सन्यास के नाम पर घर छोड़ना मतलब, यह नही जानना की, असली काम क्या है।
(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट में व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक पहुँचती है तो, आप इनको नजरंदाज कर दें.)
जो लोग सन्यास के नाम पर अपना घर-परिवार छोड़ रहें है, तो इसका मतलब यह है की, उन्हें यह मालूम ही नहीं की, काम क्या करना है। उन्हें यह मालूम ही नहीं की, असली काम क्या है। क्योंकि असली काम जो करना है, यदि उसकी जानकारी, उन्हें हो जाये तो, फिर घर छोड़ने की ज़रूरत ही नहीं है। कोई विशेष वस्त्र पहनने की भी ज़रूरत नहीं है।
ज़्यादातर लोगों को तो यह मालूम ही नहीं, की वो घर क्यों छोड़ रहे है। घर छोड़ने यानि सन्यास का मक़सद क्या है, यह उन्हें नहीं मालूम। ज़्यादातर लोग, देखा-देखी में सन्यास लेते है या फिर कई मामले, अपने घर की परिस्थिति या घर के वातावरण की वजह से होते है। लोगों से यदि पूँछा जाये की, वे घर क्यों छोड़ रहे है या सन्यास क्यों ले रहे है, तो जवाब मिलता है, की उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया। अब मेरा यह कहना है की, यदि वैराग्य यानि संसार से डिस्पेसन हो गया है, तो फिर वैसे ही संसार या घर-परिवार छोड़ने की ज़रूरत नहीं रही। क्योंकि वैराग्य के उत्पन्न होने के बाद, फिर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता की, आप घर में रहते है या बाहर यानि जंगल में रहते है। वैराग्य के पैदा होने के बाद, तो आपके लिये सब जगह एक यानि समान है। अब, आप कहीं भी रहे, आपके कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्योंकि वैराग्य का मतलब, अब संसार आपको नहीं पकड़ता। अब आप भरे बाज़ार या संसार में होकर भी, आप निर्लिप्त और अछूते रह सकते है और वही असली सन्यास है। अब आपको बाहर पकड़ का कोई डर नही रहा, क्योंकि डर तभी तक है, जब तक आपमें पकड़ बाक़ी है। पकड़ के भय से मुक्त होना ही वैराग्य या सन्यास है। सन्यास मतलब, अब पकड़ से दूरी हो गई। इस दूरी के होने को ही सन्यास कहा गया है।
तो मैं आपको बता रहा था की, ज़्यादातर लोगों को यह मालूम ही नहीं, की वे घर क्यों छोड़ रहे है या सन्यास क्यों ले रहे है। सन्यास का सही मक़सद, शारीरिक अस्तित्व के परे जाना है। जिसे हम लोग मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण भी कहते है। अब मुक्ति का संबंध घर छोड़ने से नहीं है। मुक्ति का सीधा संबंध, उसको छोड़ने से है, उससे दूरी बनाने से है, जो आपका अपना नही है, आपका स्वभाव नहीं है, आपकी असलियत नही है। माइंड यानि मन आपका नहीं है। आपकी असलियत नही। है। मन, सूक्ष्म शरीर है, जो इस स्थूल शरीर का कारण है। अत, इस सूक्ष्म शरीर को त्यागना असली त्याग है। इस सूक्ष्म शरीर से दूरी बनाना, सन्यास है। इस माइंड को गलाना, असली काम है। क्योंकि यदि यह सूक्ष्म शरीर पूरी तरह से गल जाये, यानि पूरी तरह से डिसॉल्व हो जाये तो फिर आप मुक्त हुए, क्योंकि अब स्थूल शरीर का कारण नहीं रहा। जब कारण नहीं रहा, तो उसका प्रभाव भी नही हो सकता।
अत, मैंने जहां से शुरू किया वही पर वापस आता हूँ। मैंने इस लेख के शुरू में कहा, की सन्यास के नाम पर घर छोड़ने का मतलब, यह नही जानना की असली काम यानि शारीरिक अस्तित्व से परे जाने के लिये करना क्या है। क्योंकि यदि आप यह जान लेते है, की शारीरिक अस्तित्व से मुक्त होने के लिये सूक्ष्म शरीर यानि माइंड से मुक्त होना है, तो फिर आप घर नही छोड़ेंगे सन्यास नही लेंगे। क्योंकि काम आंतरिक है। बाहरी नही। आपका मन, आपका माइंड, जो आपका सूक्ष्म शरीर है, वह तो हमेशा आपके साथ है, फिर आप कही भी जाये। जब काम आंतरिक है, यानि काम, मन को गिराना यानि सूक्ष्म शरीर को मिटाना है, तो फिर यह काम तो घर पर रहकर भी हो सकता। घर-परिवार छोड़ने की ज़रूरत कहाँ है?
