भागना नहीं, जागना है।
(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट
में व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक
पहुँचती है तो, आप इनको नजरंदाज कर दें.)
और जागने के लिए भागने कि जरुरत कहाँ है? क्योंकि जहाँ आप है, वहीँ आपको
जागना है और वहीँ आप जाग भी सकते है. किसी दूसरी जगह पर नहीं. यह बिल्कुल
वैसे ही है, जैसे कि जहाँ आप रात में सोते है, वहीँ पर आप
जागते भी है. क्या कभी ऐसा हुआ कि, आप सोये एक कमरे में और जागे किसी दूसरे
कमरे में? कभी नहीं. आप हमेशा जागते भी वहीँ है, जहाँ आप रात
में सोये थे. हाँ जागने के लिए यदि स्थान बदलने कि
जरुरत होती, तो भागने की
बात समझ में आती है. जब आप जहाँ है, वहीँ जागना है ओर वहीँ पर जाग भी सकते है तो,
फिर भागना कैसा और किसलिये?
इस सन्दर्भ में, दूसरी जो महत्वपूर्ण बात
है, वह यह कि, जो सोया हुआ है, वह भी आप है और जिसे जागना या जगाना है वह भी आप है. जब दोनों आप ही है, तो फिर भागना किसलिए? हाँ, जगाना किसी
ओर को हो तो, भागने कि बात समझ में आती है. जब दोनों आप ही है और जगाने का काम भी
आप ही को करना है, तो यह काम तो घर पर रह कर भी किया जा सकता है. फिर जो काम घर पर
रहकर किया जा सकता है, उसके लिए जगह या पोशाक बदलने कि जरुरत क्या है? हाँ, काम
यदि ऐसा हो कि, जिसका
सम्बन्ध किसी जगह विशेष से या पोशाक विशेष से हो तो फिर जगह या पोशाक बदलने कि बात
समझ में आती है.
अब मुख्य बात. क्या आप जानते है कि लोग संसार
से क्यों भाग रहे है? उनके भागने का कारण क्या है? उसका एक ही
कारण है और वह कारण है डर. डर, इस बात का कि, संसार में रहे तो यह संसार मुझे पकड़ लेगा, यह संसार
मुझे बांधेगा. यह पकडे जाने और संसार से बंध जाने का डर उन्हें भगाता है. उन्हें
यह लगता है कि घर, परिवार, या बाज़ार जिसे वो संसार कहते है, उससे दूरी बनाने से या
उससे भाग जाने से उनका काम बन जायेगा. लेकिन, उनका यह सोचना गलत है, यह उनका एक भ्रम है. इसके दो कारण है – पहला यह कि, पकड़ संसार की नहीं है. पकड़, संसार की विषय-वस्तु में नहीं है. पकड़ हमारी
है, पकड़ हमारी कल्पना, हमारे विचारों यानि की मन या माइंड में है. उदाहरण के तोर पर, आपका घर नहीं कहता मैं घर हूँ या मैं हूँ या मैं तुम्हारा हूँ.
यह कहना, सोचना या कल्पना करना हमारा है. और दूसरा कारण यह
है कि, संसार बाहर
नहीं है. संसार आपके भीतर है. मन का दूसरा नाम ही संसार है. आपका संसार, आपके मन में
बसता है और मन (माइंड)
ही नये संसार बनाता है. अतः संसार से
मतलब जो कुछ दिखाई देता है उससे नहीं
है. वास्तव में संसार जैसी कोई चीज है ही नहीं. संसार का मतलब दूसरा और मन का मतलब भी दूसरा. अतः संसार मतलब, मन और मन
मतलब संसार. संसार और मन एक दूसरे
के पर्याय है.
इसलिए, भागना उपाय
नहीं है, क्योंकि, जो
कारण है वह बाहर नहीं है, संसार या संसार कि
विषय-वस्तु कारण नहीं है. कारण बंधे जाने का डर भी नहीं है. कारण आपके अन्दर है. कारण आपका मन (माइंड) है. क्योंकि संसार आपके अन्दर है
और पकड़ भी आपकी अपनी है.
