घानी (कोल्हू) का बैल चलता तो दिन भर है, लेकिन पहुँचता कहीं भी नहीं है।
क्या आप जानते है की घानी का बैल, चलता तो दिन भर है, लेकिन पहुँचता कहीं भी नहीं है? दिन भर चलने के बाद भी, वह वहीं पर होता है, जहां से उसने चलना शुरू किया था।
अब ऐसा क्यों? ऐसा इसलिये, क्योंकि घानी का बैल, कभी सीधा नहीं चलता, बल्कि हमेशा वहीं एक ही जगह पर, एक घेरे में, चक्कर लगाता है यानि की सीधा लाइन में ना, चलकर वहीं एक ही जगह पर राउंडस मारता है और इसीलिये वह कहीं नहीं पहुँच पाता और इस तरह दिन भर की यात्रा के बाद भी, वह वहीं होता है, जहां वह शुरू में था। यही बैल यदि सीधा चलता, तो अवश्य कहीं पहुँचता।
अब ऐसी
ही स्थिति, कुछ हमारी भी है। हम भी चूँकि, सीधे नही चलकर, बल्कि एक ही घेरे में
चक्कर लगा रहे है और इसलिये हम वहाँ नहीं पहुँच पा रहे है, जहां हमे पहुँचना
चाहिये। घेरे में घूमना या घानी के बैल की तरह चक्कर लगाने का मतलब, यहाँ अपनी आदतों
के अधीन होना है।
आदत एक
चक्कर यानि घेरे की तरह है, जो आपको वही काम बार-बार यानि आदतन करवाती है और इस
तरह आप उस आदत से बंधे रहते है। आदत से बंधे होना, मतलब कोल्हू के बैल की ही तरह, एक
घेरे में घुमना ही है यानि की केवल चक्कर लगाना है।
आदत
बेहोशी है. आदत का मतलब, होश का नहीं होना है। आदत का मतलब, होश आपको नहीं चलाता
बल्कि बेहोशी या आदत आपको चलाती है। मतलब यह की, सब आदतन या अपने आप होता है। आदत
से यहाँ होना, मतलब एक दौहराव की ज़िंदगी जीना है।
आदत या दौहराव की ज़िंदगी सीधे नहीं चलना है, बल्कि गोल-गोल चक्कर लगाना है. आदतन जीना ओरिजिनल या मूल ज़िंदगी नहीं जीना बल्कि डुप्लीकेट जीवन का जीना है, क्योंकि आप भी घानी के बैल की तरह एक ही जगह चक्कर लगाते है और कहीं नहीं पहुँचते है यानि की बार-बार वही काम करते है।
हमारा यही चक्कर लगाना, यही बेहोशी की ज़िंदगी जीना ही, हमे इस शरीर से बांधे रखता है। इन आदतों की वजह से ही, हम इस शरीर से मुक्त नही हो पा रहे है, क्योंकि यही आदते हमे हर बार, नये-नये शरीर में लाती है। आदते शरीर की और शरीर के लिये होती है।
इस तरह, हम भी कर तो बहुत रहे है, सुबह से शाम तक और इसी तरह पूरी जिंदगी भर करते है लेकिन फिर भी हम पहुँच नहीं पा रहे है जहाँ हमे होना चाहिए. कारण यह है, की हमारा करना भी राउंड्स में घुमने के समान ही है, मतलब आदतन करना यानि वही बार-बार करना है. वही विचार, वही भाव, हमेशा चलते है.
तो
आदतों को तोड़ना, आदतों से मुक्त होना, सीधी यानि एक सीधे लाइन की जिंदगी जीना है।
अब चक्कर की ज़िंदगी नहीं, बल्कि सीधी ज़िंदगी जीने का मतलब है, बेहोशी को तोड़ना
और होश को जगाना है। यानि कोई भी काम आदत से या बेहोशी में नही और बेहोशी से नहीं,
बल्कि पूरे होश यानि की अपने चुनाव से करना है।
अब जो
समझने की बात है, वह यह की, जो भी काम आप पूरे होश से करते है, आप उसके पार चले
जाते है। होश से किया काम, आपकी आदत नहीं बनता और इसलिये आपको कभी नहीं बाँधता है।
इसी को सीधा, एक रेखा में चलना कहा गया है.
बेहोशी
में किया काम ही आदत बनाता है और इसलिये बाँधता है। तो बेहोशी या आदतन जीना, मतलब
घानी के बैल की तरह, एक ही जगह चक्कर लगाना है और कहीं नहीं पहुँचना है. मतलब अपनी
ज़िंदगी व्यर्थ करना है।
लेकिन
होश का जीवन यानि चुनाव से करना, मतलब आदत को तोड़कर, सीधी लाइन की ज़िंदगी जीना है
और अपने लक्ष्य यानि इस शारीरिक अस्तित्व के परे जाना है। क्योंकि यदि आदते टूटी,
तो फिर आपको शरीर की भी ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि आदते शरीर के लिये होती है।
चेतना
में कोई आदत नही है। ध्यान यानि मैडिटेशन बेहोशी को तोड़ने और होश में जीवन जीने
विधि का नाम है।
Comments
Post a Comment