सचेतन कैसे बने यानि अपनी ऊर्जा को नयी दिशा कैसे दें?

 ( पिछले अंक - 'चेतन एवं सचेतन' – से आगे )

जैसा कि मैंने पिछले अंक मे बताया की, मनुष्य एक मात्र ऐसा प्राणी है जो यदि चाहे तो सचेतन हो सकता है यानि अपनी ऊर्जा को नियंत्रित कर सकता है। अपनी ऊर्जा को नयी दिशा दे सकता है, जो अन्य प्राणी नही कर सकते। इसी में मानव होने की गरिमा है क्योंकि की अपनी ऊर्जा का रास्ता बदल कर आदमी अपनी नियति को बदल सकता है। अन्य प्राणियों की भाँति, नियति तो हमारी भी होती है और पूर्व निर्धारित होती है, जो एक तय रास्ते पर चलती है। नियति को ही प्रारब्ध कहा गया है जो इस शरीर के लिये तय होती है। 

अब मैं, आपको बताऊँ की हमारी ऊर्जा भी नियत या तय मार्ग पर ही चलती है यानि पूर्व निर्धारित तरीक़े से जैसे की दूसरे प्राणियों में होता है। यह पूर्व निर्धारित तरीक़ा शरीर का यानि संसार का तरीक़ा या रास्ता है। मतलब शरीर के लिए ओर शरीर होकर जीने के लिये। नियति के हिसाब से चलने पर एक मनुष्य केवल मनुष्य या शरीर होकर ही सीमित हो जाता है, जैसे की एक कुत्ता, कुत्ता होने तक ही सीमित होता है. इसका मतलब यह है की अभी यह हमारी ऊर्जा हमेशा संसार की ओर बह रही है यानि सम्भोग (सेक्स) की ओर बह रही है। सम्भोग का मतलब वह नही जो हम सामान्य अर्थों में समझते है। नही, सम्भोग यानि शरीर यानि संसार यानि फ़िज़िकल। संसार, फ़िज़िकल है यानि शरीर है। संसार यानि शरीर यानि फ़िज़िकल, जिसकि उत्पत्ति दो विपरीत ऊर्जाओं के मिलन से होती है ओर विपरीत में ही शरीर या संसार चलता है ओर विद्यमान होता है। विपरीत यानि रात-दिन; आदमी-औरत; सुख-दुःख आदि, के बिना शरीर या संसार का अस्तित्व नही हो सकता। वास्तव में संसार का दूसरा नाम विपरीत ही है। अंत: संसार और सम्भोग (सेक्स) एक दूसरे के पर्याय है। तो मैं आपको बता रहा था की हमारी ऊर्जा का नियत या तय रास्ता सम्भोग यानि संसार की तरफ़ है। यही कारण है की अभी प्रति पल हमारी ऊर्जा संसार की ओर बह रही है। आपका मन, प्रति पल संसार की ओर दोड रहा है। आपका मन आपका संसार है क्योंकि मन मतलब संसार, मन मतलब शरीर। मन सूक्ष्म है ओर शरीर सकल है, बस इतना ही अंतर है। यह मन का दोड़ना, ऊर्जा का दौड़ना है। मन ऊर्जा ही है। यह मन जब दोड़ता है तो हमेशा संसार की ओर ही दौड़ता है और हमारे लिए नित-नये संसार बनाता है यानि सांसारिक सुख सुविधाओं का निर्माण और विस्तार होता है। संसार और कुछ नही “मैं “और “मेरा “ का विस्तार मात्र ही है। 

ऊर्जा का संसार की ओर यह रास्ता या बहाव डिफ़ॉल्ट-मोड की तरह है जो हमें जन्म के समय से ही मिल जाता है। यह डिफ़ॉल्ट-मोड हमें इस शरीर में पूरा करना होता है जिसको कर्मफल कहा गया है। शरीर कर्मफल के लिये ही मिलता है। शरीर इस प्रारब्ध यानि नियति को पूरा करने के लिए ही मिलता है जिसे कर्मफल कहा गया है। तो एक मनुष्य यदि जन्म से मृत्यु तक इस इसी ऊर्जा के तय रास्ते पर चलेगा तो वह एक मनुष्य की तरह ही जिएगा और मनुष्य रहकर ही मरेगा भी। जैसे की एक कुत्ता, कुत्ते की तरह जन्मता है। कुत्ते की तरह से जीता है और अंत में कुत्ता रहकर ही मरता है। 

