इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि ऊर्जा का रूपान्तरण, एक मात्र स्थायी उपाय है।

(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट में, व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक पहुँचती है, तो आप इनको नजरंदाज कर दें.)

देखिये, इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि भीतरी बदलाव, जिसे रूपान्तरण, कहा गया है, वही एक मात्र स्थायी उपाय है. इंद्रियों पर नियंत्रण ऊपरी है, बाहर से थोपा हुआ है और इसलिए एक कॉस्मेटिक चेंज की तरह है. नियंत्रण दमन है, अपनी इच्छाओं का, अपनी वासनाओं का। वासना या इच्छा और कुछ नहीं, बल्कि ऊर्जा ही है और इसलिए इच्छाओं का दमन, ऊर्जा का दमन है। दमन, इच्छा को कुछ समय के लिये दबा ज़रूर देता है, लेकिन दमन से इच्छा कभी, मिटती नहीं है. आपका दमन, उस इच्छा को हमेशा के लिए जिंदा रखता है और दमित ऊर्जा, कभी-ना-कभी, किसी-ना-किसी, रूप में प्रकट अवश्य होती है, क्योंकि, हम यह अच्छी तरह से जानते है की, ऊर्जा को, कभी भी मिटाया नहीं जा सकता है. 

तो इंद्रियों पर नियंत्रण यानि इच्छाओं, वासनाओं आदि का दमन, एक स्थायी उपाय नहीं है, क्योंकि दमित इच्छा, कभी भी, आपका पीछा नहीं छोड़ती है। वह हमेशा, यहाँ तक की मृत्यु के बाद भी, सूक्ष्म रूप में, बनी रहती है, क्योंकि, ऊर्जा को ना तो बनाया जा सकता है और ना ही मिटाया जा सकता है। ऊर्जा का केवल और केवल, रूपान्तरण यानि की, ट्रांसफॉर्मेशन ही संभव है। तो, जब तक, इस ऊर्जा का पुनः शुद्धीकरण यानि रूपांतरण नही हो जाता यानि की यह अशुद्ध ऊर्जा, जिस पर वासनाओं आदि की छाप पड़ गई है, उससे मुक्त नही हो जाती, तब तक यह ऊर्जा, एक शरीर के रूप में प्रकट होती रहेगी, क्योंकि वासनाएँ अभिव्यक्ति चाहती है, और अभिव्यक्ति, बिना माध्यम यानि की बिना शरीर के सम्भव नहीं है। तो ऊर्जा का यदि रूपांतरण यानि शुद्धीकरण नहीं हो, तो वही ऊर्जा, नये शरीर का कारण बनती है। 

इसलिए, सबसे महत्वपूर्ण बात जो है, वह यह की, हम यह समझें, की हमारी वास्तविकता यह शरीर नहीं, यह मन भी नहीं, बल्कि ऊर्जा यानि की जीवन ऊर्जा, लाइफ एनर्जी है। यही एक आधारभूत भूल, हम कर रहे है, की स्वयं को ऊर्जा या चेतना नहीं, बल्कि एक शरीर मान रहे है और इसलिए कुछ ना कुछ कर रहे है. एक भोग रहा है, तो दूसरा भाग रहा है. लेकिन दोनों, एक ही नाव में सवार है. क्योंकि जो भोग में लगा हुआ है, वह तो स्वयं को एक शरीर यानि भौतिक जो दिखाई दे रहा है, उसे सच मान ही रहा है लेकिन जो नियंत्रण कर रहा है, जो भाग रहा है, वह भी यही भूल कर रहा है की, वह भी शरीर को, भौतिक को, यानि की जो दिखाई दे रहा है, उसे सच मान रहा है और इसलिए उससे दूर भाग रहा है. 

स्वयं को शरीर मानना, अज्ञान है और इसी अज्ञान के चलते दोनों, यानि की भोगी और भगोड़ा, एक ही काम कर रहे है. फर्क सिर्फ इतना ही है, की एक सकारात्मक है, तो दूसरा नकारात्मक है. लेकिन दोनों का करना ही है - एक भोग रहा है, इसलिए कर रहा है तो, दूसरा उससे भाग रहा है, जो उसका करना ही है.  

तो स्थायी उपाय, ना तो भोगना है और ना ही भागना है यानि की ऊर्जा को दबाना या नियंत्रित करना है, बल्कि ऊर्जा का शुद्धीकरण यानि की ऊर्जा का रूपांतरण है। हम यह समझे की, यह जीवन ऊर्जा, जो हमारी सच्चाई है, वह वासनाओं आदि के बोझ की वजह से ही एक शरीर से बंधी हुई है, अन्यथा ऊर्जा तो स्वभाव से ही मुक्त और बिना किसी सीमा या बाउंड्री के होती है। लेकिन चूँकि, हमने, हमारी पहचान, इस शरीर के साथ बना ली है, इसलिये अब यह स्वभाव से मुक्त और लिमिटलेस ऊर्जा भी, मात्र एक शरीर होकर ही रह गई है। 

वास्तव में जिसे हमने मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण कहा है, वह और कुछ नहीं, बल्कि ऊर्जा का शुद्धिकरण यानि ऊर्जा की इन वासनाओं आदि की छाप से मुक्ति है। एक बात समझिये आप, और वह यह की मुक्ति, मोक्ष आदि शरीर के संदर्भ में नहीं, बल्कि ऊर्जा के संदर्भ में है। चूँकि हमारी वास्तविकता, जीवन ऊर्जा है, जो स्वभाव से मुक्त है और इसलिये जब तक यह ऊर्जा, इस शारीरिक बंधन से मुक्त नही हो जाती और अपने स्त्रोत यानि इस अस्तित्व से नहीं जा मिलती, तब तक इस ऊर्जा को यानि आपको, आराम नहीं आयेगा. इस ऊर्जा का फ़ुलफ़िलमेंट नहीं होगा और आपका करना यानि की भोगना और भागना, हमेशा के लिए बना रहेगा. 

