शरीर का छूटना और शरीर का छोड़ना, दो बिल्कुल अलग और विपरीत घटनाएँ है।
क्या आप जानते है, की शरीर का छूटना और शरीर को छोड़ना, दोनों समान नहीं बल्कि बिल्कुल अलग और विपरीत घटनाएँ है। शरीर का छूटना मतलब, कोई दूसरा आपको अपने शरीर से अलग करता है, जबकि शरीर छोड़ना मतलब, आप स्वयं अपने शरीर को अलग करते है।
दोनों ही सांसारिक अर्थ में मृत्यु है, शरीर से अलग होना है, लेकिन दोनों में बड़ा फर्क है, ज़मीन और आसमान का अंतर है, क्योंकि की, एक घटना सांसारिक अर्थ में है, तो दूसरी आध्यात्मिक अर्थ में है।
अब
समझिये आप। शरीर का छूटना, प्रकृति के हाथों में है। प्रकृति की एक व्यवस्था के
अन्तर्गत है। यानि की, एक निश्चित समय के पश्चात, यह देह स्वतः ही गिर जाती है, मतलब
छूट जाती है।
अब ऐसा साधारणतः हम सभी के साथ होता है, जिसको हम मृत्यु कहते है। लेकिन, जब मैं मृत्यु की बात करता हूँ, तो मृत्यु से मेरा मतलब, प्राकृतिक यानि समय से होने वाली मृत्यु से है। अकाल मृत्यु से नहीं है।
तो
शरीर का छूटना, एक आम बात है, जो प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था है। अब शरीर के
छूटने में कुछ भी नया नही है, क्योंकि ऐसा, हमारे साथ कई जन्मों से हो रहा है।
शरीर का मिलना और समय आने पर उसका छूटना, जीवन क्रम यानि की जीवन
लीला, का ही एक हिस्सा है।
कपड़ों
की तरह शरीर भी बदलता है। आज यह शरीर, तो इस शरीर के छूटने पर, नया शरीर मिलता है।
इस तरह, कुछ भी नही बदलता, केवल शरीर बदलते है और हमारा शरीर में
होना बना रहता है। यानि की, नये शरीर के मिलने से मुक्ति कभी नहीं मिलती।
नये शरीर का मिलना बंद होना ही, शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति है। नये शरीर के मिलने से मुक्त होना ही, असली मुक्ति या निर्वाण है। और ऐसा शरीर के छूटने से नहीं, बल्कि केवल और केवल शरीर को स्वयं छोड़ने से ही, हो सकता है। मतलब यह, की मृत्यु को प्रकृति के हाथों नहीं छोड़ना, बल्कि ख़ुद अपने हाथ में लेना है।
स्वयं
के हाथों, स्वयं की मृत्यु। इसे ही आध्यात्मिक होना कहा गया है। आध्यात्मिक होना
और कुछ नहीं, बल्कि ख़ुद अपनी मृत्यु करना है। ऐसी मृत्यु जो हमेशा के लिये मर
जाना है।
ख़ुद के हाथों मृत्यु यानि शरीर छोड़ना, मतलब शरीर के कारण, को ही मिटा देना है। कारण मिट गया तो, उसका प्रभाव भी ख़त्म हो जाता है। अभी जो मृत्यु हमारी होती है, प्रकृति की व्यवस्था के तहत है, जिसमे शरीर का कारण नहीं मिटता, बल्कि शरीर मिलाने का जो कारण है, वह एक शरीर की समाप्ति के बाद भी बना रहता है। और यही कारण है, की फिर से प्रकर्ति हमे नया शरीर देती है।
लेकिन
आध्यात्मिक होने का मतलब, मृत्यु की प्रक्रिया को, प्रकृति के हाथों ना छोड़कर,
ख़ुद अपने हाथ ले लेना है।
अब आध्यात्मिक
होने का मतलब, होश को जगाना है. होश हमारा स्वभाव है। तो होश को इतना जगाना, की
आपके अंदर होश के सिवा और कुछ भी नही रहे। और जब मृत्यु का समय आये, तो आप अपनी
मृत्यु के साक्षी, अपनी मृत्यु के दृष्टा हो जाये। यानि की आप मृत्यु में, पूरे
होश के साथ उतरें।
पूरे
होशो-हवाश में मृत्यु में उतरने को ही, ख़ुद शरीर छोड़ना कहा गया है। ख़ुद के हाथों
ख़ुद की मृत्यु कहा गया है।
होश की
मृत्यु, हमेशा के लिये मर जाना है। क्योंकि जो भी काम, आप पूरे होश के साथ करते है,
आप उसके परे चले जाते है। क्योंकि होश का करना, आपका करना नहीं बल्कि चेतना के तल
पर होना है।
आपके
करने में ही बंधन है। होने में बंधन नहीं है। अभी जो मृत्यु, हम मरते है यानि
प्रकृति के हाथों मौत, वह बेहोशी की मृत्यु है। क्योंकि हम यह, कभी जान ही नहीं
पाते की, कब हमने मृत्यु में प्रवेश किया और इसलिए फिर से नये शरीर में आना पड़ता
है,
क्योंकि
बेहोशी से किए हुए काम के पार, आप कभी भी नहीं जा सकते है। यह बिल्कुल वैसे ही है,
जैसे की नींद में आप बेहोशी में उतरते है, इसलिये सुबह आपको फिर से जागना पड़ता है।
ऐसा ही कुछ मृत्यु के साथ भी होता है।
फर्क सिर्फ़ इतना ही है, की नींद के बाद आप पुनः उसी शरीर में जागते है, लेकिन मृत्यु के बाद आप नये शरीर में जागते है।
अत
शरीर छोड़ना, मतलब इस शरीर में होते हुए होश को धीरे-धीरे जगाना है, और सतत जगाना
है। इतना जगाना की एक क्षण आये, जब आप केवल होश ही रह जाये। केवल होश जब रह जाता
है, तो फिर आप इस शरीर में नही रह सकते, क्योंकि शरीर बेहोशी के कारण है।
अब जब बेहोशी पूरी तरह से टूट गई, तो शरीर की ज़रूरत भी नहीं रहती और इसी को होश में शरीर छोड़ना कहा गया है। होश से मृत्यु में प्रवेश करना, मतलब शरीर के होने यानि बेहोशी को पूरी तरह मिटा देना है। इसलिये होश की मृत्यु सदैव के लिये मर जाना है और अपने स्त्रोत यानि अस्तित्व के साथ एक हो जाना है, जिसको निर्वाण, मोक्ष या मुक्ति भी कहा गया है। यानि की ऊर्जा की शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति। ध्यान यानि मैडिटेशन और कुछ नहीं बल्कि होश को सतत जागने की प्रक्रिया का नाम है।
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