क्योंकि हमारा ध्यान पर्दे कि ओर कभी गया ही नहीं
जब हम लोग पिक्चर देखने जाते है तो पिक्चर में यानि जो कुछ हमारे सामने घट रहा है, उसमें इतना मशगूल हो जाते है या खो जाते है की हम, देख पाने की बात तो छोड़ो हम कभी यह भी नही जान पाते है की जो पिक्चर या चित्र हमने देखे, वो कहाँ देखे?
हम चित्रों में ही इतना खो जाते है कि,
यह सवाल हमारे जहन में कभी नहीं उठता या हम स्वयं से कभी नही पूछते की जो पिक्चर
मैंने देखी वह कहाँ देखी। सब कुछ इतना साफ और सामने होते हुए भी हम उस पर्दे को
नही देख या जान पाते जिस पर पिक्चर दिखती है। जिस पर्दे पर सब कुछ घटित होता है।
अब पूछने और जानने लायक सवाल यह है कि क्या, पर्दे के बिना पिक्चर का कोई अस्तित्व है? क्या पर्दे के बिना पिक्चर देखी जा सकती है? यदि पर्दा सामने ना हो, तो क्या आप पिक्चर देख सकते है?हमारे दिमाग़ में कभी यह प्रश्न नही उठा, क्योंकि की हमें पिक्चर देखने से फ़ुरसत नहीं है। और बाकी समय में जब पिक्चर सामने नही होती है, तो भी हमारे मन में विचार पिक्चर्स के इतने आते है, की हम उन्ही विचारों या ख़यालों में खोये रहते है और यह एक मूल प्रश्न कभी भी स्वयं से नही पूँछ पाते है।
ऐसा ही कुछ हमारी वास्तविक ज़िंदगी में भी हो रहा है। हम बाहर जो कुछ हो रहा या दिख रहा है, उसमे इतने खोये हुए है, की हमने कभी भी जानने की कोशिश नही की, कि जो भी मैं देख रहा हूँ, या देखता हूँ, वह कहाँ देखता हूँ, उसका उद्गम स्थान क्या और कहाँ है?
हम कभी नही जान पाते की वह पर्दा कहाँ है, जहां यह सब घटित होता या हो रहा है। हम बाहर तो, बहुत कुछ जानते है, और जानने में लगे रहते है, लेकिन उसे कभी नही जान पाते या जानने की कोशिश नही करते, जो स्वयं जानता (knower) है। बाहर की ओर हम इस क़दर व्यस्त होते है की हम उसे नही जान पाते, जो स्वयं द्दृष्टा; ज्ञाता और साक्षी है।
यदि, यह प्रश्न हमारे मन में उठ जाए की यह पिक्चर में कहाँ देखता हूँ या यह कि, क्या बिना पर्दे के पिक्चर देखी जा सकती है या बिना पर्दे के पिक्चर का होना सम्भव है, तो फिर पर्दे की खोज भी की जा सकती है।
इस दिशा में कुछ सार्थक कदम भी उठाये जा सकते है। लेकिन हम तो पिक्चर्स में ही ओर पिक्चर पर ही अटके हुए है और क्योंकि पिक्चर्स को इतनी अहमियत देते है. इसलिए स्वयं को भी एक पिक्चर ओर दूसरों को भी एक पिक्चर ही समझते है ओर पिक्चर जैसा ही व्यवहार करते है। हम खुद भी मात्र एक पिक्चर बनकर ही रह गये है ओर पिक्चर कि भांति ही जी रह रहे है।
हम पर्दे को तो पूरी तरह से भूल गए है। पर्दे की तरफ़ हमारा ध्यान ही नही गया। क्योंकि हम पिक्चर्स में ही उलझ कर रह गए है और एक पिक्चर बनकर जी रहे है, वही हमारे दुखों का मूल कारण है।
पिक्चर्स में उलझना और पिक्चर बनकर जीना मतलब शरीर में ओर शरीर होकर जीना; शरीर के लिये जीना। जबकि हमारी सच्चाई शरीर या पिक्चर नही है, हमारी सच्चाई पर्दा है। हम वह पर्दा है जिस पर सारे पिक्चर्स आते और जाते है। आना जाना पिक्चर्स का है क्योंकि पिक्चर्स अस्थायी या क्षणिक है। पर्दा स्थिर है इसलिए हमेशा से है। शाश्वत, निरंतर, अमर, अनादि और अनन्त - पर्दा पिक्चर शुरू होने के पहले, पिक्चर के दोरान और पिक्चर के बाद भी होता है।
जब आप एक पर्दा बनकर जी सकते है तो एक पिक्चर बनकर क्यों जी रहे है? पिक्चर बनकर जीना एक अहंकार का जीना है, एक व्यक्ति का जीना है यानि सीमित होकर जीना है। लेकिन पर्दा बनकर जीना डिवाइन यानि ईश्वर की तरह जीना है, असीमित होकर जीना है, इस अस्तित्व की भाँति जीना है।
फ़ैसला और चयन
आपका है। पिक्चर या सीमित होकर जीयेंगे तो यह शरीर यानि यह संसार - शरीर का मतलब
संसार- मिलेगा। लेकिन पर्दा या असीमित होकर जीयेंगे
तो आप भी इस अस्तित्व में समायोजित हो जाएँगे और नया शरीर धारण नहीं करना पड़ेगा, जिसको मुक्ति या
मोक्ष कहा है।
मुक्ति या मोक्ष का मतलब ऊर्जा का ऊर्जा में विलय हो जाना। अलग पहचान नही होना। शरीर सीमित के लिए है। असीमित को शरीर नही चाहिये क्योंकि असीमित को शरीर में नही बांधा या रखा जा सकता है। सीमित ही शरीर में रह सकता है। ध्यान (मैडिटेशन), पिक्चर से हटकर पर्दे को जानने और पर्दे कि तरह जीने कि विधि का नाम है।
पर्दे को कैसे जाना जा सकता है और परदे की तरह जीने की विधि क्या है
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