुला छोड़ देते है, तो इसी क्षण में आप मुक्ति या मोक्ष का अनुभव कर सकते है। मोक्ष कहीं बाहर, कोई जगह या स्थान नही है। मुक्ति और बंधन बाहर नही आपके भीतर है। ऊर्जा को विचारों में बांधे रखना बंधन है और ऊर्जा को खुला रखना, जो कुछ हो रहा है उसके प्रति उपस्थित या मोजूद रहना मोक्ष है।
ध्यान (meditation), ऊर्जा को मुक्त रखने की विधि का नाम है । ध्यान और कुछ नही ऊर्जा को पूरी तरह से खुला छोड़ देना और जो कुछ हो रहा है - बाहर या भीतर- उसके प्रति केवल उपस्थित रहना है। (next post - stop throwing stones.....)
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