पकड़ आपके मन की है. बंधना आपके मन का है. पकड़ एक प्रवर्ती
(tendency) है और प्रवर्ती मन की और मन में होती है. पकडे
जाने का डर तो केवल उस प्रवर्ति का एक परिणाम
मात्र है. यह प्रवर्ती यदि मिट जाये तो डर भी स्वतः ही समाप्त हो जायेगा. और यह
प्रवर्ती यदि बनी रहे, तो भागकर भी
कोई फायदा नहीं, क्योंकि जब तक प्रवर्ती यानि मन जिन्दा है तो आप कुछ ना कुछ अवश्य
पकड़ लेंगे. आप जंगल जाकर भी कुछ ओर पकड़ लेंगे क्योंकि पकड़ने कि आदत अभी बनी हुई
है.
दूसरी बात यह है कि,
संसार यानि
मन से भाग कर आप जायेंगे कहाँ? यदि आप जंगल भी गये तो भी आपका मन तो आपके साथ ही होगा ना? इसलिये समझने वाली बात यह है कि जब तक मन आपके साथ है तब तक संसार भी हमेशा आपके साथ है. क्योंकि जब तक मन जिन्दा है, तो संसार का निर्माण, आप जहाँ भी है, वहां कर लेंगे. अतः महत्वपूर्ण बात, काम है, न कि जगह या पोशाक. अब यदि वास्तविक काम
जो कि, जागना है, वह यदि आप घर पर रहकर करते है, तो आप गृहस्थी के भेष में भी
सन्यासी है और यदि आप जंगल में होकर भी वास्तविक काम जो करना है, वह नहीं करते है
तो आप सन्यासी के भेष में भी गृहस्थी है और आपका जंगल जाना भी व्यर्थ है.
जागने से मतलब क्या
ओर कैसे?
अतः जो वास्तविक (रियल) काम है, वह अपनी प्रवतियों, आदतों यानि मन को जड़
से मिटाना है. मन ओर कुछ नहीं आपकी सभी प्रवतियों और वासनाओं का एक समूह मात्र है. अब मैं आपको जागने का मतलब समझाता हूँ. जागना, सांसारिक अर्थ में नहीं बल्कि अध्यात्मिक
(metaphysical) अर्थ में है. अभी हम सोये हुए है यानि अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति
सोयें हुए है. जिसे हम जागना समझ रहे है, वह जागना नहीं बल्कि सोना है, क्योंकि हम शरीर ओर मन के तल पर जी रहे है. एक बात जो समझने कि
है, वह यह कि शरीर ओर मन एक दूसरे के पर्याय है. फर्क इतना ही है कि शरीर स्थूल है
ओर मन सूक्ष्म है. अतः शरीर को सच मानना ओर शरीर बनकर जीना बेहोशी है. शरीर को सच,
बेहोशी में ही समझा जा सकता है. मन बेहोशी है क्योंकि मन के तल पर जीना यानि अपनी वास्तविकता में नहीं
होना. इस बेहोशी को तोड़ना और अपनी वास्तविकता,
अपने असली स्वरूप के प्रति जागने को ही अध्यात्मिक अर्थ में जागना बोला गया है.
हमारा असली स्वभाव होश या चेतना है, ना कि शरीर. होश हमारा स्वभाव है ओर मन विभाव
है. अतः मन ओर शरीर के तल पर जीना, विभाव या बेहोशी में जीना है, जबकि होश या
चेतना में जीना स्वभाव या होश में होना है. स्वभाव में होना ही जागना है.
दूसरी बात, वह यह कि
जो आपको
बांधे वह बेहोशी ओर जो आपको मुक्त करे उसे होश या जागना कहा गया है. पकड़ बांधती है
ओर पकड़ मन की है. चेतना, जो आपकी
वास्तविकता है उसमें कोई पकड़ नहीं
है. चेतना तो मुक्त है. चेतना का स्वभाव ही मुक्त है. अतः मन बेहोशी है ओर होश
आपको उस पकड या मन से मुक्त करता है इसलिए इसे जागना कहा गया है. मन के बाहर आना ही
अध्यात्मिक अर्थ में होश में आना या जागना है. पकड़ यानि शरीर के तल पर ओर शरीर के लिए जीना. चेतना के तल पर
जीने का मतलब स्वंतंत्र होकर जीना है. फ्रीडम या आजादी चेतना का स्वभाव है. चेतना
में कोई पकड़ या दूसरा नहीं है. चेतना में कोई बंधन नहीं; चेतना में कोई
राग, द्वेश नहीं है.
