जन्म और मृत्यु, बिल्कुल वैसे ही जैसे की रात को सौना और सुबह फिर से जागना।

देखिये, जन्म और मृत्यु और कुछ नहीं, बल्कि बिलकुल वैसे ही, जैसे की रात में सौना और सुबह फिर जागना। दोनों में कोई ज़्यादा फर्क नही है।

दोनों ही स्थितियाँ बेहोशी की है। सौना बेहोशी है तो, मृत्यु भी बेहोशी ही है। नींद में आप हमेशा बेहोशी में ही प्रवेश करते है, तो मृत्यु में भी आप बेहोशी में ही प्रवेश करते है।

नींद में यानि की सौते वक्त, आप सूक्ष्म शरीर के रूप में मोजूद होते है, तो मृत्यु के बाद भी आप सूक्ष्म शरीर के रूप में ही मोजूद होते है।

और दोनों ही स्थितियों में, आप फिर से जागते है। फर्क सिर्फ़ इतना ही होता है की, सौने के बाद, आप पुनः उसी शरीर में जागते है, जबकि मृत्यु के बाद आप एक नये शरीर में जागते है।

 दोनों ही स्थितियों में, वही पुरानी बेहोशी यानि आपका माइंड फिर से काम करना शुरू कर देता है। देखा जाये, तो वही पुरानी बेहोशी यानि की सूक्ष्म शरीर, ही वास्तव में सौता और जागता है। और यही सूक्ष्म शरीर मरता भी है और फिर से जन्म भी लेता है।

तो, असली यात्रा, इस सूक्ष्म शरीर, इस बेहोशी की है, जिसे हमने अहंकार भी कहा है। तो नींद और मृत्यु, इसी बेहोशी की वजह से है और इसी बेहोशी का ही परिणाम है।

दोनों में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नही है, सिवाय इसके की नीन्द यानि की आपका सौना एक छोटी मौत है, तो मृत्यु, एक लंबी नींद है।

तो इस तरह से हम रोज़ मरते भी है, और रोज़ जन्मते भी है, क्योंकि सौना और जागना और कुछ नहीं बल्कि वही जन्म और मृत्यु ही है। फर्क, केवल शरीरों का है। सौने के बाद, आप इसी शरीर में जागते है, जबकि मृत्यु के बाद आप नये शरीर में जागते है।

अब समझने की बात जो है, वह यह, की असल में यह यात्रा, यानि की सौना और जागना और एक दिन मर जाना, मतलब इस शरीर को त्याग देना और फिर नया जन्म, यानि एक नये शरीर में जागना, उस अहंकार या बेहोशी का है, जो इस शरीर की मृत्यु के बाद भी सूक्ष्म रूप में जिंदा रहता है और यही सूक्ष्म शरीर, जिस तरह नींद के बाद पुनः उसी शरीर में जागता है और अपना काम शुरू कर देता है। उसी तरह यही सूक्ष्म शरीर, मृत्यु के बाद, फिर नये शरीर में जागता है।

यह यात्रा यानि की रोज़- रोज़ सौना और जागना और फिर एक दिन लम्बी नीन्द में चले जाना और फिर नये शरीर में जागना यानि की नया शरीर लेना, उस बेहोशी, उस अज्ञान, उस अहंकार की वजह से है और उस अहंकार का ही नतीजा है।

तो, जब तक, यह बेहोशी रहेगी, यह अहंकार रहेगा, तब तक नींद और मृत्यु भी रहेगी। और यदि नींद और मृत्यु है तो, जागना और फिर से नये शरीर में जन्म लेना भी रहेगा। क्योंकि दोनों सौना और जागना और जन्म और मृत्यु अलग नहीं रह सकते.  

तो, अब यदि इस नींद और मृत्यु से हमेशा के लिये छुटकारा पाना है, तो इस बेहोशी से मुक्त होना होगा, इस सूक्ष्म शरीर को, जो बेहोशी के रूप में हमेशा ज़िंदा रहता है, उसको पूरी तरह से मिटाना होगा। इस बेहोशी से मुक्त होना ही, असली मुक्ति है।

अब इस बेहोशी को केवल और केवल, अपने होश को जगाकर कर ही तोड़ा जा सकता है। होश मुक्ति है। होश अहंकार का हनन है।

होश में, केवल होश है। होश में कोई सौना-जागना, जन्म-मरण यानि की नीन्द और मृत्यु नहीं है। होश मुक्ति है, नींद और मृत्यु से, हमेशा के लिये। ध्यान यानि मैडिटेशन, बेहोशी को तोड़ने और होश को जगाने की विधि का नाम है।

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