कर्मों का निपटारा, भोगने से ही नही बल्कि उनकी होली जलाकर भी किया जा सकता है।

कर्मों के बारे में यही मान्यता है की, कर्मों का निपटारा केवल और केवल भुगतान द्वारा यानि कर्मों का फल भोग कर ही किया जा सकता है। हमेशा यही कहा और सौचा गया की, ‘कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ेगा’। लेकिन यह मान्यता सही नही है। इसका कारण मैं आपको बताता हूँ। हाँ, यह सच है की, हमें यह शरीर कर्मफल यानि अपने कर्मों को भोग कर उनका निपटारा करने के लिए ही मिलता है। प्रारब्ध, जिसे हमने कहा है, वह और कुछ नहीं, बल्कि कर्मों की एक किश्त यानि एक कोटे का इस शरीर में होते हुए, भुगतान करना ही है। 

लेकिन जैसा कि हम सभी जानते है की, क्योंकि बेहोशी में रहना हमारी आदत बन गयी है और इसलिये होता यह है की, प्रारब्ध के भोगने के दौरान हम कहीं और ज़्यादा नये कर्मों का स्टॉक इकट्ठा कर लेते है और इस तरह हमारे कर्मों का स्टॉक कभी ख़त्म नही होता और एक के बाद एक, नये शरीर हमें मिलते रहते है और यह जीवन क्रम बना रहता है। 

दूसरी जो महत्वपूर्ण बात, इस संदर्भ में है, वह यह की, यह भी तो होता है की, कोई आदमी इस तरह किश्तों में, यानि प्रारब्ध के ज़रिये, नये-नये शरीर लेकर उन्हें ख़त्म करने के पक्ष में ना हो, क्योंकि प्रकृति का यह तरीक़ा जोखिम भरा है. जोखिम यह है की, प्रारब्ध को भोगने के दौरान, और नये कर्म जमा हो सकते है ओर होते भी है। 

इसलिए कोई यह चाह सकता है की, सभी कर्मों का भुगतान, इस तरह किश्तों में ना होकर, कोई ऐसा तरीका हो कि, एक ही बार में यानि इसी शरीर में, बकाया सभी कर्मों का भुगतान हो सके। इसी तरीक़े को, जिसमें सभी कर्मों का भुगतान इसी शरीर में हो जाये, उसी को अध्यात्म या आध्यात्मिक होना कहा गया है। 

अब मैं आपको बताता हूँ की, कैसे कर्मों के भुगतान के बिना भी, कर्मों का निपटारा यानि इनको पूरी तरह से ख़त्म किया जा सकता है। अध्यात्म का मतलब होश, जागरूकता, यानि सजगता को जगाना है। अवेर्नेस या जागरूकता एक आग की तरह है, जो उस सबको, जो बाहरी है, उसको जला डालती है।यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे की सुनार, सोने को आग में तपा कर उसमें जितनी भी गंदगी यानि बाहरी मिलावट है उसको जला डालता है और सोना पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है। यही बात अवेर्नेस यानि सजगता के बारे में भी है। 

आप यदि केवल और केवल सजगता बनाये रखें तो, आपके सभी कर्म, वासनाए, इच्छायें, याददाश्त, आदि जो भी आप कहें, इसी अवेर्नेस रूपी आग में जलकर भस्म हो जाते है। बिल्कुल उसी तरह जैसे की बीज के एक दाने को, आग में भून लेने के बाद, उसमें फिर से पेड़ पैदा नही हो सकता। अवेर्नेस जो भी बाहर का यानि अन्य है, उसको जलाकर नष्ट कर देती है, हमेशा के लिए। आपको इन कर्मों को फिर भोगना नही पड़ता। और इस तरह आपके सभी कर्मों का बिना भोगे ही भुगतान हो जाता है। अवेर्नेस यानि जागरूकता आपकी ऊर्जा पर पड़े बाहर की सभी अशुद्धियों को जलाकर ऊर्जा का शुद्धीकरण करती है। 

शरीर, अशुद्ध ऊर्जा यानि ऊर्जा, जिस पर संस्कार या वासनाए जमा हो जाती है, वही ऊर्जा नया शरीर लेती है। शुद्ध ऊर्जा नया शरीर नही लेती बल्कि अपने स्त्रोत में का मिलती है जिसको मोक्ष या निर्वाण कहा है। मैं आपको इस बात का प्रमाण भी दे सकता हूँ ओर वह यह कि, यह दुनिया कई अरबों-खर्बों वर्षों से यहाँ है। इन वर्षों में, यहाँ ना जाने क्या-क्या हुआ, जैसा की आज हो रहा है। फिर भी उन सबका, जो कुछ यहाँ अभी तक हुआ, उसका कोई भी नामों निशान, आपको देखने को नहीं मिलता है. जानते है ऐसा क्यों? क्योंकि अस्तित्व, शुद्ध अवेर्नेस यानि जागरूकता है। 

और अवेर्नेस की अपनी कोई मेमरी या याददाश्त नही होती। यही बात हमारे साथ भी है क्योंकि वही अस्तित्व यानि वही अवेर्नेस हमारे अन्दर भी काम कर रही है। तो आप यदि अपनी अवेर्नेस में रहना सीख ले, तो आपके सभी कर्मों का भुगतान इसी शरीर यानि इसी ज़िंदगी में हो सकता है और आप इस शारीरिक अस्तित्त्व के आगे जा सकते है। ध्यान यानि मैडिटेशन और कुछ नहीं बल्कि उर्जा के शुद्द्धिकरण यानि उर्जा के रूपांतरण कि विधि का नाम है.

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