आपको ग़ुस्सा क्यों आता है?

क्या आप जानते है की, आपको ग़ुस्सा क्यों आता है? उत्तर, साधारणतः, यह दिया जाता है, की ग़ुस्सा आदमी के अंदर है, जो मौक़ा पाते ही बाहर आ जाता है। लेकिन यह उत्तर सही नहीं है। सही उत्तर, तो यह है, की आपको ग़ुस्सा इसलिये आता है, क्योंकि आप बाहर, जिसे देखते है या जो भी देखते है, आप उसे एक शरीर के रूप में देखते है और एक शरीर ही समझते है। 

अब इस संदर्भ में, एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है और वह यह, की ग़ुस्सा या क्रोध एक भाव है और भाव हमेशा फिजिकल यानि भौतिक के प्रति और भौतिक के लिये, ही उत्पन्न होते है। ग़ैर-भौतिक यानि नोन-फिजिकल के लिये, कोई भी भाव उत्पन्न नहीं होता है। आप चाहें तो खुद यह जाँच कर देख सकते है। कुछ क्षण के लिये, बाहर जो खुला आकाश यानि एमप्टीनेस है, उसके साथ रहिये। आप पायेंगे, की खुले आकाश यानि नोन फिजिकल, के प्रति कोई भी भाव या विचार उत्पन्न नही होते है। भाव और विचार यानि थॉट्स और इमोशंस, हमेशा भौतिक यानि शारीरिक के प्रति ही उत्पन्न होते है। 

अब समझाने की बात यह है की, क्रोध तो एक उदाहरण है, लेकिन है तो एक भाव ही है। जीतने भी भाव आप देखते है, वे सब, राग और द्वेष, जो दो मुख्य भाव है, उन्ही के अलग-अलग प्रकार है। जैसे की, क्रोध द्वेष का भाव है, तो काम वासना, राग का भाव है. ईर्ष्या, द्वेष का भाव है, तो प्यार, राग का भाव है। एक, अनुकूल भाव तो दूसरा, प्रतिकूल भाव। एक, सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक। लेकिन है सभी, भाव ही, जो हम पैदा करते है या हमारे अन्दर पैदा होते है। लेकिन ये सभी भाव, भौतिक यानि शारीरिक के प्रति ही उत्पन्न होते है। उदाहरण के लिए, हमारी काम-वासना शरीर के प्रति और शरीर के लिये होती है। उसी तरह से, दूसरे भाव भी शरीर के लिए और शरीर के प्रति ही उत्पन्न होते है। हमारी काम वासना भी शरीर के लिये, तो प्यार का भाव भी शरीर के लिये ही उत्पन्न होता है। किसी शरीर को देख कर, हम आकर्षित होते है, तो किसी शरीर को देखकर हम घृणा के भाव से भर जाते है। तो किसी शरीर को देख कर हम क्रोधित होते है, तो किसी शरीर के लिये हमारा प्रेम, यानि प्यार उमड़ पड़ता है। 

अब मुद्दे की बात जो है, वह यह की, भाव भले ही कैसा भी हो लेकिन भाव, हमेशा शरीर के प्रति होते है। और यही वजह है, की चाहे वह हमारा क्रोधित होना हो या ईर्ष्या या प्यार, जो भी भाव पैदा होते है, वह इसलिये की सामने वाले को हम शरीर देखते है और शरीर समझते है। आप सब मेरे इस शरीर को शांति प्रकाश मेहता समझते है और यही वजह है, की कोई इस शरीर को देखता है, तो गुस्से से भर जाता है, तो कोई इस शरीर को देखकर ईर्ष्या या प्यार से भर जाता है। लेकिन ये सभी भाव, इसलिये पैदा होते है, क्योंकि, आप मुझे जब देखते है यानि दूसरे को जब आप देखते है, तो उसे एक शरीर देखते और समझते है। 

