शरीर नही है। शरीर होने का भ्रम मात्र है।

शरीर नही है। शरीर के होने का केवल एक भ्रम है। शरीर होने के इसी भ्रम से जो काल्पनिक ‘मैं’ पैदा होता है, उसी का नाम अहंकार है. यही भ्रम हमारी सारी समस्याओं, आपसी कलह, मतभेद और बंधन का कारण भी है। जिसे आप शरीर मान रहे है, वह शरीर नही है, बल्कि कुछ मात्रा में ऊर्जा है, जो उस शरीर में एक निश्चित तरीक़े में काम कर रही है। शरीर मात्र एक आवरण है, जो इस ऊर्जा ने कुछ समय के लिये औढ रखा है। आप जिस शरीर को, उदाहरण के तौर पर, मोहन समझते है और मोहन समझ कर व्यवहार कर रहे है, वह सिर्फ़ एक ढांचा मात्र है। इस शरीर या ढांचे में, मोहन जैसा कुछ भी नही। नाम एक पहचान है, जिसकी एक सीमित उपयोगिता है। उससे ज़्यादा और कुछ भी नही। 

शरीर केवल साधन है, उस ऊर्जा के लिये जो वास्तव में उस शरीर में काम कर रही है, जिसे आप मोहन या अन्य किसी भी नाम से जानते है। जब इस शरीर को कोई देखता है, तो कोई उसे अपना भाई, पति, पिता, जीजा आदि समझता है और अपने-अपने हिसाब से, इस शरीर के प्रति भाव पैदा करता है। जिसे आप, अपना या पराया मानते और जानते है, शरीर के नाम से जैसे, भाई, बहन, पति, पत्नी, पिता, बेटा आदि वास्तव में शरीर नही बल्कि कुछ ऊर्जा है जो उस आवरण यानि शरीर में काम कर रही है। 

अब आप जिसे मोहन या अपना, पराया समझ कर कई तरह के भाव और विचार उत्पन्न करते है उनका क्या? वही भाव यानि राग-द्वेष आपके बंधन का कारण बन रहे है। आप तो उस शरीर को वास्तविकता समझ कर सभी तरह के भाव पैदा करते है, जबकि वही शरीर, जिसके लिये आपने ज़िंदगी भर अलग-अलग भाव पैदा किए, वह शरीर तो मृत्यु के बाद आपके सामने, यहीं पड़ा रह जाता है, जिसे आप आग के हवाले कर देते है। और वह ऊर्जा जिसके शरीर को, आपने मोहन या अपना-पराया माना और जाना और उस शरीर के प्रति राग-द्वेष किया, वह ऊर्जा तो अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ती है। जबकि आप इस भ्रम के यानि शरीर को मोहन मानने के शिकार हो जाते है, क्योंकि नया बंधन निर्मित कर लेते है। 

इस तरह, दुसरे को शरीर मानकर, आप भाव पैदा कर रहे क्योंकि भाव शरीर के लिए और शरीर के प्रति होते है। और अपने लिये नये बंधन निर्मित भी कर रहे है और पुराने बंधनों को और प्रगाढ़ कर रहे है, जबकि शरीर है ही नहीं, शरीर के केवल होने का भ्रम है। 

इसलिये इस भ्रम से बाहर आइये। कोई शरीर नही है। शरीर होने का भ्रम मात्र है। जो भी शरीर आप देखते है वह ओर कुछ नहीं बल्कि, एक निश्चित मात्रा में ऊर्जा है, जो अपना काम, एक शरीर के ज़रिये समाप्त करके, अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ती है। आप भी शरीर नही बल्कि वही ऊर्जा है, जो आपके इस आवरण में, अपना वास किये हुए है। इस शरीर और ऊर्जा के साथ अपना जुड़ाव मत रखिये। आप शुद्ध चेतना और केवल ज्ञाता, दृष्टा और साक्षी है। ध्यान यानि मैडिटेशन, इस शरीर और उर्जा के जुडाव को समाप्त करने कि विधि का नाम है 

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