आध्यात्मिक होने का मतलब है, स्वयं के हाथों, स्वयं की, मौत - हमेशा के लिए.

आध्यात्मिक होने का मतलब है, ख़ुद के हाथों, ख़ुद की मौत - हमेशा के लिए. स्वयं के हाथों स्वयं की मौत, एक ऐसी मौत है, जिसके बाद, कोई जन्म नहीं है, कोई नया शरीर नहीं है.

आध्यात्मिक होने का अर्थ ही यह है, की इस शरीर में होते हुए, स्वयं के हाथों, अपनी चेतना को समेट लेना यानि की चेतना को, अपने शरीर से, धीरे-धीरे, अलग कर देना है.

अपने हाथों, चेतना को शरीर से अलग कर देना, नये शरीर के कारण को, हमेशा के लिए मिटा देना है और इसलिए यह एक ऐसी मौत है, जिसके बाद कोई जन्म नहीं है।

अध्यात्मिक होने का मतलब है की, अपने प्रयासों से उसको, मार देना है जो जन्म और मृत्यु का कारण है, जो जन्मता है और मरता है, जो नए शरीर का कारण है और नये शरीर लेता है.       

एक बात हमें समझनी चाहिए और वह यह, की आपकी वासनाये ही, आपकी चेतना को इस शरीर से बांधे रखने का काम करती है। वासनाएँ, एक गोंद का काम करती है, जो इस चेतना, इस ऊर्जा को शरीर से चिपकाये रखती है।

चेतना का शरीर से बंधा होना ही बंधन और चेतना का शरीर से मुक्त यानि अलग हो जाना ही, मुक्ति है। मुक्ति और मोक्ष शरीर के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि ऊर्जा के सन्दर्भ में है, क्योंकि हमारी वास्तविकता, यह शरीर नहीं बल्कि उर्जा है, चेतना है. हमारा सच जीवन ऊर्जा यानि की लाइफ एनर्जी है. 

अब, मैं आपको समझाता हूँ, की शरीर से चेतना को अलग किये जाने का यह काम, कैसे होता है या कैसे किया जाये? आप सब यह अच्छी तरह से जानते है, की जब आपके शरीर के किसी भी हिस्से में चोट लगती है, तो आपको वहाँ दर्द होता है?  क्या आप जानते है की, वह दर्द क्यों होता है?

चोट लगने पर, शरीर के उस हिस्से में दर्द इसलिये होता है, क्योंकि की, उस हिस्से में जहां आपको चोट लगी है, वहाँ पर चेतना है। यदि उस हिस्से में चेतना ना हो, तो आपको वहाँ चोट लगने पर भी दर्द नहीं होगा। यही कारण है की, जिन लोगों को पक्षाघात यानि की पैरालिसिस की बीमारी हो जाती है, तो उन लोगों को उस हिस्से में कोई दर्द का अहसास नहीं होता, क्योंकि उस हिस्से में अब चेतना का वास, नही रहा।

अब, मैं आपको यह सब इसलिये बता रहा हूँ, क्योंकि मृत्यु के तुरंत पहले भी, हमारे साथ ऐसा ही कुछ होता है। जिसे हम मृत्यु कहते है, वह और कुछ नहीं, बल्कि चेतना का पूरे शरीर से समेटा जाना है, चेतना का शरीर से अलग किया जाना है।

क्योंकि, चिपकी हुई चेतना को शरीर से हटाना है और इसलिए, इस प्रक्रिया के दौरान भयंकर पीड़ा होती है. यही वजह है की, यह चेतना को शरीर से हटाने का काम, बेहोशी में होता है। इसलिये, मृत्यु के तुरंत पहले, हम बेहोश हो जाते है, ताकि चेतना को शरीर से अलग किया जाने का काम, आसानी से हो सके। होश के होते हुए, भयंकर पीड़ा के कारण, यह काम सम्भव नहीं है और इसलिए प्रकृति, हमे मृत्यु के तुरन्त पहले बेहोश कर देती है। मृत्यु और कुछ नहीं, बल्कि चेतना का शरीर से अलग हो जाना है।

अब, जो बात हमें समझनी चाहिये, वह यह, की प्रकृति द्वारा चेतना को अलग किया जाना मृत्यु है, मुक्ति नहीं है। क्योंकि, नये शरीर का जो कारण है, यानि की, हमारी वासनाएँ, हमारी इच्छाएँ, हमारी प्रवर्तियाँ, आदतें, आदि वे सभी निचोड़ रूप में, मृत्यु के बाद भी, सूक्ष्म रूप में जिंदा रहती है। और यही हमारी वासनाओं का निचोड़ या सूक्ष्म शरीर, नये शरीर का कारण भी बनती है।

