पानी मटके में होकर ही, बन्धन में है, यानि की अपने स्त्रोत से अलग है।

क्या आप जानते है की पानी, मटके में होकर ही बंधन में है यानि अपने स्त्रोत से अलग है। बन्धन का मतलब अपने स्त्रोत से अलग होना, अपने स्त्रोत से अलग पहचान बनाकर होना है। इस पानी को यदि बंधन से यानि मटके से मुक्त कर दिया जाये तो यही पानी सीधा अपने स्त्रोत यानि समुन्दर में जा मिलेगा और स्वयं स्त्रोत हो जायेगा क्योंकि पानी तो वही है। मटके का पानी  भीअपने स्त्रोत यानि समन्दर के पानी से अलग नहीं है। 

तो पानी को अपने स्त्रोत में मिलने हेतु बन्धन यानि मटके से अलग होना होगा। पानी को मुक्ति यानि समन्दर की तलाश नही करनी है। समन्दर तो पहले से ही है, लेकिन पानी, मटके में होने से ही बंधन में है, अपने स्त्रोत से अलग है।

अत मुक्ति के लिये केवल यही करना है की जो बन्धन, पानी ने अभी ओढ़ रखा है, उसको गिरा देना है। उस मटके से अलग हो जाना है। मटके में रहकर पानी स्वयं मटका होकर यानि सीमित होकर रह गया है।

मटके से पानी की इतनी गहरी दोस्ती हो गयी है, की पानी अपनी पहचान, अपनी असलियत यानि अपने स्त्रोत को भूल गया है। अपने स्त्रोत को भूल जाना पानी का अज्ञान में होना है। 

बस ऐसी ही हालत हमारी है। ऊर्जा यानि चेतना हमारी वास्तविकता है लेकिन शरीर से पहचान बना लेने, शरीर के साथ दोस्ती कर लेने से ही, यह ऊर्जा स्वयं भी एक शरीर यानि सीमित होकर रह गयी है। अपने स्त्रोत से अलग हो गई है।

वैसे तो, ऊर्जा स्वभाव से असीमित यानि बाउंडलेस और लिमिटलेस और निराकार है। लेकिन शरीर के साथ अपनी पहचान के कारण, केवल शरीर में और शरीर तक ही सीमित होकर रह गयी है। अपने स्त्रोत से अलग होकर, एक अलग पहचान के रूप में अवतरित हुई है।

यदि इस ऊर्जा को इस शरीर से मुक्त कर दिया जाये यानि अलग कर दिया जाये तो यही ऊर्जा जो वही अस्तित्व की ऊर्जा है, अपने अस्तित्व यानि स्त्रोत में जा मिलेगी। 

तो मुक्ति यानि इस ऊर्जा की मुक्ति, जो एक शरीर से बँधी हुई है, उसके लिये मुक्ति को कहीं से ढूँढ कर नही लाना है। मुक्ति के लिये इतना ही करना है, की जो बंधन है, उसको तोड़ देना है।

असली काम बन्धन से मुक्त होने का है। बन्धन को हटाना है। ना की मुक्ति को खोजना है। स्त्रोत यानि अस्तित्व तो पहले से ही है। बंधन से मुक्त हुई ऊर्जा सीधा अपने स्त्रोत से जा मिलती है। 

तो इस शारीरिक अस्तित्व से मुक्त होने के लिये यानि ऊर्जा को, इस शरीर यानि बंधन से मुक्त होने के लिये आपको जो काम करना है, वह है, अपने बंधनों को हटाना । जैसे-जैसे आप अपने बंधन खोलते है, तो ऊर्जा स्वत ही मुक्त होती है।

ऊर्जा जब तक किसी से बंधी हुई है, कहीं अटकी हुई है, तभी तक बन्धन में है। तो ऊर्जा की मुक्ति के लिये इतना ही करना है, की अपनी ऊर्जा यानि कॉन्ससियसनेस्स को मुक्त रखना यानि खुला रखना शुरू कर दीजिये।

अपने भीतर मुक्त भाव से रहना, ऊर्जा को खुला छोड़ना है। जैसे पानी को खुला छोड़ दो यानि मटके से अलग कर दो, तो पानी बन्धन यानि मटके से मुक्त होकर समन्दर में जा मिलता है। उसी तरह यदि आप अपनी ऊर्जा को खुला रखना सिख लें और शुरू कर दें, तो इस ऊर्जा की मुक्ति यानि इस शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। ध्यान यानि मैडिटेशन ऊर्जा को खुला छोड़ने की विधि का नाम है।

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