‘धारा’ यदि ‘राधा’ बन जाये तो, ‘कृष्ण’ से मिलन पक्का है…

धारा मतलब ऊर्जा जो हमारी ही नहीं, बल्कि इस पूरे अस्तित्व की वास्तविकता है। यह ऊर्जा की धारा सतत रूप से बह रही है। ऊर्जा के बहाव का दूसरा नाम मन (माइंड) है। मन का मतलब दूसरा यानी संसार। मन का मतलब, पर का चिंतन। अतः ऊर्जा जब बहती है तो हमेशा बाहर यानी संसार की ओर बहती है, संसार की ओर दोड़ती है और संसार का निर्माण करती है। संसार ओर कुछ नहीं ऊर्जा का बिखराव ओर फैलाव मात्र है। अभी हमारी यह ऊर्जा लगातार बाहर यानी संसार की ओर बह रही है क्योंकि हम पूरी तरह से मन के अधीन और मन के तल पर ही जी रहे है। मन के तल पर जीने का मतलब बाहर या संसार की ओर दौड़। ऊर्जा की यह दौड़ हमारे लिए संसार और सांसारिक संसाधनों का निर्माण कर रही है। 

अध्यात्म के सम्बन्ध में एक बड़ी महत्वपूर्ण बात है, जिसे जानना और समझना जरुरी है और वह यह कि ऊर्जा या तो बह सकती है या स्थिर रह सकती है। ऊर्जा का बहना संसार या मन है। वास्तव में ऊर्जा के बहाव का दूसरा नाम मन ही है, क्योंकि ऊर्जा जब बहेगी तो हमेशा बाहर की ओर बहेगी। लेकिन यही ऊर्जा जब बहना बंद कर दे और भीतर ही ठहर जाये तो यही ऊर्जा, ईश्वर (डिवाइन) बन जाती है, जिसे चेतना (consciousness), परमात्मा आदि कई नामों से जाना जाता है। ऊर्जा का बहना मन है तो ऊर्जा का ठहराव या स्थिर हो जाना परमात्मा हो जाना है। अतः समझने की बात यह है की परमात्मा और संसार एक ही सिक्के के दो पहलू है, लेकिन दोनों कभी भी एक साथ नही हो सकते है। जब मन या संसार है तो डिवाइन नही हो सकता और जब डिवाइन है तो संसार नही होता। इसीलिए संत कबीर दास जी ने कहा की “प्रेम गली अति सांकरी त्या में दो ना समाये……” 

अतः समझने वाली बात यह है की, ऊर्जा की धारा जब बहती रहे तो यह धारा संसार या दूसरे की ओर दोड़ेगी लेकिन यही धारा यदि बहना बंद कर दे ओर भीतर ही ठहर जाये तो यही धारा, ‘राधा’ बन जाती है। धारा यदि ‘राधा’ बनी तो ‘कृष्ण’ से मिलन भी पक्का है। ऊर्जा का यह मिलन यदि शारीरिक यानी स्थूल के स्तर पर होता है तो हमने उसे, सेक्स कहा है। लेकिन यही मिलन यदि ऊर्जा के तल पर होता है तो उसे, शक्ति का शिव से मिलन, आत्मा का परमात्मा से मिलन, राधा का कृष्ण से मिलन कहा गया है। ऊर्जा का ठहर जाना, मन का मन में ठहर जाना या मन का मन में विश्राम, ऊर्जा का रूपांतरण है, ऊर्जा का ऊर्जा से मिलन है। 

धारा का उल्टा राधा है। यह धारा,राधाबन सकती है यदि उल्टा कर दो तो, जिसका मतलब यह है की ऊर्जा के रुख़ को उल्टा कर देना है, ऊर्जा के रुख़ को बदल देना है । ऊर्जा के रुख को मोड़ देना है - बाहर से अंदर की ओर। ऊर्जा का बाहर से अंदर की ओर मुड़ना यानी ऊर्जा की दिशा को उल्टा करना है। बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होना ‘धारा’ का ‘राधा’ में रूपांतरण है।

इसलिए ‘कृष्ण’ से; परमात्मा से, या ‘शिव’ से मिलने के लिए और कुछ भी नहीं करना है, मात्र इसके कि अपनी ऊर्जा, जो लगातार बाहर, संसार कि ओर बह रही है उसका रुख मोड़ना है; उसकी दिशा को बाहर से अन्दर की  तरफ करना है। अध्यात्म और अध्यात्मिक होने का और कोई मतलब, और कोई सम्बन्ध नहीं है, सिवाय इसके कि अपनी ऊर्जा का रुख बाहर से भीतर की और करना है। जब तक हम बहिर्मुखी (outwardly focussed) से अंतर्मुखी (inwardly focussed) नहीं बनते, आत्मा का परमात्मा से मिलन असंभव है । लेकिन यह धारा यदि धारा ही बन कर रह जाये तो ‘कृष्ण’ से मुलाक़ात कभी नही हो सकती है। धारा बंधन है क्योंकि ऊर्जा का बाहर की ओर बहाव आपके लिए नये-नये संसार बसायेगा और आपको फिर से संसार में आना पड़ेगा। लेकिन ‘धारा’ यदि ‘राधा’ बन गयी तो मुक्ति पक्की है क्योंकि कि ‘राधा’ का ‘कृष्ण’ से मिलन, स्वयं ‘राधा’ का ‘कृष्ण’ बनना है। आत्मा का परमात्मा में विलीन होना है। ध्यान (मैडिटेशन) ‘धारा’ को ‘राधा’ में बदलने कि विधि का नाम है।

Comments

Popular posts from this blog

DON’T THROW BACK, BECAUSE, ABSORPTION IS YOUR REAL NATURE.

आध्यात्मिक होने का अर्थ है, समय से पहले अपने ग़ुब्बारे को फोड़ देना

DISSOLUTION OF THE MIND – HOW?