तो, मैं आपको बता रहा था, की प्रकर्ति द्वारा चेतना को शरीर से अलग किया जाना, शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति नहीं, बल्कि शरीर की मुक्ति अवश्य है, क्योंकि शरीर, मृत्युपरांत पुनः अपने स्त्रोत यानि की मिट्टी में जा मिलता है।

लेकिन, नये शरीर का कारण, मृत्यु के बाद भी बना रहता है। तो असली मुक्ति यानि की शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति तो तभी है, जब की शरीर के कारण को ही समाप्त कर दिया जाये यानि की उसको, हमेशा के लिए मार देना है, जो जन्म और मृत्यु का कारण है, जो जन्मता है और मरता है, जो नए शरीर का कारण है और नये शरीर लेता है. इसी का मतलब अध्यात्मिक होना है और असली मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण भी है. क्योंकि जब कारण ही नहीं रहेगा, तो उसका प्रभाव भी नहीं हो सकता है।

अब एक बात और जानिए की, इच्छाओं, प्रवर्तियों, आदतों, वासनाओं आदि का दूसरा नाम माइंड यानि मन है, क्योंकि माइंड और कुछ नहीं बल्कि इन्ही वासनाओं का एक समूह मात्र है.

तो मन यानि माइंड की जो पकड़ आपके ऊपर है, वह चेतना पर, इन्ही वासनाओं के बोझ के कारण है. तो, मन की उस पकड़ यानि वासनाओं के बोझ को ढीला करना, उसे कमजोर करना ही चेतना को धीरे-धीरे शरीर से अलग करना है. तो आप, यदि दो काम करें – पहला, अपनी चेतना को खुला रखना शुरू कर दें और दूसरा, अपने मन से दूरी बनाना सीख लें, तो माइंड यानि वासनाओं की पकड़, जो आप पर है, वह धीरे-धीरे खुलना शुरू कर देगी. चेतना को खुला रखने और मन से दूरी बनाने से, नयी वासनाओं का जमा होना बंद हो जाता है.

यदि नयी वासनाओं का जमा होना बंद हो जाये, तो पुरानी वासनाओं की, आप पर, पकड़, स्वत: ही कमजोर होना शुरू कर देती है, क्योंकि नयी वासनाये, पुरानी वासनाओं के लिए गोंद का काम करती है. नये गोंद के अभाव में, पुराना गोंद या उसकी पकड़ भी ज्यादा समय तक नहीं टिक सकती और उसी के साथ चेतना और शरीर के बीच दूरी बनना यानि की चेतना का शरीर से अलग होने का काम शुरू हो जाता है.        

प्रकृति के हाथों चेतना का अलग किया जाना, मृत्यु है, लेकिन यही काम, आदमी यदि प्रकृति के हाथों ना छोड़कर, ख़ुद करे, तो वह ख़ुद के हाथों, ख़ुद की मौत है। एक ऐसी मौत, जिसके बाद कोई दूसरा जन्म या शरीर नहीं, बल्कि हमेशा के लिये मर जाना है। क्योंकि जब चेतना को शरीर से बाँधने या चिपकाने की सामग्री यानि गोंद नहीं रहा, तो यह चेतना अब एक शरीर के साथ बंध कर भी नहीं रह सकती है। क्योंकि, बंधन यानि की चेतना का शरीर से चिपकाव, इच्छाओं की वजह से है।

चेतना का आदमी के स्वयं के प्रयासों से अलग होने को ही, शरीर छोड़ना कहा गया है या स्वयं के हाथों, स्वयं की मृत्यु कहा गया है। इसी का मतलब आध्यात्मिक होना है यानि की अपने प्रयासों से इस शरीर में होते हुए, शरीर के कारण को ही मिटा देना है। चेतना का स्वयं के प्रयासों से अलग किये जाने का मतलब है, की अब आप मृत्यु को उपलब्ध नहीं होंगे, मतलब आप सामान्य अर्थों में मरेंगे नहीं, बल्कि पूरे होश में आप अपना शरीर छोड़ेंगे और आप यह शरीर छोड़ने का काम ऐसे करेंगे, जैसे की, आप दूसरा कोई काम करते है.

होश की मृत्यु, मृत्यु नहीं है, बल्कि अपने शरीर को स्वयं अपने प्रयासों से अलग करना या छोड़ना है, जो सदा के लिए मर जाना है. इसके विपरीत, बेहोशी का मरना बार-बार का मरना है. एक बात आप गांठ बांध लीजिये और वह यह, की जो भी काम आप पूरे होश में करते है, वह काम या कर्म आपको कभी नहीं लगता है, और आप उस काम के परे चले जाते है. इसलिए होश जो आपका स्वभाव है, उसे जगाइए. ध्यान यानि मैडिटेशन और कुछ नहीं, बल्कि सतत होश को जगाने और स्वयं के हाथों, स्वयं की मौत, के लिए तैयार करने की विधि का नाम है।

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