बेहोशी का मतलब जो कुछ बाहर हो रहा है
उसेक साथ हो जाना. जो कुछ घटना घटी आप भी भीतर से विचलित या अशांत हो गये. इसी को
बंधन कहा गया है. आपका उस घटना से जुडाव हो जाना है. लेकिन आप यदि यह जान ले कि
आपके भीतर एक ऐसा आयाम भी है जो कभी विचलित नहीं होता या जो कुछ घटता है, वह उसको
हिला नहीं सकता. अब यदि आप उस आयाम से परिचित हो जाये ओर आप उसके साथ अपना जुडाव
कर ले तो आपका बाहर या संसार में जो कुछ हो रहा है, उससे जुडाव या लगाव अपने आप ख़त्म हो
जायेगा. इसे ही जागना कहा गया है. बाहर से लगाव या अटकाव तभी तक है, जब तक आप उस आयाम से जो स्थिर है, उससे परिचित नहीं हो जाते. उस आयाम से
परिचित हो जाना ओर उससे दोस्ती कर लेने को ही जागना कहा गया है. यदि आप भीतर से
स्थिर हो जाये, तो बाहर भी
सब स्थिर हो जायेगा. बाहर कि हलचल, आपको कभी भी अशांत ओर विचलित नहीं करेगी. हलचल
सतह पर है. हलचल आपके मन यानि परिधि पर है, जब कि आपका केंद्र हमेशा से ही स्थिर है. मन
मतलब परिधि; मन मतलब हलचल; मन मतलब आना-जाना ओर होश या केंद्र मतलब जो हमेशा से है; जैसा है वैसा है ओर
वहां कोई हलचल या आना-जाना नहीं है. अपने केंद्र में स्थित हो जाने को ही जागना कहा है. उस आयाम से जो हमेशा से स्थिर है उससे परिचित हो जाना ओर
उससे नाता बना लेने को ही जागना या होश कहा गया है. मन (मूवमेंट) बहोशी है एवं स्थिरता डिवाईन है.
आपका मन यदि पूरी तरह से समाप्त हो जाये
तो संसार भी आपके लिए समाप्त हो जाता है. संसार समाप्त होने का मतलब यह नहीं की, संसार शाब्दिक अर्थों में समाप्त हो
जायेगा या जो कुछ बाहर हो रहा है उसका होना बंद हो जायेगा. नहीं. इसका अर्थ इतना ही
है कि, बाहर जो कुछ है या होता है वह अब आपको प्रभावित या विचलित नहीं करता. कोई
भी चीज आपके लिए तभी तक होती है जब तक वह आपको विचलित करे, आपको अशांत करे.
अतः समझने कि बात यह है
कि संसार से
भागना उपाय नहीं है. जो आप को
छोड़ना है या त्यागना है वह है मन, न कि संसार. क्योंकि मन छुट गया तो सब कुछ स्वतः
ही छुट जाता है फिर आपको कुछ छोडना नहीं पड़ता. ओर मन नहीं छुटेगा तो संसार की कमी नहीं रहेगी, संसार आपके साथ ही है. फिर आप चाहे जंगल
में चले जाओ या फिर आकाश में उड़ जाओ. मन को समाप्त करना वास्तविक काम है. मन को
ख़त्म करना सही अर्थों में अध्यात्म है. क्योंकि अध्यात्म का अर्थ वह नहीं जो हम
साधारणतः समझते है. अध्यात्म
का सही मतलब है, जो भोतिक (फिजिकल ) है, उसके आगे जाना. अध्यात्म का मतलब इस शरीर के आगे जाना. मन को ख़त्म करना एक
मात्र साधना है. मन को समाप्त करके ही शरीर - मन के परे जाया जा सकता है. क्योंकि मन ही पुनर्जन्म का एक मात्र कारण है.
