एक श्रधांजलि….

मैं, आप लोगों को यह बताना चाहता हूँ की, मेरे एक साथी, जिनके साथ मैंने लम्बे समय तक बैंक ऑफ राजस्थान में, साथ काम किया था और वे ब्लॉगग्रूप से भी जुड़े हुए थे, दो दिन पहले, उनका अचानक देहावसान हो गया। अब बात मृत्यु की नही है, क्योंकि शरीर को तो एक ना एक दिन गिरना ही है। इस पोस्ट के ज़रिये, जो मैं उनकी श्रधांजलि में लिख रहा हूँ, आप लोगों को एक बहुत ही ख़ास बात बताना चाहता हूँ। शरीर के प्रति हम सभी तरह के भाव यानि राग-द्वेष आदि के उत्पन्न करते है। क्योंकि भाव, केवल शरीर या फ़िज़िकल के लिये और शरीर के लिये ही उत्पन्न होते है। नोन-फ़िज़िकल यानि बाहर जो ख़ालीपन यानि एम्प्टीनेस आप देखते है, उसके प्रति कभी कोई भाव उत्पन्न नही हो सकते। अब इस शरीर के प्रति, हम रोज़ाना की ज़िंदगी में, सभी तरह के भाव उत्पन्न करते है। चाहे वह क्रोध हो, ईर्ष्या हो, काम वासना हो या प्यार, मोहब्बत का भाव आदि हो, लेकिन यह सब भाव उस शरीर के प्रति उत्पन्न होते है, जिसको हमने एक नाम दे दिया और उस नाम को यानि शरीर को हमने श्याम, राम, शान्तिप्रकाश आदि मान लिया। 

अब समझने की बात यह है की, शरीर तो जड़ है और शरीर तो एक माध्यम है जिसके द्वारा सभी करना हो रहा है। मेरे शरीर को आप शान्ति प्रकाश समझते है, जब की शरीर सबके एक है। वही मिट्टी है, जिससे मैं और आप बने है या बाहर जो भी कुछ आपको दिखायी देता है, वह भी वही मिट्टी है। अब जिस शरीर के प्रति आप कई तरह के भाव उत्पन्न कर रहे है, वह शरीर तो मृत्यु के पश्चात भी यहीं हमारे सामने ही पड़ा रहता है। जब की हमारे राग-द्वेष आदि के भाव, जो हमने उस शरीर के प्रति उत्पन्न किए है, वे हमारे लिये नये कर्मों और नये शरीरों का कारण बनते है, क्योंकि भाव ऊर्जा अशुद्ध ऊर्जा है, जो नये शरीर का कारण बनती है. भाव ऊर्जा, बिना अभिव्यक्ति के नही रह सकती और अभिव्यक्ति कोई माध्यम यानि शरीर के बिना नही हो सकती।

अब जो बात मैं आप लोगों को बताना चाहता हूँ, वह यह की जिस शरीर को आप राम, श्याम, आदि समझते है और कई क़िस्म के भाव उत्पन्न करते है, वह असलियत में और कुछ नही बल्कि कुछ मात्रा में भाव ऊर्जा या मन है, जो एक पूर्व निश्चित तरीक़े से उस शरीर के द्वारा अभिव्यक्त हो रही है। वास्तविकता तो यह है कि जिस शरीर से यह भाव उर्जा अभिव्यक्त हो रही है, उस शरीर का मालिक भी उससे अनजान है उन भावों से. जबकि हम उस शरीर को सभी कुछ मानकर, उसके प्रति, भाव उत्पन्न कर रहे है। जैसा की मैंने ऊपर बताया शरीर तो एक साधन है, अभिव्यक्ति का। लेकिन क्योंकि की, हमें केवल शरीर ही दिखायी देता है और हम शरीर ही देखते है, इसलिये हम उसको नही देख पाते जो उस शरीर के अन्दर बैठा है ओर उस शरीर को वास्तव में हांक रहा है। यह बिल्कुल उसी तरह है, जैसे की कार और ड्राइवर। क्योंकि हमारा ध्यान कार पर यानि जो शारीरिक यानि बाहर दिखायी देता है, उसी पर होता है, इसलिए हम उस अंदर बैठे हुए ड्राइवर को कभी भी नही जान पाते। क्योंकि हम शरीर में ही उलझ जाते है, इसलिए शरीर के अंदर बैठे उस भाव ऊर्जा यानि मन को नही जान पाते जो उस शरीर के माध्यम से अभिव्यक्त हो रही है। हमने  तरह-तरह के भाव उस शरीर के लिए उत्पन्न किये और कर्मों का निर्माण किया लेकिन वह शरीर जिसके प्रति हमने यह सब किया, वह तो यहीं रह जाता है और उसमें बैठा सूक्ष्म या मन शरीर अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ता है.

आप यदि इस कार और ड्राइवर का भेद समझ ले, आप यदि इस मन और शरीर का भेद समझ ले, तो फिर आप इस शरीर के प्रति कोई भाव उत्पन्न नही करेंगे। आप जान जायेंगे की शरीर एक साधन है, जबकि असली कर्ता, वह मन या भाव ऊर्जा है, जो एक निश्चित तरीक़े में, उस शरीर से प्रवाहित या अभिव्यक्त हो रही है। दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. सम्बन्ध इतना ही कि मन या भाव उर्जा अभियक्ति के लिए यह शरीर लेती है. फिर आप उस शरीर के प्रति कोई भाव उत्पन्न नही करेंगे, बल्कि केवल और केवल चेतना यानि सजगता बन कर जियेंगे। लेकिन आप यदि इस शरीर पर ही अटक जायेंगे, तो आप असली चालक यानि मन को, असली कर्ता को नहीं जान पाएँगे। वास्तव में तो वह मन रूपी ऊर्जा जिसको जीवात्मा भी कहा गया है, अलग-अलग शरीर धारण करती है, क्योंकि जब तक इस भाव ऊर्जा का शुद्धीकरण नही होता, तब तक यह यात्रा क़ायम रहती है। कुछ नही बदलता केवल शरीर बदलते है। इसलिए शरीर की मृत्यु असली मृत्यु नही है। असली मृत्यु तो इस भाव ऊर्जा या मन की है जिसे शरीर की मृत्यु भी नही मार सकती बल्कि उसका केवल और केवल हनन यानि डिसलूशन (dissolution), इस शरीर में रहकर, आप स्वयं अपने हाथों से ही कर सकते है। ध्यान यानि मेडिटेशन, मन के हनन यानि भाव ऊर्जा के शुद्धीकरण की विधि का नाम है। 

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