चेतन एवं सचेतन

(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट में व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक पहुँचती है तो, आप इनको नजरंदाज कर दें.)

बस इतना ही अंतर है, मनुष्य और अन्य प्राणियों में। लेकिन यह अंतर बहुत बड़ा अंतर है। यह अंतर ही मनुष्य को और सभी प्राणियों से अलग करता है और विशेष बनाता है। अब दोनों का मतलब और अंतर समझिये। चेतना तो दोनों में है। अन्य प्राणियों में भी ओर मनुष्य में भी। लेकिन सचेतन यानि चेतना के साथ होने की क्षमता, केवल ओर केवल मनुष्य में ही है। अन्य प्राणी कभी भी चेतना या अपनी ऊर्जा के साथ नही हो सकते। अन्य प्राणी अपनी ऊर्जा को कोई दिशा नही दे सकते। अन्य सभी प्राणियों में ऊर्जा लगातार एक ही, यानि निश्चित दिशा में बहती है। और उनकी यह ऊर्जा की दिशा पहले से ही प्रकृति द्वारा तय की हुई होती है। कोई भी जानवर इस ऊर्जा की दिशा को बदल नही सकता। वह इस ऊर्जा को अपने हिसाब से नियंत्रित नही कर सकता। यही कारण है की एक जानवर या दूसरे किसी भी प्राणी की नियति ( डेस्टिनी) पूर्व निर्धारित होती है। 

एक जानवर अपनी नियति का रास्ता नही बदल सकता। उदाहरण के तौर पर कहूँ तो एक कुत्ता, कुत्ते की तरह जन्म लेता है, कुत्ते की तरह ही जीता है ओर कुत्ते की तरह ही मरता है। एक कुत्ता कभी शेर या बिल्ली या कुछ ओर नही बन सकता। एक कुत्ते की ज़िंदगी दो समानान्तर रेखाओं में ही गुजरती है। उसके दोनों रास्ते बंद होते है. एक कुत्ता नीचे की ओर नही जा सकता, तो ऊपर की ओर भी नही जा सकता। इसका एक मात्र कारण है, और वह यह की एक कुत्ता या कोई भी दूसरा प्राणी सचेतन यानि अपनी ऊर्जा का अपने हिसाब से अपनी इच्छा के अनुसार उपयोग नही कर सकता। ऊर्जा निर्माण करती है। जो भी आप इस अस्तित्व में कुछ बना हुआ देखते है वह सभी ऊर्जा की ही निर्मिति या अभिव्यक्ति है। जो कुछ फ़िज़िकल आपको दिखाई देता है वह ऊर्जा द्वारा ही निर्मित है। अतः निर्माण के लिये या कुछ दूसरा बनने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता ओर मदद की ज़रूरत होती है। अन्य प्राणियों में वह चेतना या ऊर्जा तो है जो निर्माण करती है लेकिन उस ऊर्जा पर उनका नियंत्रण नही है। दूसरे प्राणी उस ऊर्जा के साथ यानि सचेतन होकर, उसका किसी ओर काम के लिये उपयोग नही कर सकते। 

लेकिन मनुष्य एक मात्र अपवाद है, जो ऐसा कर सकता है। मानव भव या मानव शरीर की महिमा इसी में है की एक आदमी सचेतन हो सकता है। वह यदि चाहे हाँ, यह आवश्यक है की वह यदि चाहे, तो अपनी ऊर्जा को दिशा दे सकता है। अपनी ऊर्जा का रास्ता बदल सकता है। अपनी ऊर्जा को अपने हाथों में ले सकता है। वह इस ऊर्जा या चेतना के साथ हो सकता है जिसको हमने सचेतन होना कहा है। ऊर्जा को दिशा देने या उसका रास्ता बदलने की क्षमता केवल ओर केवल मनुष्य में ही है। इसका अर्थ यह हुआ की एक मनुष्य का जीवन अन्य जानवरों की तरह दो समानान्तर रेखाओं में नही चलता। हाँ, एक मनुष्य की नीचे की रेखा तो खिंची हुई होती है, यानि नीचे का रास्ता तो बंद होता है लेकिन प्रकृति ने मनुष्य का ऊपर का रास्ता खुला छोड़ा है। ऊपर कोई लाइन नही खिंची है। इसका मतलब यह हुआ की मनुष्य यदि चाहे तो वह ऊपर उठ सकता है। वह पूरी तरह से सचेतन हो सकता है। पूरी तरह से सचेतन होने का मतलब वह इस मनुष्य योनि के पार जा सकता है। वह इस अस्तित्व में विलीन हो सकता है जिसको हमने मोक्ष या निर्वाण या मुक्ति कहा है। मुक्ति मतलब, इस ऊर्जा की शारीरिक अस्तित्व (फ़िज़िकल इग्ज़िस्टेन्स) से मुक्ति। 

लेकिन यह आदमी को स्वयं ही करना पड़ता है. कोई दूसरा नहीं कर सकता है. दूसरा केवल मदद कर सकता है, ऊर्जा की दिशा बदलने में सहायक हो सकता है. लेकिन यह काम स्वयं आपको ही करना होता है ओर वह भी इस शरीर मे होते हुए करना होता है, इसलिये मानव शरीर को महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इस मानव शरीर में ही मुक्त होने की संभावना है। मानव शरीर में हो कर ही इस शारीरिक अस्तित्त्व (बोडिली इग्ज़िस्टेन्स) से मुक्त हुआ जा सकता है। अन्य शरीरों में यह सम्भावना नही है। एक मनुष्य अपनी ऊर्जा का रास्ता बदल कर संसार से समाधि की ओर जा सकता है। फ़िज़िकल से नोनफ़िज़िकल हो सकता है। तभी मानव होने की महिमा ओर महत्ता है। अन्यथा मनुष्य का जीवन भी दूसरे जानवरों की तरह ही है। अपनी ऊर्जा की दिशा बदल कर मनुष्य शरीर के आगे जा सकता है। उसी में मानव होने की सार्थकता है। यदि इस क्षमता का उपयोग आपने नही किया तो यह जन्म व्यर्थ जाने वाला है। ओर व्यर्थ होने का मतलब पुनः मनुष्य शरीर में आना तय है। 

नियति तो हमारी भी है ओर पूर्व निर्धारित है। हम मनुष्य के शरीर में जन्म लेते है और हमे मनुष्य के रूप में जीने कि नियति मिलती है. लेकिन एक मनुष्य चाहे तो अपनी ऊर्जा की नियत या तय दिशा को बदल कर मनुष्य से ऊपर उठ सकता है। वह मनुष्य के शरीर में होकर भी ईश्वर की तरह जी सकता है और ईश्वर यानि सचेतन इस शरीर को छोड़ सकता है। शरीर को सचेतन छोड़ना एक ऐसी मृत्यु है जिसका फिर कोई जन्म नही है। सचेतन शरीर को छोड़ना, शरीर से हमेशा के लिए  मुक्त होना है जिसको मोक्ष या मुक्ति कहा गया है। ध्यान (मैडिटेशन) एक मात्र ऐसी विधी है जो आपको अपनी ऊर्जा को अपने नियंत्रण में करना सिखाती है. (अगले अंक में - "सचेतन कैसे बने यानि अपनी ऊर्जा को नयी दिशा कैसे दें?")

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