कर्ता नही साक्षी बनिये।
(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट में, व्याकरण
सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक पहुँचती है, तो आप इनको
नजरंदाज कर दें.)
कर्ता
मतलब शरीर होकर, होना है। कर्ता मतलब अहंकार होकर, यहाँ होना है। कर्ता मतलब, ‘मैं
हूँ’. ‘मैं’ एक शरीर हूँ और दूसरा भी शरीर है। खुद का होना और दूसरों का होना
अहंकार है. उस एक को, जो इस अस्तित्व का आधार है, उसको भूला देना और केवल वह जो
दिखाई देता है, उसको याद रखना या उसका होना, अहंकार है और अहंकार में होना है.
दूसरा है, यह भाव ही अहंकार है. क्योंकि केवल एक है, चेतना यानि कांशसनेस ही
है. दूसरा है ही नहीं. मेरे करने से सब हो रहा है, कर्ता भाव है। चूँकि, अभी हमे
साक्षी का कोई अनुभव नहीं, क्योंकि साक्षी को अभी हम नही जानते, इसलिये हम पूरी
तरह कर्ता-भाव में ही स्थित है और यह समझते है की, जो भी करते है या होता है, वह
मेरे किये या मेरे करने से होता है। शरीर को सच मानना और शरीर सब कर रहा है, कर्ता
भाव में होना है। वह जो साक्षी है और जिसकी उपस्थिति में और जिसकी वजह से, सब हो
रहा है यानि असली कर्ता की जानकारी नहीं होने की वजह से जो दिखायी देता है, उसी को
सच मान लेना अहंकार या कर्ता भाव है।
हमारी वर्तमान स्थिति में, चूँकि हम पूरी तरह कर्ता भाव से भरे हुए है, इसलिये जो भी हम करते है, वह हमे बाँधता है। यहाँ तक कि हमारी दैनिक क्रियाएँ, जैसे, ख़ाना, पीना, चलना आदि भी हमे बांधता है। ऐसी स्थिति में जितना बड़ा कर्म होता है, उतना ही बड़ा बंधन, हम अपने लिए निर्मित भी करते है। सीधी सी बात है, की अज्ञान से जो भी होगा या अज्ञान से जो भी उत्पन्न होगा, वह भी अज्ञान ही होगा और अज्ञान आपको बांधेगा।
कर्ता भाव, भोक्ता भाव भी है, क्योंकि हमे शरीर के आगे कुछ भी जानकारी नही और इसलिये शरीर को सच मान कर, हम सब कुछ कर रहे है। यही तो वजह है की, जब भी कुछ शारीरिक या भौतिक हमारे सामने घटित होता है, तो हम उसको भोगना चाहते है। अब भोगना, शाब्दिक अर्थ में नहीं, बल्कि इस अर्थ में की, जो भी होता है, हम उसके साथ जुड़ना चाहते है और जुड़ भी जाते है। हम उसको अपना बनाना चाहते है और बना भी लेते है। प्रति पल, जो हम अपनी प्रतिक्रिया करते है, वह और कुछ नहीं बल्कि भोगना या भोक्ता भाव ही है।
यह हमे
समझना चाहिए, की अपनी प्रतिक्रिया से ही, हम दूसरे से जुड़ते है और उसे अपना बना
लेते है। यही वजह है की, चूँकि अभी हम कर्ता भाव से पूरी तरह लिप्त है और इसलिये
जो भी हम करते है, हाँ फिर से कहता हूँ, की जो भी हम करते है, वह हमे बाँधता है।
और यही वजह है, की हम इस शारीरिक अस्तित्व से मुक्त नही हो पा रहे है और एक के बाद
एक, नये शरीर लिये जा रहे है।
लेकिन साक्षी भाव मुक्ति का मार्ग है। क्योंकि साक्षी में केवल साक्षी है, दूसरा नही है। मुक्ति अकेले होकर ही संभव है। जब तक दूसरा है, तब तक मुक्ति नहीं, बंधन है। अब सीधे शब्दों में, मैं आपको बताऊँ तो साक्षी मतलब अवेयरनेस, चेतना या जागरूकता। अवेयरनेस में कोई विचार, कोई प्रतिक्रिया, कोई शब्द नहीं है। अवेयरनेस शुद्ध जानकारी है। या केवल देखना, जिसे सम्यक् दर्शन भी कहा गया है। अवेयरनेस, साक्षी, चेतना, जागरूकता, होश, सम्यक् दर्शन आदि, कुछ भी कहिये, प्लेन सीइंग है यानि केवल देखना या शुद्ध दर्शन है.
