संसार आपके जागने और सोने के साथ आता और जाता है।

क्या आप जानते है, की भौतिक यानि क्रिएशन जिसको हम संसार भी कहते है, वह है भी और नहीं भी। इस क्षण में है तो अगले क्षण में नहीं है। अभी आपकी आँखे खुली हुई है, तो संसार भी है और अगले क्षण यदि आपकी आँखे बंद हो जाये तो संसार यानि क्रिएशन भी एक तरह से आपके लिए बंद हो जाती है।

अब ऐसा हमारे साथ रोज होता है। नींद में, संसार अचानक ग़ायब हो जाता है, तो नींद से वापस आने के साथ ही, संसार अचानक हमारे लिये फिर से जिंदा भी हो जाता है, जो नींद के साथ ही फिर से ग़ायब भी हो जाता है। तो यह संसार यानि क्रिएशन यानि भौतिक रचना का लुका-छुप्पी का यह खेल, हमारे साथ रोज़ाना होता है। तो इस तरह क्रिएशन यानि भौतिक का आना जाना है और आना-जाना उसी का है, जो टेम्पररी यानि क्षणिक है।

इसके विपरीत, जो स्थायी है परमानेंट है, वह हमेशा है और लगातार है। स्थायी आपकी नीन्द में भी है और आपकी जागृत अवस्था में भी है। स्थायी का अस्थायी की तरह आना-जाना नहीं है। देखिये नींद में आपके लिये, सब अचानक ग़ायब हो जाता है।

आपके अनुभव में कुछ भी नहीं होता है। जिसे आप संसार कहते है, वह नहीं होता, दूसरा नहीं होता, यहाँ तक की, नींद में आपके लिये आपका शरीर और मन भी ग़ायब हो जाता है क्योंकि नीन्द में आपका शरीर और मन भी आपके अनुभव में नहीं होते है।

मतलब यह हुआ की नीन्द में क्रिएशन आपके लिये पूरी तरह से समाप्त हो जाती है लेकिन आप फिर भी होते है, क्योंकि आप ज़िंदा होते है। आप केवल होते है। और यह आपका नींद में होना, दूसरे के नही होने के बाद भी, उसका होना है, जो है, जो स्थायी यानि परमानेंट है और जिसकी वजह से आप इस शरीर में नींद में भी ज़िंदा होते है।

अब यही अस्तित्व जो आपके साथ नीन्द में भी होता है और जिसकी वजह से आप ज़िंदा रहते है, वह दिन में यानि आपकी जागृत अवस्था में भी आपके साथ होता है। अभी इस क्षण में, आप यह वीडियो देख और सुन पा रहे क्योंकि वह आपके अंदर मौजूद है और उसके होते हुए और उसके होने से ही अभी आप कुछ कर पा रहे है।

क्योंकि संसार आपके अहंकार से है और आपका सोना, जागना भी अहंकार का है और उसी अहंकार के सोने पर संसार भी सो जाता है और उसी अहंकार के जागने पर, संसार भी आपके लिए अचानक पैदा हो जाता है या जाग जाता है. 

तो भौतिक यानि की जो दिखायी देता है, वह आपकी आँखों के खुला रखने के साथ है और आँखें बंद होने के साथ नही है। लेकिन जो है यानि की जो स्थायी है वह तो हमेशा से है। तो जो आपको दिखायी देता है, उसकी प्रासंगिकता आपके लिये तभी तक है, जब तक की आप इस शरीर में है। अगले क्षण यदि आप यह शरीर छोड़ देते है, तो आपके शरीर के छूटने के साथ ही यह संसार यानि क्रिएशन भी आपके लिए अपने आप छूट जाती है।

तो मेरा यह कहना है की जो क्षणिक है, जो आता-जाता है, जो नश्वर है, उसके साथ अपना व्यवहार, उसके साथ अपना लेनदेन भी आप उतना ही रखिये जितना की आवश्यक है। यानि की नश्वर के साथ अपना व्यवहार भी नश्वर जैसा ही रखिये।

लेकिन अभी जो हो रहा है या हम कर रहे है, वह बिल्कुल उल्टा हो रहा है यानि की जो स्थायी है उसको तो हम पूरी तरह से भूल ही गये है। स्थायी के बारे में हम कुछ जानते ही नहीं है। हम केवल और केवल अस्थायी यानि भौतिक जो दिखायी देता है, उसी को जानते और मानते है।

यही कारण है, की हमारा व्यवहार अस्थायी यानि भौतिक के साथ ऐसा है, जैसे की हम यहाँ पर अनन्त काल तक रहने वाले है। हमारा मेल-मिलाप, शारीरिक के प्रति पूर्ण और असीमित है।

यही कारण है की जब अपना कोई हमसे बिछड़ जाता है, तो हम इतना दुखी होते है, क्योंकि भौतिक के आगे हमने कुछ जाना ही नहीं। यही अज्ञान यानि सही का ज्ञान न होना, ही हमारे दुखों और बंधन का एक मात्र कारण है।

अब यदि आपको सही का ज्ञान हो जाये यानि की उसको आप जान लें जो सिर्फ़ आपकी नीन्द में ही नहीं बल्कि २४ घण्टे आपके साथ मौजूद होता है, यानि की जो नश्वर नहीं है, जो आता-जाता नहीं है, तो फिर आपका नश्वर यानि भौतिक के साथ मेल मिलाप और लेनदेन भी उतना ही होगा जितना की ज़रूरी है।

अभी यह सब ज़रूरत से ज़्यादा है अनावश्यक है और वह सिर्फ़ इसलिये क्योंकि हमें जो आँखों से दिखायी देता है, सिर्फ़ उसी को जानते है। तो जो आता जाता है उसको नहीं बल्कि जो हमेशा है, उसको जानिये। उसको जानना स्वयं को जानना है। ध्यान यानि मैडिटेशन जो चिर-निरंतर और शाश्वत है, उसको जानने की विधि का नाम है।

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