जिसको मरना चाहिये, वह कभी नहीं मरता और जिसे हम मरा हुआ कहते है, वह तो हमेशा से मरा हुआ ही है.

जिस शरीर के मरने को हम मरना कहते है, वह तो हमेशा से मरा हुआ है क्योंकि, शरीर जड़ है। कल जब हमने उसको जिंदा कहा, तब भी वह मरा हुआ था। आज जब वह जिंदा है, तब भी मरा हुआ ही है और कल जब हमारे लिए मरा हुआ होगा, तब भी वह शरीर मरा हुआ ही होगा। 

शरीर तो इस माइंड या मन की वजह से जिंदा है, उसमें गति है, क्योंकि उस शरीर को असली चलाने वाला मन है। मन ऊर्जा ही है, जो उस शरीर को चलायमान रखता है। जिस दिन यह मन, शरीर का साथ छोड़ देता है, तो शरीर में गति या हलचल बंद हो जाती है, जिसे हमने मृत्यु कहा है। अतः शरीर को असली हांकने वाला और चलायमान रखने वाला मन-शरीर है जो सूक्ष्म-शरीर होता है। 

अब मज़े की बात यह है की, मृत्यु भी इस सूक्ष्म-शरीर यानि, मन को समाप्त नही कर सकती, क्योंकि शरीर की मृत्यु के बाद भी यह मन-शरीर जिंदा रहता है। यह मन-शरीर या सूक्ष्म-शरीर और कुछ नहीं, बल्कि वही है जिसे हमने अहंकार भी कहा है। 

यह अहंकार या मन ही नये शरीर का कारण है। यह मन शरीर ही फिर से नया शरीर लेता है। क्योंकि मन या अहंकार को अभिव्यक्ति चाहिए और अभिव्यक्ति बिना, माध्यम यानि बिना शरीर के नही हो सकती। 

अतः जिसको हमने मरना कहा है, यानि शरीर के मरने को, वह वास्तव में मरना नही है, क्योंकि शरीर की मृत्यु से कुछ भी नही होता या कुछ भी नही खोता। क्योंकि, जब तक कारण यानि अहंकार या मन जिंदा रहेगा तब तक शरीरों की कमी नही होगी। 

जब तक, मन-शरीर जिंदा है तब तक यह यात्रा चलती रहेगी। केवल शरीर बदलेंगे, इसके सिवाय कुछ नही बदलेगा। यह मन आपकी पूरी यात्रा, यानि प्रारम्भ से लेकर अंत यानि मुक्ति तक यही होता है। 

इसलिए मेने कहा कि जिसे मरना चाहिये वह मरता नही है और जिसके मरने को हम मृत्यु कहते है वह तो सदा से मरा हुआ ही है। अब मैं आपको एक ख़ास बात बताता हूँ। ओर वह यह की प्रकृति जो हमारे साथ करती है, जिसे हम मृत्यु बोलते है, वह और कुछ नही बल्कि शरीर या आवरण का बदलना मात्र है, जैसे की हम पहने हुए कपड़े उतार कर नये पहनते है। 

प्रकृति के हाथों मृत्यु, पिक्चर में एक इंटर्वल की तरह है। जैसे इंटर्वल के बाद पिक्चर फिर से शुरू होती है, उसी तरह मृत्यु के बाद फिर से नये शरीर में यात्रा शुरू होती है। यह बिल्कुल वैसे ही है, जैसे कि नींद से हम पुनः जागते है, वैसे ही मृत्यु के बाद हम फिर से जागते है। फर्क, सिर्फ़ यह होता है की नींद के बाद हम उसी शरीर में जागते है लेकिन मृत्यु के बाद हम नये शरीर में जागते है। लेकिन जागते अवश्य है। 

तो, मैं आपको बता रहा था की प्रकृति के हाथों से मृत्यु, इस कारण-शरीर या मन या अहंकार-शरीर की मृत्यु नही हो सकती। इसकी मृत्यु स्वयं खुद के हाथों से और स्वयं के प्रयासों से ही हो सकती है।

क्योंकि अहंकार या मन का निर्माण भी हमारे हाथों ही हुआ है, तो उसका ख़ात्मा भी हम ही कर सकते है दूसरा नही। अतः आपको यह समझना होगा की इस शरीर में आप नही आपका अहंकार या मन वास करता है और इस शरीर के माध्यम से मन जीता है, ना की आप। चूँकि, आप इस भ्रम में है, की मैं इस शरीर में जीता हूँ, वह ‘मैं’, दूसरा ओर कोई नहीं बल्कि आपका अहंकार ही है। 

इस अहंकार की मृत्यु असली मृत्यु है क्योंकि अहंकार की मृत्यु के बाद कोई मृत्यु नही है। क्योंकि अहंकार की मृत्यु के उपरांत शरीर का कारण ही ख़त्म हो जाता है। जब कारण नही रहा तो उसका प्रभाव भी स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

अतः उसको मारिये जिसको हमें मारना है या मारना चाहिये। तभी इस यात्रा को पूर्ण विराम दिया जा सकता है। मन की इस यात्रा के पूर्ण विराम को ही मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण कहा है। मन का मन में विसर्जन, मन का हनन है। मन का मन में ठहर जाना, अहंकार की मृत्यु है. ध्यान यानि मेडिटेशन मन या अहंकार शरीर के ख़ात्मा करने की विधि का नाम है।

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