बिना शब्दों, बिना प्रतिक्रिया, बिना विचारों के देखना और होना ही साक्षी का होना है। साक्षी सिर्फ़ है। एक उपस्थिति की तरह। यह पूरा अस्तित्व एक साक्षी, एक उपस्थिति से ज़्यादा नहीं है। चेतना या कॉन्ससियसनेस्स मात्र उपस्थिति है, जिसके होने से सब होता है। चेतना या अस्तित्व की उपस्थिति में, सब होता है और सब हो रहा है. फिर भी यह अस्तित्व उस होने से अछूता है। आज तक, जो भी यहाँ हुआ, वह इस अस्तित्व को छू नही सका। जो भी इस साक्षी की उपस्थिति में होता है या हो रहा है, वह इस साक्षी यानि अस्तित्व को बाँधता नहीं है, क्योंकि साक्षी या चेतना में कर्ता भाव नहीं है। अहंकार नहीं है।
अब यदि
हम समझे, तो यही साक्षी, यही चेतना, यही अवेयरनेस, यही होश या जागरूकता, हम सभी
में भी काम कर रही है। वही असली कर्ता है, जिसकी वजह और जिसकी उपस्थिति में सब हो
रहा है। तो आप यदि उस साक्षी, उस अवेयरनेस, उस सम्यक् दर्शन में स्थापित हो जाते
है, तो फिर आपको आपका करना कभी नहीं बंधेगा। फिर आप जो भी करेंगे, हाँ, जो भी
करेंगे, वह आपको मुक्त करेगा, क्योंकि अब वह आपका करना या आपके कर्ता भाव से नहीं
बल्कि उस साक्षी यानि असली कर्ता के होने से, उस असली कर्ता की उपस्थिति से हो रहा
है।
इसीलिये भगवान महावीर ने अपनी देशना में यह कहा, की जो भी करो यत्न यानि विवेक यानि होश से करो क्योंकि आदमी की वर्तमान स्थिति बेहोशी की है। उसका सभी करना मूर्च्छा में और मूर्च्छा का है। लेकिन यत्ना यानि साक्षी यानि अवेयरनेस में किया हुआ सब काम, आपको कभी नहीं बान्धेगा, चाहे वह कुछ भी और कैसा भी करना हो। यह समझिये की काम या करना नही बाँधता बल्कि भाव बाँधता है।
साक्षी भाव में यदि स्थापित हो जाये, तो फिर आप मुक्ति के रास्ते पर है, क्योंकि नया तो आप बाँधेंगे नहीं, लेकिन अब जो भी आप करेंगे, वह आपको खोलेगा आपको मुक्त करेगा। क्योंकि जो भी आप साक्षी या अवेयरनेस या सिर्फ़ उपस्थिति, होकर करते है आप उसके पार चले जाते है।
साक्षी भाव में स्थित हो जाने के बाद आपको कुछ करने की ज़रूरत भी नहीं रहेगी। फिर आप करे या ना करे, आप मुक्ति की राह पर है। साक्षी भाव में करना भी, नहीं करना है। साक्षी भाव यदि प्रगाढ़ हो जाये और आप उस भाव में स्थापित हो जाये, तो फिर आप खा कर भी उपवास में है और उपवास में होकर भी खाये हुए होने के बराबर है। ध्यान यानि मैडिटेशन उस साक्षी को साधने की विधि का नाम है.
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