शरीर और मन का जुड़ाव बिल्कुल वैसा ही है, जैसा की हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का.......

(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट में व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक पहुँचती है तो, आप इनको नजरंदाज कर दें.) 

क्योंकि, दौनों हमेशा साथ होते है। कभी अलग होकर नही रह सकते। यदि हार्डवेयर है, तो मानकर चलिए की उसमें चलने के लिए सॉफ्टवेयर भी होगा ही। और यदि सॉफ्टवेयर है, तो हार्डवेयर भी होगा और नही है, तो अवश्य बनेगा भी। हार्डवेयर के बिना सॉफ्टवेयर अधूरा है और सॉफ्टवेयर के बिना हार्डवेयर अधूरा है। 

इस मानव शरीर और मन का जुड़ाव भी बिल्कुल हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की भाँति ही है। शरीर हार्डवेयर है, कम्प्यूटर बॉक्स की तरह और मन सॉफ्टवेयर या उस प्रोग्राम की तरह जो उस बॉक्स में चलता है या उस बॉक्स के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। फर्क सिर्फ़ इतना ही है की शरीर सकल (gross) है और दिखाई देता है लेकिन मन सूक्ष्म ( subtle) है ओर दिखाई नहीं देता। मन सूक्ष्म है लेकिन बिना सकल या ग्रोस के मोजूद नही हो सकता। मन की अभिव्यक्ति बिना शरीर के नही हो सकती। 

अब मन और माइंड और कुछ नही बल्कि कुछ मात्रा में याददाश्त (मेमरी) है। इसी याददाश्त को अध्यात्म की भाषा मे कर्मा या कार्मिक मेमरी कहा गया है। यह हमारी अपनी है। यानि किसी ओर ने हमें यह नही दी है बल्कि हमारी अपनी है जो हमने ही निर्मित की है या बनायी है। इसी मन को, जो इस शरीर मे काम करता है डेस्टिनी या नियती कहा गया है। नियती को ही दूसरे शब्दों में प्रारब्ध कर्म कहा गया है। प्रारब्ध का मतलब, कर्मों की एक किश्त, जो हमें इस जीवन में पूरी करनी पड़ती है। प्रारब्ध या नियती के पूरा होने पर यह मन और शरीर का योग स्वतः ही समाप्त हो जाता है, जिसे हमने सामान्य भाषा में मृत्य कहा है। मृत्यु का मतलब सॉफ्टवेयर अब समाप्त हुआ और जब सॉफ्टवेयर नही रहा, तो फिर इस हार्डवेयर या ख़ाली बॉक्स को मिट्टी के हवाले कर दिया जाता है जो हम लोग शरीर के साथ मृत्योपरांत करते है। 

जैसा की मैंने ऊपर कहा की यह मेमरी या मन, हम खुद ही निर्मित करते है। क्योंकि यह सब बेहोशी में होता है इसलिये हम इसे अपना नही मानते है और क़िस्मत या ईश्वर को दोषी ठहराते है। जब की सच्चाई यह है की यह मन, मेमरी या कर्म या नियती हमारे ही बनाये हुए है। मन या कर्म का निर्माण बेहोशी (unconsciousness) मे जीने का परिणाम है। बेहोशी मे रहते हुए ही कर्म बंधन हो सकता है। बेहोशी का मतलब, होश जो हमारी वास्तविकता है उसमे नहीं जीना बल्कि शरीर जो हमारी असलियत नहीं है उसमे जीना। स्वयं को शरीर समझना। शरीर को ‘मैं’ मानना। ‘मैं हूँ’, यह मानना। यह ‘मैं’ भाव, कर्ता भाव को जन्म देता है, जिसका मतलब की मैं यानि यह शरीर सब कुछ करता है या शरीर के कारण सब कुछ होता है। 

अब यदि आपने यह मान लिया की मैं हूँ यानि मेरा अपना व्यक्तिगत अस्तित्व है और मैं ही सब कुछ करता हूँ तो यह बेहोशी हुई क्योंकि आपने उसे सँच मान लिया जो वास्तव मे है नही। ऐसी बेहोशी मे किया गया कोई भी काम आपको बांधेगा क्योंकि यह काम आपकी कल्पना में, आपका हुआ। जब करना आपका हुआ तो फिर उसका जो कर्मफल या परिणाम है वह भी आपको ही लगेगा। अतः समझने की बात यह है की बेहोशी मे किया हुआ हर काम आपको बांधेगा यानि मन का या मेमरी का या याददाश्त का निर्माण करेगा। मेमरी बनने का एक मात्र कारण आपका बेहोशी में जीना है। यह मेमरी या मन ही आपके नये शरीर का कारण भी है। 

तो, सीधी बात यह है कि इस मेमरी या सॉफ्टवेयर से छुटकारा पाना है तो होश में जीना है। होश का मतलब करने वाला मै नहीं, बल्कि चेतना या उर्झा है। शरीर एक यंत्र की भाँति है जो हमें कर्मफल के लिए मिला है और यंत्र या औज़ार की भाँति ही इसे काम मे लेना है। होश में रहकर यदि आप कुछ करते है तो कर्म नही बनते। जो काम हम होश या सजगता (अवेर्नेस) से करते है, हम उसके पार चले जाते है। होश से किया हुआ काम, किया हुआ होकर भी, हमारा किया हुआ नही होता, क्यों कि होश में काम हम करते नही बल्कि काम होता है। होश मे सिर्फ़ होश या सजगता होती है, कर्ता भाव यानि मन या अहंकार नही होता। होश का काम चेतना के स्तर पर होता है और जो काम चेतना मात्र की अभिव्यक्ति होता है वह हमारा करना नही बल्कि होना है और जब काम हमारा नही या कर्ता मैं नहीं, तो फिर कर्म बंधन कैसा? 

अतः समझने की बात यह है की यदि इस मन और शरीर के मैल या जुड़ाव को हमेशा के लिये मिटाना है तो इतना ही करना है की होश मे जीना शुरू कर दीजिये। होश का मतलब शरीर के तल पर नही बल्कि ऊर्जा या चेतना या अवेर्नेस के तल पर जीना। मेडिटेशन यानि ध्यान, होश मे रहने और होश मे जीने की कला का नाम है। 

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