जो काम आपको बांधता है, वही काम आपको मुक्त भी कर सकता है.
क्या आप जानते है की आपका काम यानि जो भी आप करते है, वह आपके बंधन का कारण तो हो ही सकता है यानि की उसको करने से आपके नये बन्धन का निर्माण तो हो ही सकता है लेकिन समझने वाली बात यह है, की वही काम आपकी मुक्ति का रास्ता भी बन सकता है।
यह कैसे? तो, एक बात समझिये और वह यह की, काम सिर्फ
काम है. उस काम को नाम देना और अलग-अलग तरह से परिभाषित करना हमारा है, जो हमारी सोच
में है और हमारी सोच का परिणाम है.
काम पर कोई नाम नहीं लिखा हुआ होता है और ना ही, उस
पर यह लिखा होता है, की वह काम अच्छा या बुरा, छोटा या बड़ा है.
उदाहरण
के तौर पर, मैं यदि अपने घर पर,
झूठे बर्तन साफ़ करता हूँ और मैं यदि यह काम करते वक्त, यह सोचूँ की यह क्या छोटा
काम मैं कर रहा हूँ? या यह की मैं आदमी होकर भी यह काम क्यों कर रहा हूँ आदि?
या दूसरा
कोई मुझे यह काम करता देख कर, यह कहे की आप यह क्या काम कर रहे है? तो अब
यह काम छोटा, बड़ा, महत्वपूर्ण है या नहीं आदि, सब हमारी परिभाषाएँ है। जो हमने हमारे
हिसाब से या हमारी सोच से हमने काम पर थोपी है.
काम तो सिर्फ काम है, फिर वह चाहे कुछ भी या कैसा भी हो। यहाँ तक कि चेतना, या ऊर्जा, जिसके होने से और जिसकी सहायता से वह काम आप कर पाते है, वह भी यह नहीं कहती की, यह छोटा काम है, इसलिए मैं नहीं करुँगी. चेतना तो उल्टा, कोई भी काम करने से कभी मना नही करती, बल्कि जो भी आप करें, जो हमारी नजर में कितना ही बुरा क्यों न हो, उसको करने में भी चेतना हमारा पूरा सहयोग करती है।
तो कर्मों
के सन्दर्भ में जो समझने वाली बात है, वह यह की, आप
क्या करते है वह महत्वपूर्ण नहीं है. महत्वपूर्ण है, आपका उस काम को करना, यानि की
आपका उस काम के साथ लगाव है या नहीं, वह महत्वपूर्ण है।
अब लगाव
का मतलब, उस काम के साथ राग, द्वेष से नहीं है, बल्कि उस काम के साथ आपका होना है।
यानि की, उस काम के साथ, यदि आपकी चेतना भी यात्रा करती है, तो समझिये
की उस काम के साथ आपका लगाव, आपका जुड़ाव यानि की कर्म का चेतना के साथ योग हुआ,
जिसे कर्म-योग भी कहा गया है.
यह कर्म-योग,
यानि की काम के साथ चेतना का योग, यदि आप जो भी करें, उसके साथ हो जाये तो फिर, वह
काम आपके लिए मुक्ति का द्वार बन सकता है.
लेकिन
यदि आप उसे बे-मन यानि बिना अपनी चेतना के जुड़ाव से करते है, तो फिर वही काम आपका करना हुआ यानि आपका
अहंकार हुआ और कर्म के साथ चेतना का योग नहीं बल्कि वियोग हुआ, तो फिर वह काम आपको
बंधेगा.
यानि
की जो काम आपको मुक्त कर सकता था, वही काम, अब आपको बान्धेगा।
एक और
बात, कोई काम अपने आप में, आपको नही बाँधता है या मुक्त नहीं करता
है। जैसा की मैंने बताया, काम महत्वपूर्ण नहीं है। आप यदि ऐसा काम भी करते है,
जिसे दुनिया पाप कहती है या बुरा कहती है, तो भी मैं कहता हूँ, की उस बुरे या पाप वाले
काम करने से आप नहीं बंधते है और उस काम को छोड़ने से, आप मुक्त नहीं होंगे।
मैं तो
कहता हूँ की आप पाप कर्म, को भी मत छोड़ो, आप अपना बुरा करना भी बंद मत करो। आप जो
भी कर रहे है, उसे करते रहो, लेकिन साथ में इतना करो की, जो भी आप करो, आप उसे पूरी
तल्लीनता से करो यानि की उस काम के साथ अपनी चेतना को जोड़ दो.
उस
बुरे या गलत काम को भी अपना कर्म-योग बनने दो। आप यदि चोरी भी करते है, तो उसे
छोड़ो मत, बस उसको पूरी सिद्दत यानि पुरे इन्वॉल्वमेंट से करो। आपका ध्यान या चेतना
का काम के साथ योग, उसे कर्म-योग बना देगा, और वह चोरी करना या ग़लत काम भी आपको
मुक्त करने की दिशा में, एक कदम होगा।
फिर एक दिन वह काम अपने आप छूट जायेगा। जिस काम के साथ आपकी चेतना का जुड़ाव हो जाता है, तो वह काम ध्यान बन जाता है। यही तो ध्यान है जो हम अपनी आम भाषा में कहते है, जैसे की, ध्यान से करना, जिसका मतलब है की, उस काम को अपनी चेतना के जुडाव से करना.
ध्यान
आपको मुक्त करता है। क्योंकि जो भी काम आप पूरे मन के साथ यानि पूरे लगाव या
जुड़ाव से करते है, तो आप उस काम के परे चले जाते है।
क्योंकि फिर वह काम आपका करना नहीं हुआ बल्कि चेतना के तल पर हुआ। चेतना के तल पर होने वाला कोई भी काम आपको कभी भी नहीं बाँधता है।
तो बात यह है की, अब काम तो कुछ ना कुछ हम करते ही है, दिन भर यानि की अपनी जागृत अवस्था में, तो अपने कर्म को कर्म-योग बना लीजिये. कर्म-योग का रास्ता अपना कर, आप अपनी मुक्ति का रास्ता खोल सकते है। यदि हर एक काम के साथ आपका जुडाव यानि चेतना का योग हो जाये, तो फिर जो भी आप करेंगे, वह करना आपको बान्धेगा नहीं, बल्कि मुक्त करेगा।
तो, यह अब आप पर निर्भर है, की आप जो भी काम करते है उसको नये बंधन का कारण बनाते है या फिर आप अपने प्रत्येक काम को अपनी मुक्ति का रास्ता बनाते है। यदि आप अपने करने के साथ अपनी चेतना का योग, अपनी चेतना का जुड़ाव रखते है तो फिर जो भी आप करेंगे वह आपको मुक्त करेगा।
किसी भी कर्म के साथ चेतना का जुड़ाव होता हैं तो वह कर्म मुक्त करता है कृपया इसको थोड़ा और समझाएं कि बहुत सारे ऐसे कर्म होते हैं जहां पूरी एकाग्रता के साथ काम होता है तो क्या ऐसे कर्म मुक्तिदायक होते हैं ?
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