नैतिकता का पाठ पढ़ने-पढाने और सुनने-सुनाने से कुछ भी नहीं बदलेगा।

कुछ ही दिन पहले की बात है, जब घर पर किसी ने अपने फ़ोन पर एक वीडियो चालू कर रखा था और वे कुछ सुन रहे थे। मैं वही बैठा था, तो मेरे कानों में कुछ शब्द पड़े। बोलने वाला जाना माना और धुरन्धर वक्ता था। नैतिकता का पाठ पढाया जा रहा था और यह बताया जा रहा था की यह करो, यह मत करो आदि. सुनने वाले लोग, बराबर, बीच-बीच में, तालियाँ बजाकर, उस वक्ता की कही बातों का समर्थन कर रहे थे। मैंने बीच में ही कह दिया की यह सब बकवास है, व्यर्थ है। तो जो सज्जन, वीडियो सुन रहे थे, ग़ुस्से में लाल होकर होकर बोले की आप ऐसा कैसे कह सकते है? तो मैंने कहा की आप यदि सुन सकते है, तो मैं आपको समझाता हूँ की यह सब बकवास और व्यर्थ कैसे है। उन्होंने कहा बताइये। तो मैंने बताया की यह सारी पब्लिक जो अभी खूब तालियाँ ठोक रही है, उस वक्ता की कही बातों पर, वही लोग, अभी इस सत्र की समाप्ति के बाद, फिर से वही करेंगे जो वह करते आये है। यानि वही पुरानी चीजों और आदतों को फिर से दोहरायेंगे, जो ये लोग अभी तक दोहराते रहे है। 

मैंने कहा की, ऐसा नहीं है की यह सब बातें यानि नैतिकता का पाठ, पहली बार पढ़ाया जा रहा हो या पहली बार सुना और सुनाया जा रहा है। नहीं, यह सब कई जन्मों से चल रहा है। मैंने उसी समय, उनसे पूँछा की आप यह बताइये, की आप सब, यानि प्रवचन, व्याख्यान आदि, कितने सालों से सुन रहे है तो उन्होंने जवाब दिया की आपको इससे मतलब? मैंने कहा की बताइये तो ज़रा। तो उन्होंने जवाब में कहा की कई सालों से। तो, मैंने तुरंत पूँछा की क्या आपका ग़ुस्सा ख़त्म हुआ या कुछ कम हुआ? उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन वे मन ही मन समझ गये। 

मैंने उनको समझाया की देखिये, नैतिकता ऊपरी बदलाव है। बाहर से दी हुई यानि थोपी हुई व्यवस्था है जो समाज के लिये ठीक है। लेकिन नैतिकता का मूल्य इसलिये नहीं है, क्योंकि नैतिकता आपके भीतर को नहीं बदलती। नैतिकता सतह पर है, जो एक दिखावे के रूप में हम ऊपर से ओढ़ते है, जब की आपका भीतर वैसा का वैसा ही बना रहता है। क्योंकि भीतर नहीं बदलता, इसलिये वह सब फिर से होता रहता है या हम करते रहते है आदतन। यही वजह है की अपराधों में कोई कमी नही आती। यही नहीं, बल्कि अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलने के बाद भी वही अपराध फिर से होते है। और बार-बार होते है। क्यों? क्योंकि आदमी का स्वभाव तो वही है। उसका भीतर तो ज्यों का त्यों है। 

तो उन्होंने मुझसे यह पूँछा की फिर क्या करना चाहिये। तो मैंने उत्तर में कहा की आदमी का भीतर यदि रूपांतरित हो जाये यानि उसकी ऊर्जा का रूपांतरण हो जाये तो फिर आपको किसी को नैतिकता का पाठ नहीं पढाना पड़ेगा। क्योंकि अब उसका भीतर यानि स्वभाव बदल गया है। जब स्वाभाव् ही बदल गया, तो फिर वह सब जो अब तक आदतन या बेहोशी में होता था वह सब अब नही होगा। मैंने उनको समझाते हुए बताया की आदमी की असलियत ऊर्जा है, ना की शरीर। चूँकि वह ऊर्जा पुराने संस्कारों से भरी पड़ी है, इसलिये पुरानी आदतों का ऑटोमैटिकली दौहराव होता है। ऐसे जैसे की हमारा उन पर कोई नियंत्रण ही नहीं है। यही वजह है ,की आदमी जब भी कुछ ग़लत करता है तो बाद में पछताता है और यह कहता है की यह सब मेरे से कैसे हो गया? कारण इतना ही है की, यह सब बेहोशी में हो रहा है। अब यदि इस ऊर्जा पर पड़े संस्कारों को आप मिटा दे तो आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिसके लिये आपको बाद में पछताना पड़े। 

तो अपनी बात को समाप्त करते हुए मैंने कहा की ऊर्जा का रूपांतरण स्थायी उपाय है। ना की नैतिकता। नैतिकता ऊपरी और अस्थायी है। जबकि ऊर्जा का रूपांतरण स्थायी और हमेशा के लिये है। अन्त में मैंने उनसे कहा की, ध्यान यानि मैडिटेशन ऊर्जा के रूपांतरण का एक मात्र तरीक़ा है। 

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