असली अर्थ में, आप मानव तभी है जब…….
अभी हम स्वयं को मानव समझते और मानते है। लेकिन हम सही अर्थ में मानव नही है। सही अर्थ में आप मानव तभी है, जब आप उस सम्भावना को उपलब्ध हो सके, जिसकी उपलब्धि केवल और केवल इस मानव शरीर में ही सम्भव है। अन्य शरीरों में नहीं है। और वह सम्भावना है, कि मानव शरीर में होते हुए, दिव्यता यानि divineness को उपलब्ध होना।
आप यह
जानिए कि प्रकृति ने हमें इस शरीर से बांध रखा है और वह बंधन मन यानि माइंड के रूप
में है क्योंकि मन आपको हमेशा संसार यानि शरीर से बांधे रखने का काम करता है और
यही वजह है कि मन को बाहर यानि संसार में रस आता है।
मन
बाहर ही रहता है और रहना चाहता है। मन की दौड़ हमेशा संसार की ओर एवं संसार में ही
होती है। मन आपको यहाँ एक शरीर बनाकर ही रखना चाहता है। तो आपकी ऊर्जा का प्रवाह
एवं रुख़ यदि हमेशा बाहर यानि संसार की ओर रहेगा, तो आप यहाँ शरीर बनकर ही जियेंगे
और शरीर बनकर मरेंगे भी।
शरीर होकर मौत हुई तो फिर से नया मानव शरीर मिलेगा क्योंकि जब तक आप इस दिव्यता को उपलब्ध नही होते, प्रकृति आपको नये-नए शरीर में भेजती रहेगी, एक नये मौक़े के रूप में। वास्तव में प्रकृति हमे यह शरीर देती ही इसीलिए ताकि इस शरीर में रहते हुए उस दिव्यता कि उपलब्धि कि सम्भावना को हासिल कर सके.
शरीर होकर यानि मन की ग़ुलामी या मन से बंधकर जीना, एक जानवर की तरह जीना है क्योंकि अन्य सभी प्राणी एक शरीर होकर ही जीते है। अन्य प्राणी उससे ज़्यादा कुछ कर भी नही सकते, उनके हाथ में उससे ज़्यादा है भी नही क्योंकि अन्य प्राणियों में यह दिव्यता को उपलब्ध होने की सम्भावना ही नही है। लेकिन जिस मानव शरीर में इस सम्भावना को उजागर किया जा सकता है और ऐसा यदि नही किया जाता है, तो यह मोका यानि मानव शरीर, जो प्रक्रति ने हमे दिया है वह व्यर्थ जाएगा।
अब
समझने वाली बात यह है की इस दिव्यता यानि डिवाइन-नेस को उपलब्ध होने के लिये आपको
घर नही छोड़ना है और ना ही आपको जंगल जाना है। बस आपको इतना ही करना है की आप बहिर्मुखी
से अंतर्मुखी हो जाये। अपनी ऊर्जा यानि माइंड का रुख़ बाहर से मौड़ कर भीतर की और
कर देना है। अंतर्मुखी होने में माइंड की मौत है। माइंड का हनन है।
माइंड बाहर होकर ही है. माइंड का अस्तित्त्व बाहर होने में ही है ओर बाहर होकर ही आपको बांधे रख सकता है। अंतर्मुखी का मतलब, बाहर जो भी आप करना चाहे करें लेकिन भीतर हमेशा स्थिर रहें। आपका काम या जो भी कुछ आपके साथ घटित होता है, वह आपको अंदर से विचलित नही करे।
अंतर्मुखी आप यदि हो जाये यानि भीतर ठहर जाये, तो आप प्रकृति की इस व्यवस्था जिसके तहत मन आपको बांधे हुए है, उस व्यवस्था को तोड़ने में आप सफल होंगे। मन यदि भीतर ठहर जाये यानि आप अंतर्मुखी हो जाए, तो आप दिव्यता यानि बुद्ध्त्व को उपलब्ध होने के रास्ते पर अग्रसर हो जायेंगे। ध्यान और कुछ नही बल्कि बहिर्मुखीसे अंतर्मुखी होने की विधि का नाम है।
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