विचार क्यों आते है और विचारों को कैसे रोका जाये?
अब सवाल यह उठता है की, विचार क्यों आते है और विचारों को कैसे रोका जाये? तो उत्तर में, मेरा सवाल, आप लोगों से यह है, की नींद में आपको विचार क्यों नही आते? अब आप लोग कहेंगे की, क्योंकि नींद में हम सोये हुए होते है, इसलिये नींद में विचार नहीं आते।
तो मेरा जवाब भी, आपके इस सवाल के उत्तर में, की ‘विचार क्यों आते है’? यह है की, फिर आप सोते रहिये। आप जागते क्यों है? क्योंकि, यदि आप सोते रहेंगे, तो विचारों का आना-जाना भी नही होगा। क्योंकि आप जागे हुए होते है, इसलिये विचारों का आना-जाना भी है। लेकिन आप यदि सो जाये, तो आपके विचार भी सो जाएँगे और आपको हमेशा के लिए, विचारों से छुटकारा भी मिल जायेगा।
अब जो
मैंने ऊपर कहा, उसको आप समझिये। देखिये, नींद में विचार इसलिये नही आते है, क्योंकि
नींद में, आपके अनुभव में दूसरा नहीं होता है और विचार, हमेशा दूसरे के होने और
दूसरे के प्रति ही होते है।
अब
क्योंकि नींद में, जो अनुभव करता है, वह भी सो जाता है, इसलिये कोई विचार भी नही
आते। विचार आपके अनुभव करने से है। दूसरे को, दूसरा जानने और देखने से है।
अब जो
देखता है, यानि की देखने वाला और जिसकी वजह से दूसरा है, वह आपका माइंड, मतलब मन
है ।
दूसरा आपके
माइंड में है और माइंड की वजह से ही दूसरा है। अब क्योंकि, नींद में माइंड भी सो
जाता है यानि जो अनुभव करता है, जो देखता है, वह नही
होता है और इसलिये विचार भी नही होते।
लेकिन पत्ते और मजे की बात तो यह है, की देखने वाला, देखना और जो दिखाई देता है, उन तीनों के नहीं होने के बावजूद भी, नींद में आप होते है, आप जिंदा होते है। नींद में आपकी वास्तविकता यानि अस्तित्व ही आपको जिंदा रखता है। इसका मतलब यह हुआ की, दूसरा आपके अनुभव में नहीं होने के बाद भी, जो सच है, जो असली है, वह तो होता ही है।
इस तरह,
नींद में क्योंकि आप नहीं होते यानि देखने वाला नही होता, तो देखना और दिखायी देने
वाला भी नही होता और इसलिए विचार भी नही होते क्योंकि विचार दूसरे के होने से और
दूसरे के प्रति ही होते है।
देखना
और दिखायी देना, तभी है, जब देखने वाला है। यदि देखने वाला ही नहीं, तो दिखायी
देने वाला और देखना भी नहीं हो सकता है।
देखने
वाला माइंड यानि अहंकार है और यही वजह है, की आपके जागने के साथ ही, जो देखने वाला
होता है यानि की आपका माइंड, वह भी जाग जाता है और इस
तरह यह देखने और दिखायी देने, का खेल फिर शुरू हो जाता है और उसके साथ ही आपके विचारों
का आवागमन भी शुरू हो जाता है, जो लगातार आपकी जागृत अवस्था में चलता है।
चूँकि अपनी जाग्रत अवस्था में आप जागे हुए होते है यानि देखने वाला जागा हुआ होता है, इसलिये विचार भी निरंतर चलते है।
तो,
जैसा की मैंने शुरू में कहा की, विचारों को रोकने के लिये आपको जो करना है वह यह
की आप सोते रहिये। अब जो मैंने कहा, उसका मतलब बहुत गहरा है, जो आपको समझना चाहिये.
सोने से मेरा मतलब शाब्दिक अर्थ में नहीं है, बल्कि इस अर्थ में है की, की
नींद से बाहर आने के बाद भी, आप अपनी जागृत अवस्था में भी, ऐसे रहिये जैसे की आप
सोये हुए है।
बिलकुल वैसे ही है जैसे की आप नींद में होते है, जिसमें देखने वाला या अनुभव करने वाला तो नहीं होता, लेकिन आप होते है. आपकी अवेयरनेस होती है, उसी स्थिति में, यानि सजगता में, आप नींद से बाहर आने के बाद भी रहना सीखिए।
तो अपनी जाग्रत अवस्था में, सोये हुए रहने से मेरा मतलब है, की अपने माइंड को पूरी तरह से सुला दीजिये, जिसकी जरुरत नहीं है और जैसा की रात नींद में होता है, लेकिन भीतर अपने होश को बनाये रखिए। यानि की नींद से बाहर आने के बाद, उस अवेयरनेस यानि सजगता में, रहना सीखिए।
बाहर
शरीर और मन के तल पर सोये हुए रहिये, लेकिन भीतर पूरी तरह से जागे हुए रहिये। इसी
को मैंने, अपनी जागृत अवस्था में, सोना कहा है। मतलब अपनी जाग्रत अवस्था में, जागते
हुए सोना है। ऐसे सोना, जैसे की नींद में आप सोते है। जिसमें देखने वाला तो नहीं
होता, लेकिन आप होते है। आप अपनी वास्तविकता में होते है। जैसे की रात नीन्द में
होते है।
अपना देखना बंद कर दीजिये. जैसे रात नींद में देखने वाला लुप्त हो जाता है, वैसे ही उस देखने वाले को अपनी जाग्रत अवस्था में अपने प्रयासों से लुप्त कर दीजिये. यानि केवल अपनी अवेयरनेस या जागरूकता जो आपका स्वभाव है उसको बनाये रखिये. मतलब अपने स्वभाव में रहिये.
देखिये,
असली देखने वाला, असली साक्षी, चेतना यानि अवेयरनेस है, जिसका दूसरा नाम परमात्मा
है. आपका देखना, आपका अहंकार है, आपका करना है.
दूसरा, मतलब देखना है और वह देखना आपके अहंकार यानि मन के कारण है और वही देखना, आपके विचारों का कारण भी है. ध्यान यानि मैडिटेशन और कुछ नहीं बल्कि जागते हुए सौने की विधि का नाम है।
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