तो अब आप यदि सामने वाले को शरीर नही देखकर, केवल अवेयरनेस यानि जागरूकता को बनाये रखे या केवल अवेयरनेस में रहे, तो आपके अंदर कभी कोई भाव पैदा नही होगा और पैदा नहीं हो सकता है। और वास्तव में शरीर के परे जाने का यही एक रास्ता है, की आप अपने भाव पैदा करना बंद कर दीजिए। भाव आपके बंधन का कारण है। यदि आप अवेयरनेस, जो सब भावों के परे है, उसमे रहना सीख ले तो आपकी मुक्ति का रास्ता खुल जायेगा। अवेयरनेस को समभाव भी कहा गया है. समभाव यानि जिसमे कोई भाव नहीं, जो सब भावों के परे है. समभाव यानि अवेयरनेस शुद्ध दर्शन यानि सम्यक् दर्शन है। सम्यक् दर्शन, शुद्ध जानकारी है, जिसमें देखना नहीं है। देखना अहंकार यानि शरीर का है। जबकि अवेयरनेस या सम्यक् दर्शन, चेतना का है। 

तो अब यही एक मुख्य बात है, जो हमे समझनी चाहिये, की यदि हम भाव उत्पन्न करेंगे तो बन्धन में बंधे जाएँगे और हम कभी भी, इस देह के पार नहीं जा सकेंगे। क्यों की भाव उत्पन्न करना मतलब, यहाँ शरीर होकर होना है और दूसरों को भी शरीर समझना है। तो फिर आप ग़ुस्सा भी करेंगे, और मौका पाते ही, दुसरे सभी भाव भी पैदा करेंगे। 

और यदि यही चलता रहा तो, आप यहाँ आदमी होकर यानि शरीर होकर ही यहाँ रहेगे और शरीर होकर मरेंगे भी। और यदि शरीर होकर मरेंगे, तो फिर से जन्म होगा यानि नया शरीर मिलेगा, क्योंकि जन्म और मृत्यु भौतिक यानि शरीर का है। लेकिन यदि आप अपनी चेतना यानि अवेयरनेस में स्थित हो जाते है, तो फिर आप सभी भावों और विचारों के परे चले जाएँगे जो शरीर के परे जाना है क्योंकि विचार और भाव शरीर के लिये और शरीर के प्रति होते है। 

आदमी यदि ऐसा ही करता रहा, की हर बार जब मौक़ा होता है, तो वह भाव उत्पन्न करे, तो वह यहाँ, आदमी यानि शरीर होकर होता है. लेकिन, उस समय वह यदि जागरुक हो जाये, अपनी अवेयरनेस में आ जाये, समभाव में आ जाये, तो आदमी की ऊर्जा का रूपांतरण शुरू हो जाता है, जो उसको एक दिन समाधि में प्रवेश करा देती है और वही ऊर्जा का रूपांतरण, उसे शारीरिक बंधन से मुक्त भी करा देता है। 

तो ग़ुस्से यानि भावों यानि भौतिक के परे जाना है, तो केवल और केवल चेतना यानि अवेयरनेस में होकर यहाँ रहिए। चेतना एक मात्र सत्य है जो है। चेतना नोन-फिजिकल है जिसमें कोई भाव या विचार नहीं। चेतना में दूसरा नहीं। चेतना में सिर्फ़ चेतना यानि एक है। यदि आप एक होकर जीते है, तो समय आने पर, आप मरेंगे भी, एक के साथ। और एक होकर या एक के साथ मरना, हमेशा के लिये मर जाना है। बंधन दूसरे की वजह से है और दूसरे से है। एक में कोई बंधन नहीं है क्योंकि एक में तो केवल एक है, केवल वही है, जो है। दूसरा हमारी कल्पनाओं, हमारे विचारों, हमारे भावों में है और भावों और विचारों के कारण है। ध्यान यानि मैडिटेशन आपको अवेयरनेस यानि चेतना में होकर जीना सिखाता है। 

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