अतः मन यदि समाप्त हो जाये तो आप स्वतः ही
अपने स्वभाव में होंगे, क्योंकि
स्वभाव ओर विभाव एक ही सिक्के को दो पहलू है लेकिन दोनों कभी साथ नहीं हो सकते. आप यदि मन में यानि विभाव में है, तो स्वभाव या चेतना में नहीं और चेतना या
स्वभाव में है, तो विभाव
में नहीं हो सकते. इसलिए, जितना दुरी आप अपने मन से बनाते है, उतना ही करीब आप अपनी चेतना के होते है. जागने के लिए और कुछ नहीं करना है. बस इतना कि अपने मन से दुरी बनाइये. मन को मत अपनाइये. एक कदम आप मन से दूर होते है, तो स्वतः ही आप एक कदम अपनी चेतना या
स्वभाव के करीब हो जाते है. क्योंकि ये दो ही सम्भावनाये है या ये दो ही तल है जिन
पर हम जी सकते है – मन ओर चेतना.
चेतना आपकी वास्तविकता या आपका असली
स्वरूप या स्वभाव है. उसे कहीं, बाहर से नहीं लाना है. होश आपको कहीं से
लाना नही है क्योंकि होश आपका स्वभाव है, जो हमेशा से आपके साथ और आपके भीतर मोजूद है। अतः चेतना में आने के लिए या जागने के लिए
मात्र इतना करना है कि अपनी बेहोशी यानि मन को तोड़ना है. मन माइंड से दुरी बनाना, मन को तोड़ने की दिशा में सही कदम है. यही रियल वर्क है
जो आपको जगायेगा, आपको अपने स्वभाव या होश में लायेगा.
अतः समझने कि बात यह ही की जो काम है, वह आतंरिक है, निजी है. बाहरी नहीं. मन आपका और सदैव आपके साथ और आपके भीतर ही है, बाहर नहीं. जब कि पोशाक और जगह बदलना बाहरी है, जिसका उस आतंरिक काम से कोई सम्बन्ध नहीं है. वास्तिवक काम जो करना है वह आपको अपने मन के स्तर पर करना है. सारांश में मेरा यह कहना है कि आपको कहीं पर भी भागना नहीं है, आपको तो भगाना है. भगाना अपने मन को है. मन को भगा दिया तो संसार कि पकड़ या बंध जाने का डर भी स्वतः ही भाग जायेगा. क्योंकि डर आपके मन के होने का परिणाम मात्र है. और मजेदार बात तो यह है कि, मन के भागने के साथ ही आप उसे भी प्राप्त कर लेंगे जिसे हमने जागना या होश कहा है. क्योंकि बेहोशी और होश, यानि मन और चेतना एक ही सिक्के के दो पहलू है. अभी आपके होश या स्वभाव को बेहोशी या मन ने पूरी तरह से ढक दिया है. आपका मन से बाहर आना दूसरे शब्दों में जागना भी है, क्योंकि जब मन नहीं तब आप है ओर जब मन है तो आप नहीं. मन और चेतना, विभाव और स्वभाव दोनों साथ नहीं हो सकते. मन के हटने के साथ ही होश या चेतना या स्वभाव स्वतः ही है, क्योंकि होश आपका निज स्वरूप है जो शुरू से आपके भीतर मोजूद है. आपको केवल उसे मौका देना है, उसको होने का. और उसके लिए आपको अपने मन को भगाना है. आपको भागना नहीं है. मन का समाप्त होना आपका जागना है. जागना आपका होना है. जागना यानि अपने असली स्वरूप में होना. भीतर से जागना है। तो यह काम आप जहाँ है, वही पर भी अच्छी तरह से कर सकते है, फिर भागना क्यों ओर किसलिए? चयन आपका है – भागना या जागना? ध्यान (मैडिटेशन) बेहोशी को भगाने और होश में होने के तरीके का नाम है.
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