लेकिन ज़्यादातर लोग सन्यास के नाम पर, इसके बिल्कुल विपरीत कर रहे है. वे लोग वहां होकर भी बाहर से इकट्ठा कर रहे है। सन्यासी होकर भी, बाहर से जानकारी जमा कर रहे है, जो सन्यास के मक़सद के बिल्कुल विपरीत और उल्टा है। मुक्त होने यानि अपने माइंड को मिटाने के लिये, आपको जो पहले से जमा है, उससे ख़ाली होना है। उस बाहरी को मिटाना है, जो आपका स्वभाव नहीं है। जबकि ये लोग सन्यासी होकर बाहर से और ज्ञान एकत्र कर रहे है, जो उनके लिए नये बंधनों और नये जन्मों का कारण बन रहे है। मेरा तो यह कहना है की, एक सन्यासी जो बाहर से नयी-नयी जानकारी जमा कर रहा है, उसमें और एक दुकानदार में कोई फ़र्क़ नही है। क्यों की दोनों ही बाहर का इकठ्ठा कर रहे है, बाहर से जमा कर रहे है। मेरे हिसाब से तो एक दुकानदार, एक सन्यासी से भी बेहतर है, क्यों की वह, तो वही कर रहा है, जो वह जानता है। वह जो भी कर रहा है, अज्ञान में कर रहा है. जबकि एक सन्यासी, सन्यास के रास्ते पर होकर भी, सन्यास के विपरीत कर रहा है। वह घर छोड़ कर भी, नये घरों यानि नये शरीरों का कारण इकट्ठा कर रहा है। मतलब सन्यासी होकर भी अज्ञान के रास्ते पर ही चला रहा है. अज्ञान का रास्ता मतलब संसार का रास्ता. इसलिए सन्यासी होकर भी संसार के रास्ते पर चल रहा है और इसलिए ज्यादा दोषी है.
इसलिये, मेरा यह कहना है की, संन्यास लेना या संन्यास के नाम पर घर छोड़ना मतलब देखा देखी करना है, एक परम्परा को निभाना मात्र है। उससे ज़्यादा नहीं। वह और कुछ नही बल्कि अहंकार का ही प्रदर्शन है। सन्यास के नाम पर, अपनी संख्या को बढाना है. जबकि असली अर्थ में सन्यास या वैराग्य का मतलब है, अहंकार यानि, माइंड यानि, भीतर कि पकड़ को गिराना और मिटाना है। अहंकार को जिन्दा पकड़ना है. उसको जिन्दा पकड़ना है, जो सोचता है; जो सवाल करता है; जो शक करता है; जो दुखी होता है. इन सबका मतलब एक ही यानि अहंकार है, जिसको जिन्दा पकड़ना है. अहंकार यानि सूक्ष्म शरीर यानि माइंड को जिन्दा पकड़ कर ही, आप उसका सर कुचल सकते है. आप उसका खात्मा कर सकते है.
इसलिए एक असली गुरु यानि वह जो अपने स्वभाव को उपलब्ध हो गया है, वह कभी भी लोगों को सन्यास यानि अपना घर छोड़ने के लिये प्रेरित नहीं करता, कभी उन्हें घर छोड़ने के लिए बाध्य नहीं करता और न ही कभी लोगों को घर छोड़ने की सलाह देता है। गुरु केवल वह काम करता है, जो गुरु को करना होता है और वह काम, एक उपलब्ध गुरु ही कर सकता है और वह काम यह है की, गुरु अपनी उपस्थिति में अपने अनुयायियों को, एक क्षण के लिये उसका स्वाद दे देता है जो है, जो सच है, जो चिर-निरंतर है। बस उसके साथ ही गुरु का काम ख़त्म हो जाता है। फिर अनुयायी उस स्वाद, उस आनन्द, उस ब्लिस का पीछा करते हुए, उसे पाने की साधना करता है, ताकि वह आनन्द हमेशा उसके साथ हो सके।
आनन्द या ब्लिस जो आपको सच्चे गुरु की उपस्थिति में मिलता है, वह अस्तित्व का है, जिसे हमने सच्चिदानंद भी कहा है। सच्चिदानंद मतलब अस्तित्व का यानि सत् का आनन्द। असली गुरु से यदि आप पूंछे की, मैं घर छोड़ना चाहता हूँ, तो वह आपको ऐसा करने से मना कर देगा. वह आपको बतायेगा की असली काम आतंरिक है, जो घर में होकर भी किया जा सकता है. तो जो काम घर पर रह कर हो सकता है, उसके लिए घर छोड़ने की जरुरत कहाँ है? जो काम यदि जंगल में रहकर किया जा सकता है, तो वही काम, घर पर भी हो सकता है। फिर जंगल में जाने की ज़रूरत कहाँ है। ध्यान यानि मैडिटेशन एक मात्र ऐसी विधि है, जो आपको यह बताएगा की सन्यास का मतलब क्या और असली सन्यासी कौन। फिर आप कभी भी घर नहीं छोड़ेंगे, फिर आप घर में हो या बाहर आप अब जगह सन्यासी होंगे.
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