तो आप यदि, याद करें तो मैंने इस पोस्ट के ओर पिछले पोस्ट के शुरुआत में कहा था की यदि आदमी चाहे तो, वह अपनी ऊर्जा का रास्ता बदल सकता है ओर सम्भोग ( संसार) से समाधि को प्राप्त कर सकता है। चाहने का मतलब यह हुआ की अभी हमारी ऊर्जा पूर्व निर्धारित एवं पूर्व निश्चित मार्ग यानि संसार की ओर ही  बह रही है, जो हमारा डिफ़ॉल्ट-मोड है। डिफ़ॉल्ट-मोड यानि ऊर्जा का बाहर की ओर बहना। यही कारण है की हम अपनी वर्तमान स्थिति में बहिर्मुखी है क्योंकि ऊर्जा स्वतः ही बाहर यानि सांसारिक विषय-वस्तु की ओर बह रही है। अब ऊर्जा की दिशा मोड़ देने का मतलब या ऊर्जा को नयी दिशा देने का मतलब है, ऊर्जा को बाहर से अंदर की ओर मोड देना। ऊर्जा के बहाव को बाहर से अंदर की ओर करना, बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होना है। ये दो ही विकल्प है यहाँ होने के। संसार मतलब बाहर ओर डिवाइन या समाधि मतलब अंदर। तीसरा कोई रास्ता या विकल्प नही है। या तो आप एक मन यानि शरीर बनकर यहाँ जी सकते है या फिर मन यानि शरीर के परे जाकर। मन, संसार ओर संसार का रास्ता है। मन के परे या अंदर का रास्ता, समाधि का है। 

अब समझने वाली बात यह है कि, मन ओर समाधि एक ही सिक्के के दो पहलू है। लेकिन दोनों साथ नही हो सकते, जैसे एक सिक्के के दोनों पहलुओं को आप एक साथ नही देख सकते। जब मन है तो, समाधि नही ओर जब समाधि है, तो सम्भोग या संसार नही। ऊर्जा जब बहती है तो संसार की ओर बहती है ओर संसार का निर्माण करती है। लेकिन यही ऊर्जा जब बहना बंद कर दे ओर भीतर ही ठहर जाये तो फिर यही ऊर्जा आपके लिये समाधि लाती है। ऊर्जा वही है, अंतर केवल उसके बहाव या ठहरने का है। ऊर्जा बहे तो बहिर्मुखी ओर ऊर्जा भीतर ठहर जाए तो अंतर्मुखी या समाधि। क्योंकि ऊर्जा जब ठहर जाती है तो उस ऊर्जा का रूपांतरण होता है और वही रूपांतरित ऊर्जा समाधि बनती है। ऊर्जा का ऊर्जा में विश्राम, ऊर्जा का ऊर्जा में ठहर जाना, मन का मन में विश्राम समाधि है; उर्जा का रूपांतरण है। मन का समाधि में परिवर्तन है। 

बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होना यानि ऊर्जा को बाहर से अंदर की ओर मोड़ना या दूसरी दिशा देने का मतलब ही आध्यात्मिक होना है। आध्यात्मिक होने का वह मतलब क़तई नही जो हम सामान्यतः समझते है। नही। आध्यात्मिक होने का मतलब ऊर्जा को नयी दिशा देना; ऊर्जा को संसार (सम्भोग) से मोड़कर समाधि की सम्भावना की ओर लाने का है। क्योंकि बहिर्मुखी मतलब सांसारिक ओर अंतर्मुखी मतलब अध्यात्मिक। ध्यान मेडिटेशन बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होने का या ऊर्जा की दिशा बदलने का या आध्यात्मिक होने का एक मात्र तरीक़ा है।

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