शरीर की मृत्यु, इस यात्रा का अंत नहीं है
सांसारिक अर्थों मे मृत्यु से हमारा मतलब शरीर का छूट जाना है। क्योंकि हमारा सांसारिक व्यवहार और सारे रिश्ते-नाते शरीर तक ही सीमित होते है, अतः शरीर के छूटने के साथ ही, जिसे हमने मृत्यु कहा है, हमारे लिए सब कुछ समाप्त हो जाता है। लेकिन अध्यात्म के अर्थों में, जिन लोगों ने जाना, उन्होंने बताया की शरीर की मृत्यु इस जीवन यात्रा का अंत नहीं है। क्योंकि जिसे हमने मृत्यु जाना और कहा, उसके साथ शरीर तो अवश्य समाप्त हो जाता है लेकिन मन जो वास्तव में नये शरीर का कारण है वह कभी समाप्त नही होता। मन या माइंड मृत्यु के बाद भी बना रहता है।
अतः समझने वाली बात यह है की जिसे हमने मृत्यु कहा है वह मन की मृत्यु नही है। यानि मृत्यु, आपके मन को भी नही मिटा सकती। मन मृत्योपरांत भी बना रहता है, एक सूक्ष्म (subtle) शरीर के रूप में। यह बिल्कुल उसी तरह होता है जैसा की रोज़ रात में नींद में हमारे साथ होता है। नींद के तुरंत पहले हमारा मन नष्ट नही होता बल्कि कुछ समय के लिए खो जाता है। और यही मन हमारे जागने के साथ ही फिर से जाग भी जाता है और अपना काम फिर से शुरू कर देता है।
बिल्कुल कुछ ऐसा ही हमारे साथ मृत्यु के समय भी होता है। मृत्यु के तुरंत पहले हमारी सारी वासनाएँ, इच्छाए, निचोड़ के रूप में इकट्ठा हो जाती है और इन्ही वासनाओं के निचोड़ को हमने मन कहा, जो मृत्यु के बाद भी, ज्यों का त्यों, सूक्ष्म शरीर के रूप में बना रहता है। मन और कुछ नही वासनाओं और इच्छाओं का पुलिंदा या सार मात्र है। चूँकि, वासनाएँ बिना अभिव्यक्ति के नही रह सकती और इच्छाओं की अभिव्यक्ति बिना माध्यम के सम्भव नही है, इसीलिए यह मन फिर से नया शरीर धारण करता है जो इन वासनाओं की अभिव्यक्ति का साधन या माध्यम बनता है। अतः मुद्दे की बात यह है की मन ही नये या दुसरे शरीर का एक मात्र कारण है। शरीर की मृत्यु कोई मृत्यु नही है, और शरीर छूटने से कोई ख़ास फर्क भी नही पड़ता क्योंकि जब तक मन जिंदा यानि बना हुआ है तब तक शरीर की कोई कमी नही रहेगी। मन नये शरीर लेता रहेगा और यह जीवन लीला बनी रहेगी और इसी तरह से यह आवागमन का धंधा चलता रहेगा।
तो समझने लायक़ बात यह है की जिसको हमने मृत्यु कहा और समझा वो तो मात्र एक अंतराल है जीवन के इस चक्र में। नये शरीर का इंतज़ार मात्र है। पिक्चर में एक अंतराल की भाँति। अंतराल के ख़त्म होते ही पिक्चर फिर से शुरू होती है उसी तरह नये शरीर के साथ ही यात्रा फिर से शुरू होती है। हाँ, अंतराल छोटा-बड़ा हो सकता है, लेकिन यात्रा का पुनः शुरू होना निश्चित है। यह यात्रा बंद नही होती। थोड़े समय के लिये रुक जरुर सकती है। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे की एक सुखा पैड जो बरसात के आने पर फिर से हरा भरा हो जाता है क्योंकि उसमे अभी भी जीवन शेष है।
इस तरह हमने यह जाना कि शरीर की मृत्यु तो प्रक्रति (nature) की एक व्यवस्था मात्र है और इस यात्रा का अंत नहीं बल्कि जीवन यात्रा के क्रम में सिर्फ एक अन्तराल से ज्यादा नहीं है। तो सवाल अब यह उठता है की क्या इस यात्रा का कोई अंत नही? क्या इस यात्रा को रोका जा सकता है? यदि हाँ तो कैसे? उत्तर यह है की इस यात्रा को रोका जा सकता है, और वह भी हमेशा- हमेशा के लिये। और रोकने के लिए करना मात्र यही है की जो कारण है नये शरीर का उस कारण को जड़ से ख़त्म कर देना है। कारण नही रहेगा तो उसका प्रभाव भी नही हो सकेगा। अब हम यह जानते है की नए शरीर का एक मात्र कारण मन या माइंड है तो इस यात्रा को हमेशा के लिये रोकने के लिए करना इतना है की मन को मिटा देना है। मन समाप्त तो नया शरीर नही मिल सकता क्योंकि नया शरीर मन की अभिव्यक्ति यानि कर्म फल के लिये चाहिये। जब मन ही नही रहेगा तो अभिव्यक्ति या कर्म फल की ज़रूरत नही तो फिर शरीर की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। इस तरह यह आवागमन हमेशा के लिए रोका जा सकता है।
अब यह भी समझने की बात है की मन को समाप्त करना किसी ओर के हाथ में नही, बल्कि हमारे स्वयं के हाथ में ही है। यह हमारे को ही करना है ओर वह भी इस शरीर में होते हुए। इस शरीर में होते हुए ही इस मन को मिटाया जा सकता है। क्योंकि हम शरीर बनकर ओर शरीर में ही जीते है और इसलिए हम यही समझते है की शरीर के साथ सब समाप्त हो जाता है या शरीर के साथ यह जीवन यात्रा भी समाप्त हो जाती है। लेकिन हमने यह जाना की शरीर के आगे भी कुछ है। शरीर के खत्म होने पर भी जीवन चक्र क़ायम रहता है। अतः जब तक हम मृत्यु को सही अर्थों में नही समझेंगे यह यात्रा भी चलेगी। मन की मृत्यु सही अर्थों में मृत्यु है. केवल मन की मृत्यु पर ही यह यात्रा सदैव के लिए बंद हो सकती है, अन्यथा कभी नही।
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