जब तक आपको साँप दिखायी देता है, तब तक आप रस्सी की असलियत को नहीं जान पायेंगे.

(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट में, व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक पहुँचती है, तो आप इनको नजरंदाज कर दें.)

एक बात आप जानिये और समझिये और वह यह की, आपका करना कभी भी बंद नही हो सकता, जब तक जो भौतिक है, यानि जो आपको दिखाई देता है, उसे आप सच मानते है। यह बिल्कुल वैसे ही है, जैसे की रस्सी में यदि आप साँप देखेंगे, तो आप कुछ ना कुछ अवश्य करेंगे। लकड़ी उठायेंगे, उसे मारने या भगाने के लिये या फिर आप खुद ही भागेंगे स्वयं को बचाने के लिये। क्योंकि आपको जो दिखायी दिया, उसको आपने सच माना. यानि शारीरिक या भौतिक को सच माना, तो आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य करेंगे। प्रतिक्रिया हमेशा, शरीर से और शरीर के लिए ही होती है. लेकिन आप यदि सच को जान ले, तो आप जानेंगे कि बाहर साँप नहीं, बल्कि रस्सी है।

रस्सी में साँप होने का भ्रम मात्र है। अभी हम इसी भ्रम की वजह से ही दुखी है। और यही भ्रम हमारे बंधन का कारण भी है। पूरी ज़िंदगी, हम इसी भ्रम में जीते है। और इसी भ्रम के साथ मर भी जाते है। इसलिए फिर से शरीर में आना पड़ता है, क्योंकि इस भ्रम को तोड़ने और असलियत यानि रस्सी यानि जो सबका आधार है और वास्तव में है, उसी को जानने के लिये ही यह शरीर मिलता है। अब जब तक आप सच को नही जानेंगे, तब तक यह आवागमन बना रहेगा। क्योंकि प्रकृति हमें बार-बार और मौक़ा देती रहेगी। लेकिन क्योंकि, नये शरीर में भी वही पुरानी आदत, जो पिछले जन्मों से बन गयी थी, बनी रहती है और इस तरह यह आने-जाने का क्रम बना रहता है। 

अब यह क्रम लकड़ी उठाने या भागने से नही यानि आपकी प्रतिक्रिया से नही टूटेगा। क्योंकि यह सब करना है। और करना मतलब, फिर से शरीर यानि जो दिखायी देता है, उसको सच मानना है। तो यदि आप करेंगे तो, फिर से वही भूल करेंगे और आपका, साँप के सच होने का, यह भ्रम कभी नही टूटेगा। 

करना शरीर के तल पर है। और इसलिये करने से आप रस्सी यानि सच जो ग़ैर-भौतिक है, उसे कभी नही जान पायेंगे। रस्सी के सच को, आप केवल और केवल होने से ही जान सकते है। क्योंकि सच या आधार या असली जो है, वह सिर्फ़ है, उपस्थिति की तरह। भ्रम तभी टूट सकता है, जब आप अपना भागना यानि अपना करना बंद कर दे और ठहर जाये और थोड़ा नज़दीक जाकर देखे, तो आप जानेंगे की साँप नही रस्सी है। रस्सी में साँप का होना, भासता था। रस्सी में साँप के होने का भ्रम था। ठहर कर, जब आप नज़दीक से देखेंगे, तो ही आप असलियत यानि साँप के सच न होने का और रस्सी के सच का पत्ता लगेगा और रस्सी में साँप होने का यह भ्रम भी टूटेगा। 

अब नज़दीक जाने का अर्थ है, अपनी बाहर की दौड़ यानि जो दिखा, उसे सच माना और लकड़ी उठायी यानि अपनी प्रतिक्रिया की। क्योंकि हम बाहर ही भाग रहे है और कभी हम स्वयं के नज़दीक यानि अपने घर यानि भीतर नही गये है, इसलिए यह भ्रम कभी नही टूटा। अब आप यदि थोड़ी देर के लिये अपनी बाहर की दौड़ बंद करके और अपने अंदर यानि भीतर थोड़ा विश्राम करले यानि भीतर स्थिर हो जाये, तो आप जानेंगे की दौड़ ऊपरी सतह पर है। भीतर, ‘केंद्र’, आपका हमेशा से स्थिर है। दौड़ या करना आपका है। जो ‘केंद्र’ या आधार है, वह तो हमेशा से ही स्थिर और अछूता है। साँप यानि शारीरिक का आना जाना है, लेकिन रस्सी यानि आधार, सदैव वैसा ही है और शाश्वत है। 

देखिए एक बात समझिये की, जो जैसा है, उसको जानने के लिये आपको भी वैसा ही होना पड़ेगा तभी आप उसे जान पायेंगे। सच यानि अस्तित्व केवल है, केवल उपस्थिति की तरह। तो आपको भी जो है, यानि उस उपस्थिति को जानने के लिये, उपस्थिति की तरह ही होना होगा तभी आप उसको जान पायेंगे जो सबका आधार है। इसी उपस्थिति को होना कहा गया है। 

जिस क्षण आपका यह भ्रम टूटा, आप मुक्त हुए। अब इसका मतलब यह नही की आप लकड़ी नही उठायेंगे यानि कुछ करेंगे नही। नहीं, सच जानने के बाद, अब आप आदतन या अनावश्यक कुछ नही करेंगे। अब यदि ज़रूरत है, तो लकड़ी भी उठायेंगे, लेकिन पहले की तरह यानि आदतन नही। पहले हर बात पर आप लकड़ी उठा लेते थे, क्योंकि साँप सच लगता था। अब आप जान गये, की रस्सी सच है साँप या शरीर सच नही। अब आप जो भी करेंगे अपने चुनाव और ज़रूरत से ही करेंगे, क्योंकि वह करना ज़रूरी है। अब आप हमेशा अपने भीतर यानि सच यानि अपने ‘केंद्र’ में स्थापित रहेंगे और बाहर यानि सतह पर, उतना ही करेंगे जो ज़रूरी है। 

क्योंकि, आप हमेशा घर के बाहर घूमते रहते है, कभी अपने घर में नही रहते यानि घर के अंदर यानि आपके जो भीतर है, उसकी ख़बर नहीं लेते, इसलिए आप सच से परिचित नही हो पाते। अतः आपका आदतन करना, तभी बंद होगा, जब आप अपने भीतर के केंद्र यानि रस्सी जो सबका आधार है और जिसमें सब शामिल है उससे परिचित नही होते। जब तक आप साँप यानि शरीर यानि जो अस्थायी है, उसी को सच मानते रहेंगे तो, आप उसी में उलझे रहेंगे यानि लकड़ी हमेशा आपके हाथ में रहेगी। आप हमेशा साँप यानि शरीर के पीछे भागते ही रहेंगे। आपका भागना, आपका करना है। और भीतर अपने केंद्र में स्थिर हो जाना, इस अस्तित्व को असलियत यानि रस्सी को जान लेना है। इसी को भेद ज्ञान भी कहा गया है. ध्यान यानि मेडिटेशन रस्सी को जानने यानि असलियत को जानने की विधि का नाम है।

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