कौवे की काउँ-काउँ और हमारी वर्तमान स्थिति में कोई ज़्यादा फर्क नहीं है।
(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट
में व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक
पहुँचती है तो, आप इनको नजरंदाज कर दें.)
आपने सुना कौवा दिन भर काउँ-काउँ करता रहता है? और आप, उसके इस करने से, परेशान होते है। लेकिन क्या कभी आपने देखा कि आप भी दिन भर अपनी जाग्रत अवस्था में और कुछ नही बल्कि काउँ-काउँ ही करते रहते है। फर्क ख़ाली करने के तरीक़े का है। आपकी यही काउँ-काउँ यानि शोर आपके अंदर चलता रहता है। दोनों आदतन है, जिस पर कोई नियंत्रण नही है। आपका शोर जो माइंड में चलता रहता है, वह आपके नियंत्रण में नही है और कौवे का करना भी उसके नियंत्रण में नही है।
अब कौवे को तो मैंने उदाहरण के रूप में चुना। लेकिन यह अन्य सभी प्राणियों पर भी लागू होता है क्योंकि अन्य सभी प्राणी भी आदतन ही रहते है। अब आदमी और कौवे या अन्य सभी प्राणियों में एक फर्क है जो बहुत बड़ा है और यही फर्क आदमी को अन्य प्राणियों से अलग भी करता है। यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है और फर्क यह है की आदमी यदि चाहे तो अपनी काउँ-काउँ यानि वह सब बकवास जो दिन भर टेप-रिकॉर्डर की भाँति उसके अन्दर चलती है, उसको पूरी तरह से नियंत्रण में कर सकता है, जो कौवा यानि अन्य प्राणी नही कर सकते। यही वह फर्क है जो आदमी को अन्य सभी प्राणियों से अलग करता है और इसी फर्क में ही मानव-भव की गरिमा और महिमा है। क्योंकि आदमी यदि स्वयं की काउँ-काउँ को नियंत्रण में कर ले, तो आदमी ईश्वर यानि डिवाइन बन सकता है।
मैंने इसीलिये शुरू में कहा की हमारी वर्तमान स्थिति और कौवे की काउँ-काउँ में फर्क नही है क्योंकि कौवा भी अपनी काउँ-काउँ आदतन कर रहा है और हमारी काउँ-काउँ भी आदतन ही चल रही है। आदत शरीर के लिये है और ज़रूरी है ताकि शरीर की रक्षा हो सके और शरीर को सुरक्षित रखा जा सके। इस तरह आदतें अन्य प्राणियों के लिये प्रकृति की व्यवस्था है, जो उनके लिये ज़रूरी है क्योंकि अन्य प्राणी केवल और केवल शरीर होकर और शरीर के लिये ही जीते है। अतः आदतें उनके लिये ज़रूरी है ताकि यही आदतें उनको सुरक्षित रख सके और इन्ही आदतों की वजह से उनका शरीर बचाया जा सके।
लेकिन जब आदमी की बात आती है तो यदि आदमी भी अपने सब काम आदतन करे तो फिर हमारे और अन्य प्राणियों में कोई फर्क नही रह जायेगा। हम भी यदि अन्य प्राणियों की तरह शरीर होकर ही जिंदा रहे या सब केवल शरीर के लिये ही करे, तो हम उस सम्भावना को उपलब्ध नही हो सकते जिस सम्भावना को भगवान महावीर, गौतम बुद्ध आदि ने मानव शरीर में हो कर उपलब्ध की। इसी सम्भावना को उन्होंने मानव शरीर में होकर जाना और उसको प्राप्त किया और इसी वजह से आज हम उनकी पूजा करते है। क्योंकि डिवाइन या ईश्वर होने की सम्भावना केवल और केवल मनुष्य में ही है।
तो मैं आपको यह बताना चाहता हूँ की कौवा का तो अपने पर नियंत्रण नही है और उसका उसमें दोष भी नही है क्योंकि प्रकृति ने उसे वह क़ाबिलियत या योग्यता दी ही नही। लेकिन प्रकृति हम यानि आदमी पर विशेष मेहरबान है और यह मेहरबानी प्रकृति ने हमें यह योग्यता देकर की, कि यदि हम चाहे तो, अपने पर नियंत्रण यानि अपनी करनी पर नियंत्रण पा सकते है। यह नियंत्रण हम अपने पर लाये, तभी हम अन्य प्राणियों से अलग हो सकते है, अन्यथा प्रकृति द्वारा की गयी यह विशेष महरबानि व्यर्थ चली जाएगी। अन्य प्राणियों की तरह हम भी केवल एक शरीर बनकर रह जाएँगे और शरीर होकर ही मर भी जायेंगे।
लेकिन जिस क्षण आपने यह जाना की मुझे अपने पर नियंत्रण पाना है, अपनी करनी को कंट्रोल करना है, तो समझिये की आपकी महाविरत्व या बुद्ध्त्व को उपलब्ध होने की यात्रा की शुरुआत हुई। बुद्ध्त्वका मतलब यही की अब आपका कोई भी काम आदतन नहीं, बल्कि आपके चुनाव से है। अब आप उतना ही करते है, जितना आवश्यक है। अनावश्यक या आदतन, अब आप कुछ भी नही करते। बुद्ध का मतलब, अब आप अपने मन यानि माइंड की अभिव्यक्ति नही बल्कि अब आप, अपनी चेतना यानि अपने स्वभाव की अभिव्यक्ति बन गये है। ध्यान यानि मैडिटेशन स्वयं पर नियंत्रण पाने की यानि अपने महाविरत्व को उपलब्ध होने की विधि का नाम है।
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