अपनी जागृत अवस्था में, आप दुखी क्यों होते है ?
आपने देखा की रात, गहरी नींद में आप पूरी तरह से शान्त होते है। लेकिन सुबह जगने के साथ ही आप दुखी होते है। ऐसा क्यों? आदमी तो आप, अभी भी वही है, जो रात में सोए थे। दो अलग-अलग आदमी तो नही है। फिर यह बदलाव क्यों? अपनी जाग्रत अवस्था में ऐसा क्या बदल जाता है, जिसकी वजह से आप दुखी हो जाते है? आपके जागने के साथ ही, ऐसा क्या हो जाता है, की आप दुखी हो जाते है?
अब
इसका सीधा उत्तर है, माइंड। गहरी नीन्द में आप पूरी तरह से शान्त इसलिए होते है की
नींद में माइंड नही होता। आपके सोने के साथ ही माइंड भी सो जाता है। चूँकि माइंड
नही होता, इसलिए आपके अनुभव में कुछ भी नही होता। क्योंकि, अनुभव करने वाला माइंड
है। देखने वाला माइंड है। माइंड देखने का काम करता है।
इस तरह
माइंड नही होने के साथ दूसरा यानि संसार भी एक तरह से आपके लिए नही होता. क्योंकि
दूसरा तभी है, जब उसको देखने या अनुभव करने वाला हो। जब देखने वाला नहीं, तो
दिखायी देने वाला और देखना भी नहीं होता है? तो इस तरह, ये तीनों ही
यानि देखने वाला (seer), दिखायी
देने वाला (seen) और इन
दोनों को जोड़ने की जो प्रक्रिया यानि देखना (seeing), नही होते है।
लेकिन नींद में, फिर भी आप होते है। आप सिर्फ़ होते है। नींद में दूसरा नही होता लेकिन वह होता है जो ‘है’। दूसरा आपके दुख और अशांति का कारण है। एक में, सिर्फ़ एक है। एक में, दूसरा नही है और इसलिए कोई डिस्टर्बन्स या अशांति की वजह नही है। लेकिन आपके जागने के साथ ही, जो बदलाव आपमें आता है, जिसकी वजह से आप अपनी जागृत अवस्था में दुखी परेशान और अशान्त होते है और वह बदलाव यह है की आपके जागने के साथ ही आपका माइंड भी जाग जाता है।
माइंड
के जागने के साथ ही, आपके लिए सब जाग जाते है। आपको उन्हें जगाने की ज़रूरत नही
पड़ती क्योंकि माइंड के जागने के साथ आपकी इंडिविजूऐलिटी यानि पर्सनालिटी पूरी तरह
से सक्रिय हो जाती है ओर इस तरह, पूरा का पूरा संसार भी आपके जागने के साथ जग जाता
है जो रात नीन्द में कहीं ग़ायब हो गया था।
तो माइंड के साथ आपकी परेशनियाँ; समस्यायें; सवाल; शक; आदि सब कुछ फिर से जाग जाता है, जो रात नींद में नही होता। अतः आपके जागृत अवस्था में दुखी होने का एक मात्र कारण आपका होना है, यानि माइंड का होना है। आप यानि माइंड मतलब अहंकार का होना है। अहंकार एक मात्र ऐसा बदलाव है जो आपके जागने के साथ आप में आता है, जिसकी वजह से आप अपनी जागृत अवस्था में दुखी और अशान्त होते है।
इस तरह आपका होना और नही होना ही वह बदलाव है, जो आपको दुखी भी करता है और शान्त भी रखता है। रात नींद में आप नही होते बल्कि वह होता है जो सिर्फ़ है यानि आपकी वास्तविकता। गहरी नींद में आपके आनंद का कारण, उसके होने की वजह से है जो ‘है’। आनंद उसके होने का है।
लेकिन जागृत अवस्था में क्योंकि आप होते है यानि आपका अहंकार, आपका व्यक्तित्व, आपकी पर्सनालिटी होती है और इसी वजह से आप दुखी भी होते है। दुःख दूसरे के होने से है। अब समझने की बात यह है की, जागृत अवस्था में वह जो है यानि आपकी असलियत जो रात गहरी नींद में होती है, वह आपकी जाग्रत अवस्था में भी मोजूद होती है लेकिन आपके माइंड यानि आपके अहंकार के होने की वजह से आप उसका अनुभव नही कर पाते। आप उसके होने के आनन्द को जो रात नींद में आपके साथ होता है, उसको आप अपनी जाग्रत अवस्था में अनुभव नही कर पाते।
दूसरा
यानि माइंड आपको उस आनंद के अनुभव से वंचित रखता है। माइंड ही आपकी अशान्ति का एक
मात्र कारण है।
नींद
और मौत दोनों और कुछ नही बल्कि आपके अहंकार यानि माइंड को कुछ समय के लिये विश्राम
देने की प्रकृति के हाथों व्यवस्था मात्र है। लेकिन दोनों ही स्थितियों में यह
अहंकार या माइंड फिर से जागता है और अपना काम फिर से शुरू करता है।
फर्क
इतना ही है की, नींद के बाद यह माइंड पुनः उसी शरीर में जागता है, लेकिन मृत्यु के
बाद यह माइंड नये शरीर में जागता है। मृत्यु इस तरह और कुछ नही बल्कि शरीर का
बदलना मात्र है।
अतः प्रकृति की व्यवस्था के तहत आप इस माइंड से छुटकारा नही पा सकते। माइंड से छुटकारा असली छुटकारा है। क्योंकि माइंड के छूट जाने पर, नये शरीर का कारण भी छूट जाता है और आप इस शारीरिक बंधन से मुक्त होते है, जिसे मुक्ति या मोक्ष कहा है।
माइंड यानि अहंकार का डिसलूशन यानि माइंड का ख़ात्मा आपको, इस शरीर में रहते हुए ही करना होगा और शरीर में रहकर ही कर सकते है। माइंड के ख़ात्मे की राह पर चलने को ही आध्यात्मिक होना बोला गया है और उस साधना का नाम जिससे माइंड का हमेशा के लिये अन्त हो जाता है ध्यान कहा गया है। माइंड का पूरी तरह से विघटन यानि डिसलूशन होना ही, बुद्ध्त्व को उपलब्ध होना है। बुद्ध यानी माइंड से परे जाना ओर माइंड से परे जाना देह के परे जाना है.
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