कैसे यह जाने की ‘मेरा अहंकार पूरी तरह से समाप्त हो गया है?’

(एक निवेदन - मेरे हिंदी के पोस्ट में, व्याकरण सम्बन्धित त्रुटियाँ हो सकती है, ऐसी मुझे आशंका है. मेरी बात आप तक पहुँचती है, तो आप इनको नजरंदाज कर दें.)

सवाल यह उठता है की, ‘कैसे यह जाने, की मुझ में अब कोई अहंकार शेष नहीं रहा है?’ तो इसके लिए जो परीक्षण, जो टेस्ट आपको करना है, वह यह देखना है की, आपके आसपास, जो कुछ भी होता है, क्या वह आपको अंदर से हिलाता है? क्या वह होना, आपके अंदर कोई कंपन पैदा करता है, कोई गति पैदा करता है? यदि हाँ, तो समझिये की, अभी आप में अहंकार यानि की आपका करना शेष है। और यदि, जो भी कुछ, आपके आस-पास होता है, वह, आपके अंदर कोई कंपन पैदा नहीं करता है, तो समझिये, की आपका अहंकार, आपका करना पूरी तरह से समाप्त हुआ। 

अब ऐसा क्यों है? तो इस बात को आप समझिये। देखिए हमारी और इस अस्तित्व की वास्तविकता चेतना है, और चेतना केवल है, एक उपस्थिति की तरह, जिसमें कोई कंपन नहीं है, कोई करना नहीं है, क्योंकि चेतना केवल है. अब चूँकि चेतना केवल है और उसमें कोई करना नहीं है, इसलिये चेतना, स्वभाव से ही शांत और स्थिर है और इसलिए चेतना में कोई कंपन या वाइब्रेशन नहीं है। चेतना, पूरी तरह से स्थिर यानि की स्टिल है। किसी भी तरह का यहाँ होना, उस चेतना की स्थिरता और शांति को भंग नही कर सकता है। 

चेतना सिर्फ़ है और उसके मात्र होने में और उसके होने से, यहाँ सब होता है, फिर भी चेतना में अपने होने और करने का, कोई अहंकार नहीं है। क्योंकि, यहाँ जो भी है, वह सब कुछ चेतना की ही अभिव्यक्ति है और इसलिये चेतना में कोई दूसरा भी नहीं है और चेतना के लिये कोई दूसरा नहीं है। अहंकार तो दूसरे के होने और दूसरे के होने से है। अब क्योंकि, हम शरीर को ही जानते और मानते है और इसलिये शरीर होकर ही यहाँ होते है और इसलिए हमारे लिए दूसरा भी है. क्योंकि दूसरा शरीर से है और इसलिये हम दूसरे को देखते ही, अपनी प्रतिक्रिया यानि की कुछ ना कुछ करते है। अब यह करना और कुछ नहीं, बल्कि आपके अंदर कंपन का होना है, अंदर से आपका हिलना है। आपका अशान्त होना है। 

अब, यह कंपन, यह गति या प्रतिक्रिया यानि की आपका करना, यहाँ एक शरीर होकर होना है। अन्य प्राणी, जीव-जन्तु, आदि, यही तो कर रहे है। जब भी एक जानवर दूसरे शरीर या भौतिक को देखता है, तो उसी के साथ, वह अंदर से हिलता है यानि की अपनी प्रतिक्रिया करता है, जो उसके शरीर को बचाने के लिये ज़रूरी है। इसलिए आपने देखा होगा की, जब भी एक जानवर किसी दूसरे शरीर को देखता है, तो या तो उसे अपना भोजन समझ कर खाता है, जो उसके शरीर को बचाने के लिये जरूरी है. या फिर उसे ख़तरा समझ कर या तो उस शरीर से दूर भागता है या फिर उस पर हमला करता है. उसका बच कर भागना या हमला करना भी अपने शरीर को बचाने के लिये ही है, या वह जानवर, उस दूसरे जानवर के साथ सहवास करता है, जो की शरीर के लिये ही है।

