ध्यान का मतलब क्या और कैसे करें?

वैसे मैं, नियमित रूप से ध्यान पर लिखता हूँ और बोलता भी हूँ। वास्तव में यदि बताऊँ तो, मै जो भी लिखता या बोलता हूँ, वह किसी ओर विषय पर नही बल्कि ध्यान पर ही बोलना और लिखना है। हाँ, कहने का तरीक़ा अलग हो सकता है लेकिन सार रूप में वह ध्यान पर ही है। आप सभी लोगों की माँग को मध्य नज़र रखते हुए, विशेष रूप से ध्यान के विषय पर ही यह पोस्ट लिखा है। इस पोस्ट में, मैं आप लोगों को यह बताऊँगा की ध्यान क्या है और कैसे करें? 

तो पहली बात कि ध्यान क्या है? ध्यान का सीधा और सरल शब्दों में अर्थ है, अपने स्वभाव में या अपनी स्वाभाविक स्थिति (natural state) में होना है। स्वाभाविक स्थिति का मतलब है, वह स्थिति जिसमें कोई दूसरा नही होता बल्कि आपका स्वभाव ही होता है। स्वाभाविक स्थिति का मतलब केवल उसका होना, जो आपकी वास्तविकता यानि असलियत है। 

आपने देखा होगा की, जब भी आपको गहरी नीन्द आती है, तो जागने के बाद, आप यह कहते है की ‘बहुत अच्छी नीन्द आयी’ और आप बहुत ही ताज़ा महसूस करते है। आपको एक विशेष आनन्द की अनुभूति होती है। जानते है ऐसा क्यों? ऐसा इसलिये की, गहरी नीन्द आपकी स्वाभाविक अवस्था है। क्योंकि गहरी नीन्द में दूसरा कोई नही होता बल्कि आपकी असलियत, आपका स्वभाव, आपकी वास्तविकता होती है। जो आनन्द की अनुभूति, आपको गहरी नीन्द से गुजरने के बाद होती है, वह आनन्द वास्तव में आपका अपने स्वभाव में या स्वाभाविक स्थिति में होने का है। आनन्द या ताज़ा होने की अनुभूति, आपके निज स्वरूप में होने की है। 

क्योंकि, हमारी जागृत अवस्था में, हमारे अनुभव में दूसरा होता है, यानि हमारे अनुभव में संसार होता है, शरीर और मन भी होता है और यही कारण है की, जागृत अवस्था में हम अपने स्वभाव या स्वाभाविक स्थिति में नही होते और इसी वजह से हम जागृत अवस्था में दुखी होते है। दुःख, स्वभाव में नहीं होने ओर विभाव में होने से है.

लेकिन इसके विपरीत गहरी नीन्द में हम अपने स्वभाव में होते है। गहरी नीन्द में हमारे अनुभव में दूसरा ओर कुछ भी मोजूद नही होता बल्कि केवल और केवल हमारी चेतना मोजूद होती है, जिसकी वजह से हम जिंदा होते है। देखा जाये तो, गहरी नीन्द एक मौत ही है, क्योंकि गहरी नींद में, हमें हमारे होने का कोई अहसास या अनुभव नही होता। लेकिन चेतना जो की इस अस्तित्व की और हमारी असलियत है, उसके होते हुए, हम इस शरीर में जिंदा होते है। 

तो पहली बात तो आप लोगों को यह समझ में आ जानी चाहिये की, ध्यान का मतलब अपने स्वभाव, अपनी स्वाभाविक अवस्था यानि चेतना में होना है। तो ध्यान का मतलब अपनी चेतना यानि अपने निज स्वरूप में होना है। चेतना में दूसरा नही होता। चेतना में सिर्फ़ और सिर्फ़ चेतना होती है और इसलिये चेतना में होना ही, ध्यान में होना है। 

दूसरी बात कि ध्यान कैसे करें? तो मैंने आप लोगों को बताया की अपने स्वभाव, अपनी चेतना यानि अपनी स्वाभाविक स्थिति में होना ध्यान है। तो इसका मतलब यह हुआ की गहरी नीन्द जो की हमारी स्वाभाविक स्थिति है, उसमें होना ध्यान है। लेकिन यह सही नही है। क्योंकि गहरी नींद हमारी स्वाभाविक स्थिति होने के बावजूद भी, ध्यान की स्थिति नही मानी जा सकती क्योंकि गहरी नीन्द में हमारा स्वभाव या चेतना तो मोजूद होती है लेकिन हम उस स्वाभाविक स्थिति या चेतना का अनुभव नही कर पाते क्योंकि नीन्द बेहोशी की स्थिति है। गहरी नीन्द में होश नही होता और इसलिये हम हमारी असलियत से रूबरू नही हो पाते। 

ध्यान की मुख्य बात, होश का होना है। यदि होश को गहरी नीन्द के साथ जोड़ दिया जाये, तो वही गहरी नींद यानि बेहोशी ध्यान बन सकती है और ध्यान या होश के साथ हम अपनी स्वाभाविक स्थिति का अनुभव कर सकते है। इसलिये गहरी नीन्द को जानकर ही, यह बंद आँखों का अभ्यास जिसे हमने ध्यान कहा है, उसकी शुरुआत हुई। इसी गहरी नींद का अभ्यास अपनी जागृत अवस्था में, जब हम कुछ मात्रा में होश में होते है, उस समय किया जाने लगा। यानि जागृत अवस्था में नीन्द की नक़ल करने का अभ्यास शुरू हुआ, जिसे ही ध्यान कहा गया है। लेकिन एक बड़ा फर्क दोनों में है, जो दोनो को अलग करता है, और वह फर्क है, होश। जो होश गहरी नींद में लुप्त हो जाता है, इस होश को अपनी जागृत अवस्था में, गहरी नीन्द की नक़ल के अभ्यास के दौरान बनाये रखने को ही ध्यान कहा गया है। 

अतः ध्यान का मतलब, वह अभ्यास जो और कुछ नही बल्कि नींद की तरह ही सो जाना है लेकिन होश के साथ सोना है। जागते हुए सोने के अभ्यास को ही, ध्यान कहा गया है। मतलब यह की अपने शरीर और मन को पूरी तरह शिथिल कर देना या सुला देना है, जैसा की नीन्द में होता है लेकिन भीतर पूरी तरह से जागे हुए होना है, भीतर होश से भरे हुए होना है। जागे हुए सोने का मतलब, शरीर और मन के तल पर अपना करना बंद कर देना है। अपना करना बंद कर देने के बाद, होश स्वतः ही है क्योंकि शरीर और मन को शिथिल या शान्त करने के बाद पीछे जो बचता है, वह और कुछ नही बल्कि ध्यान, चेतना, होश, स्वभाव, स्वाभाविक स्थिति, निज स्वभाव – कुछ भी नाम दीजिये- ही है। जागते हुए सोने (conscious sleep) का मतलब है, बाहर यानि शरीर और मन के तल पर सो जाना लेकिन भीतर पूरी तरह से जागे हुए होना है। भीतर पूरी तरह से conscious और aware होना है। 

तो निष्कर्ष रूप में ध्यान का मतलब अपनी चेतना या होश में होना है और चेतना में बने रहने और चेतना को बनाये रखने के सभी तरीके ध्यान करने के ही तरीके है. 

नोट - इस सम्बन्ध में कोई सवाल हो तो आप “ब्लॉगग्रुप” पर व्हाट्सअप्प कर दें. मैं जवाब दे दूंगा. 

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