तो समझने की जो बात जो है, वह यह जानना, की मैं एक शरीर या मन नही बल्कि मेरी वास्तविकता, अस्तित्व की वही ऊर्जा है, जो सब जगह समायी और फैली हुई है। ख़ुद को शरीर मानकर, आप कुछ ना कुछ करेंगे ही, क्योंकि शरीर का मतलब करना है, जैसे की इंद्रियों पर नियंत्रण. क्योंकि आपने स्वयं को, शरीर जाना और माना, इसलिये इंद्रियों पर नियंत्रण, एक करना हुआ, जैसे की दूसरा कुछ, हम करते है।

करना, जैसा की मैंने कहा, शरीर का और शरीर से है और इसलिये हमारा है और अहंकार है। नियंत्रण करना या फिर कुछ नहीं करने की कसम लेना या बाहर कुछ छोड़ देना, अहंकार हुआ। इस तरह आपका करना, आपके अहंकार को और मजबूत करता है। लेकिन अंदरूनी समझ पैदा करना की, मैं एक शरीर नही बल्कि ऊर्जा हूँ और यह जानना की ऊर्जा बंधन में है, तो फिर आप इस बंधी हुई या कैद ऊर्जा के रूपान्तरण यानि शुद्धीकरण के लिये, कुछ अवश्य करेंगे ताकि यह ऊर्जा पुनः अपनी शुद्धता को हासिल कर सके और अपने स्त्रोत में जा मिले।

तो, इन्द्रियों का नियंत्रण स्थायी उपाय नहीं है। स्थायी उपाय यानि की इस ऊर्जा की शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति, केवल और केवल ऊर्जा का रूपांतरण है। रूपांतरण का मतलब बदलाव नहीं है, क्योंकि बदलाव बाहरी है, जबकि रूपांतरण भीतरी है। रूपांतरण का मतलब, अब ऊर्जा में, पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा। जैसे की सुनार, सोने को आग में तपाकर, उसकी सभी गंदगी को हटा देता है और पीछे शुद्ध सोना बच जाता है। यह उस सोने का रूपांतरण हुआ यानि की, अब सोने में पुराना या पहले जैसा कुछ भी नही रहा।

तो ऊर्जा का रूपांतरण, शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति है और इसलिए एक मात्र स्थायी उपाय है, ना की, इंद्रियों पर नियंत्रण या ऊर्जा का दमन। अब, आपके कुच्छ करने से, ऊर्जा का रूपांतरण यानि भीतरी बदलाव नहीं होगा. आपका करना तो आपके लिए उल्टा काम करेगा, मतलब की, आपके अहंकार को और मज़बूती देगा। ऊर्जा का रूपांतरण आपके करने से नहीं, बल्कि आपके होने से होगा, सिर्फ होने से. इसका कारण यह है की ऊर्जा, चेतना सिर्फ है, एक उपस्थिति या प्रजेंस की तरह. तो आप भी केवल होकर यानि एक उपस्थिति होकर ही, उसको जान सकते है, जो है. इसलिए केवल होने से ही ऊर्जा का रूपांतरण संभव है. अपनी चेतना, ऊर्जा को खुला रखना, सिर्फ होना है, मात्र एक उपस्थिति की तरह और इसलिए ऊर्जा का रूपांतरण है.

शुद्ध यानि रूपांतरित ऊर्जा, नया शरीर नहीं लेती है, क्योंकि नये शरीर का अब कोई कारण नही रहा। शुद्ध या रूपांतरित ऊर्जा, अपने स्त्रोत यानि की अस्तित्व में जा मिलती है और स्वयं स्त्रोत यानि अस्तित्व बन जाती है, जैसे की नदी समुंदर में मिलकर, स्वयं समुंदर हो जाती है। यही निर्वाण, मोक्ष मुक्ति आदि है, यानि की ऊर्जा अब शारीरिक अस्तित्व से मुक्त हुई.  

संन्यास का मतलब, बाहर कुछ छोड़ना नहीं है, संसार से भागना नहीं है, बल्कि भीतरी समझ पैदा करना है, की मैं एक शरीर नहीं बल्कि ऊर्जा या चेतना हूँ और इसलिये बाहर यानि शरीर और मन के तल पर उतना ही करना और वही करना, जो इस शरीर को बनाये और बचाये रखने के लिये ज़रूरी है। अनावश्यक करना, यहाँ शरीर होकर होना है, जब की उतना ही करना, जितना की जरुरी है, यहाँ चेतना यानि की नॉन-फिजिकल होकर होना है. ध्यान यानि मैडिटेशन और कुछ नहीं बल्कि केवल होना है और इसलिए ऊर्जा के शुद्धीकरण यानि की ऊर्जा के रूपांतरण की ही विधि है।

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