क्योंकि, एक जानवर शरीर होकर, ही यहाँ होता है और शरीर को ही जानता है इसलिए उसकी पहचान, केवल और केवल शरीर के साथ और शरीर तक ही सीमित होती है। इसलिए, जानवरों के सारे काम केवल और केवल शरीर की सुरक्षा और शरीर के लिये होते है। इसके विपरीत, चेतना का स्वभाव शान्ति और स्थिरता है, लेकिन एक शरीर होकर होना, चेतना यानि अपने स्वभाव से अलग होकर, मतलब, अपने अस्तित्व से अलग होकर होना है, जो अहंकार यानि की विभाव है। अहंकार इसलिए, क्योंकि हम उसको सच मान रहे है, जो वास्तव में सच नहीं है। इस तरह अहंकार में होना यानि अपना अलग अस्तित्व मानना, हमारी अशांति, हमारे अन्दर गति या कंपन का कारण है। आपके अन्दर कंपन का होना और कुछ नही बल्कि आपका अशान्त होना ही है। 

तो आपका यह अन्दर से हिलना, तब तक जारी रहेगा, जब तक, आप के अन्दर अलग अस्तित्व या अलग पहचान बाक़ी है। अहंकार विभाव है और हमारी अशांति यानि की हमारा अंदर से, बार-बार हिलने का कारण है। लेकिन, यदि आपके अंदर यह कंपन, यह गति या अशांति बंद हो जाती है, तो इसका मतलब यह हो गया की, अब आप पूरी तरह से अपने स्वभाव के नजदीक आ गये है। आप अपने अहंकार या विभाव में नहीं बल्कि, अब आप अपने स्वभाव यानि चेतना में होते है। 

अशान्त नहीं होना या भीतर कोई कंपन नहीं होना, मतलब अब आप अपने मन या अहंकार की अभिव्यक्ति ना होकर, अब आप अपने स्वभाव यानि की अपनी चेतना की अभिव्यक्ति बन गये है और चेतना स्वभाव से ही शांत और स्थिर है, क्योंकि चेतना सिर्फ़ है, एक उपस्थिति की भाँति और चेतना में दूसरा नहीं है। अशांति, कंपन, दूसरे के होने से है. 

तो अब देखिए, ये दो संभावनायें ही है, यहाँ होने की - स्वभाव या विभाव, यानि की, मन, माइंड, अहंकार या चेतना। इसलिये जब तक विभाव यानि अहंकार है, तब तक स्वभाव् यानि की चेतना नही है और चेतना यानि स्वभाव तभी है, जब अहंकार नहीं है। जब तक दूसरा है, तब तक पहला नही हो सकता। इसीलिये, संत कबीर दस जी ने यह कहा की “…...प्रेम गली अति सांकरी, त्या में दो ना समाये।“ 

तो जब तक आपका हिलना है, यानि की आप अशांत होते है, तो जानिए की अभी आप यानि की अहंकार अभी जिन्दा है. दूसरा अभी जिन्दा है. आना-जाना, बनना-बिगड़ना, जन्मना-मरना, अहंकार का है. झूंठ का है, क्षणिक का है और समाप्त भी वही होता है, जो झूंठ है. सत्य तो हमेशा से है और चिर-निरंतर है, सत्य का आना-जाना या बनना-बिगड़ना नहीं है.   

तो, अब यदि यह अंदर से आपका हिलना यानि की विचलित होना, मतलब आपका करना यदि पूरी तरह से बंद हो गया, तो मतलब यह की, अब आप यहाँ एक शरीर होकर नहीं बल्कि चेतना होकर हो रहे है। केवल उपस्थिति की तरह, जो पूरी तरह से शांत और स्थिर है, जिसमें अपना कोई करना या प्रतिक्रिया नही है। चेतना एक-अस्तित्व है और उसमें दूसरा नही है और इसलिये चेतना में अपने होने का कोई अहंकार नही है। 

चेतना की उपस्थिति में और उपस्थिति से सब होता है लेकिन चूँकि चेतना के लिये कोई दूसरा नहीं है और इसलिये चेतना में अपने करने का कोई अहंकार नही है। अहंकार सतह पर यानि ऊपरी है, जबकि चेतना में होना, केंद्र में होना और केंद्र से जुड़ना है। केंद्र यानि चेतना, सभी कंपन और गति से परे है, आगे है। ध्यान यानि मैडिटेशन भीतरी कंपन, भीतरी अशांति को पूरी तरह से बंद करने की विधि का नाम है.(Next- THE OBSERVER, IS THE OBSERVED – DRISHTA HI DRISHY HAI)

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