सन्यास का मतलब, बाहर कुछ छोड़ना नहीं है, बल्कि उस पकड़ को छोड़ना है, जो आपको इस संसार से बांधे रखती है।

सन्यास का मतलब बाहर कुछ छोड़ना नहीं है, बल्कि उस पकड़ को छोड़ना है, जो आपको इस संसार से बांधे रखती है। क्योंकि, जब तक आपके अंदर यह पकड़ बाक़ी है, तब तक आप कुछ ना कुछ अवश्य पकड़ लेंगे, फिर आप कहीं पर भी रहें। घर में या जंगल में।

लेकिन, यह पकड़, यदि छूट जाये, तो फिर आप कुछ भी नहीं पकड़ेंगे, फिर आप चाहे कहीं भी रहे, घर में या जंगल में, क्योंकि अब आपके लिये, घर और जंगल, सब एक जैसा ही है.

अब आपको कुछ भी नहीं छू सकता, कुछ भी नहीं पकड़ सकता। अब आपके लिये, घर भी जंगल और जंगल भी घर जैसा ही है। पकड़ यदि छूट जाये, तो फिर आपको जंगल या कहीं और जाने की भी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि अब आप कहीं भी रहें, आप कुछ भी नही पकड़ेंगे। हाँ फिर आप यदि चाहे, अपनी सुविधा के हिसाब से, जंगल में रहना, तो, आपकी मर्ज़ी।

तो असली मुद्दा भीतरी है, बाहरी नहीं है, क्योंकि पकड़ आपके अंदर यानि की आपके मन की है.

पकड़ बाहर, संसार की या विषय-वस्तु की नहीं है।

विषय-वस्तु या संसार आपको नहीं पकड़ता बल्कि आप उसे पकड़ते है। पकड़ या पहचान बनाना, आपके माइंड यानि की मन का है।

माइंड का दूसरा नाम ही लगाव या पकड़ है, जो दूसरे को देखते ही, पकड़ने यानि की उससे पहचान बना लेता है और आप उस विषय-वस्तु की और खींचे चले जाते है।

राग या द्वेष दोनों ही, उस पकड़ के दो अलग प्रकार है।

अब जो महत्वपूर्ण बात है, वह यह की पकड़ दूसरे के प्रति मतलब राग-द्वेष, हमेशा दूसरे के प्रति यानि की भौतिक के प्रति ही होता है, क्योंकि विचार और भाव, जिसके द्वारा हम दूसरों से जुड़ते या बंधते है, वे हमारे मन यानि माइंड की उपज है और माइंड में है।

पकड़, दुसरे को, दूसरा समझने में और दूसरा देखने से है. एक में, कोई दूसरा नहीं है और इसलिए एक में, कोई पकड़ भी नहीं है, क्योंकि एक में कौन पकडे, किसको पकडे और क्यों पकडे?

तो पकड़, दूसरे को दूसरा समझने में है। और यह दूसरा मतलब, संसार हमारे मन में और मन की वजह से है। माइंड दूसरे को अलग देखता है और इसलिये उसके प्रति राग-द्वेष के भाव और विचार उत्पन्न होते है। दूसरे को दूसरा यानि शरीर देखने और समझने से ही पहले विचार और फिर उसके साथ भाव भी उत्पन्न होते है और यह पकड़ा-पकड़ी का खेल शुरू हो जाता है।

अब समझने की बात जो है, वह यह है, की माइंड यानि मन जिसमें यह पकड़ है, वह हमारा स्वभाव नहीं बल्कि विभाव है, क्योंकि माइंड बाहरी है, जो हम यहाँ से लेते है, यहाँ से जमा करते है। माइंड हमारे स्वभाव यानि की चेतना का हिस्सा नही है।

चेतना में कोई माइंड यानि भौतिक या बाहरी जमावड़ा नहीं है. चेतना तो शुद्ध चेतना है। चेतना में दूसरा नहीं है। दूसरा माइंड में और माइंड की वजह से ही है।

हमारे मन की यह पकड़, हमारे उपर, बहुत गहरी है, पुरानी है, इसी पकड़ का दूसरा नाम बेहोशी भी है, जो आपके भागने से नही बल्कि इस पकड़ यानि की अपने मन पर, काम करने से ही हल्की होगी और फिर छूटेगी भी।

इसलिये काम भीतरी यानि अंदरूनी है, बाहरी नहीं है और इसलिये उसका संबंध रहने की जगह से नहीं है।

अब चूँकि काम आंतरिक है और इसलिये यह काम जहां अभी आप है, वहीं पर होकर भी यह काम हो सकता है। तो अब यदि आप अपने माइंड को त्यागने और उसको छोड़ने या माइंड से संन्यास या दूरी बनाने का काम यदि आप करते है तो आप सही अर्थ में सन्यासी है।

फिर आप, घर में होकर भी सन्यासी है। लेकिन, यदि इस माइंड को त्यागने का काम नहीं करते है, तो फिर जंगल में होकर भी गृहस्थी है.

एक बात और, जो इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है और वह यह की, मन की इस पकड़ को आप एक-एक करके नहीं छोड़ पायेंगे और ना ही यह सम्भव है। लेकिन यदि आप उसको छोड़ दें, जो सभी पकड़ की जननी है, जो सभी  पकड़ का कारण है, तो आपकी यह संसार यानि विषय-वस्तु की पकड़, एक ही झटके में टूट जाएगी।

तो अपने माइंड से संन्यास लेना, अपने माइंड से दूरी बनाना, जो सभी पकड़ का कारण है, वही असली संन्यास या त्याग है।

माइंड के छूटने के साथ ही, यह सांसारिक विषय-वस्तु की पकड़ भी, स्वतःही छूट जाती है। क्योंकि दूसरा मन में और मन से है। फिर आपको कुछ छोड़ने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि जिसे छोड़ना चाहिये, वह अब छूट गया। अब आप सन्यासी है, चाहें कहीं भी रहें या कोई भी कपडे पहने. ध्यान यानि मैडिटेशन, माइंड मतलब मन को त्यागने की विधि का नाम है. 

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