चलते हुए पंखे को देखकर, कोई भी यह अंदाज़ा लगा सकता है की इस पंखे की पीछे निश्चित ही कोई शक्ति है.
चलते हुए पंखे को देखकर, कोई भी यह अंदाज़ा लगा सकता है, की यदि यह पंखा चल रहा है यानि की इस पंखे में यदि गति है, तो उस गति के पीछे निश्चित ही कोई शक्ति है, जिसकी वजह से यह पंखा, अभी गतिमान है। पंखा स्वयं, अपने आप से गतिमान नहीं हो सकता है. अब उस पंखे का, क्योंकि वह चल रहा है या कुछ कर रहा है, इसलिए स्वयं को कर्ता मान लेना उस पंखे का अज्ञान है, उस पंखे का अहंकार है। अज्ञान मतलब, असली का ज्ञान नहीं होना है. यानि की पंखे का यह नहीं जानना की मेरी गति का स्त्रोत क्या है, उसका अज्ञान में होना है. पंखा, यदि यह जानने की कोशिश ही नहीं करे, की वह शक्ति कौन है, जो उसे चला रही है और बदले में केवल अपनी सोच, की मै हूँ और मैं चल रहा हूँ, अपने आप से या खुद के होने से, तो यह सोचना उसका अहंकार हुआ. यानि की जो दिखायी दिया, उसी को सब कुछ मान लेना, उसी को अपनी गति का स्त्रोत मान लेना, खुद के होने को, खुद को कर्ता मान लेना, उस पंखे का अहंकार में होना है। असली कर्ता यानि असली ‘मैं’, जिसके होने से, जिसकी शक्ति से, वह पंखा गतिमान है, उसे भूल जाना अहंकार है। उस पंखे को यह समझना होगा, की उ...