यदि आप जो भी करें होश के साथ करे, तो अनावश्यक स्वतः ही छूट जायेगा और केवल वह शेष रहेगा, “जो है”।
देखिये, एक बात समझिये और बह यह की, जो भी आप करें, उसे यदि पूरे होश के साथ करे, तो अनावश्यक स्वतः ही छूट जायेगा और केवल वह शेष रहेगा, “जो है”। अभी आप अनावश्यक करते ही इसलिये है, क्योंकि जो भी आप करते है, वह आप बेहोशी में करते है। वह सब बेहोशी में होता है। करते वक्त, आप होश का इस्तेमाल नहीं करते।
आपका
होश आपके करने के साथ नहीं होता। आपका होश आपके करने के साथ नहीं बल्कि कहीं और या
किसी और में उलझा होता है। इसलिये, जो भी आप करते है, वह बेहोशी यानि मूर्च्छा
यानि आदतन होता है।
आदतन
मतलब मूर्च्छा। आदतन मतलब स्वचालित यानि जो ऑटोमैटिक होता है। आपको आपका होश नही
बल्कि आपकी आदतें आपको हाँकती है। आदत मतलब मन यानि माइंड आपको चलाता है।
मूर्च्छा
या बेहोशी मतलब, जैसे की आप किसी और के हाथों चल रहे है। जैसे की, एक मशीन या
खिलौने की तरह। एक मशीन या खिलौना दूसरे के चलाने से चलता है अपनी मर्ज़ी या अपने
करने से नहीं।
चूँकि, आप हमेशा बेहोशी में होते है, इसलिये ही आप अनावश्यक और ज़रूरत से ज़्यादा करते है। जैसे की खाते वक़्त, क्योंकि होश आपके खाने के साथ नही होता, इसीलिये या तो आप ज़्यादा खा लेते है या फिर स्वाद-वश यानि जो ज़रूरत का नहीं है, वह भी खा लेते है। यदि आप होश के साथ खाये, तो फिर उतना ही खाएँगे और वही खाएँगे जो आपके शरीर के लिये आवश्यक है।
आप दिन भर विचारों में होते है, जो अनावश्यक है। ज़्यादा करना है। ज़रूरत से ज़्यादा करना या अनावश्यक करना आपका है, बेहोशी और मूर्च्छा की वजह से है और इसलिये अहंकार है और बंधन का कारण है।
अनावश्यक
करना शरीर होकर होना है, क्योंकि आदतें शरीर की और शरीर के लिये होती है। इसलिये
मूर्च्छा है। चेतना मूर्च्छा नहीं, बल्कि होश है। होश के साथ किया हुआ काम उतना ही
होता है, जितना की आवश्यक है।
जैसे
की यदि आप होश को बनाये रखें, तो आप अनावश्यक विचार नहीं करेंगे। क्योंकि आप बेहोशी
में होते है, इसीलिये विचार चलते रहते है। बेहोशी का मतलब, ऊर्जा का एक निश्चित
दिशा में ही बहना। निश्चित दिशा में चलना, आदत की निशानी है।
होश एक निश्चित दिशा में नही बहता बल्कि आवश्यकता के अनुसार जिस दिशा में चलना चाहिये चलता है।
होश के साथ किया हुआ काम आपको बाँधता नही क्योंकि जो काम होश के साथ होता है या किया जाता है, वह आपका करना नहीं बल्कि होना है। होना आपको बाँधता नहीं बल्कि बन्धन से मुक्त करता है। बाँधना और बन्धन बेहोशी की वजह से है।
इसलिये
यदि आप होश का इस्तेमाल करते है, यदि आपकी चेतना आपके करने के साथ होती है, तो आप
अपनी आदतों की अभिव्यक्ति ना होकर, आप अपनी चेतना की अभिव्यक्ति बनेंगे।
चेतना
की अभिव्यक्ति होना, मतलब यह जानना की, मैं शरीर नही बल्कि चेतना, होश, सजगता
मात्र हूँ और करना उतना ही, जितना यहाँ होने के लिये ज़रूरी है। जबकि अनावश्यक
करना, स्वयं को शरीर मानना और शरीर होकर जीना है और चेतना यानि होश यानि अपनी
असलियत का ज्ञान नहीं होना है।
यही
ज्ञान और अज्ञान है। ज्ञान मतलब, चेतना में होना, चेतना को जानना और फिर जो आवश्यक
है वह करना। जबकि अज्ञान मतलब, शरीर होकर होना है और आदतन यानि शरीर-वश करते रहना
है। करना यानि आदतन करना, शरीर का है जबकि होना और जो आवश्यक है, वह करना चेतना
यानि होश का है।
यदि आप
होश के साथ करें, जो भी करें, तो धीरे-धीरे वह सब छूट जायेगा, जो अनावश्यक है, जो
आदते है, जो आपके स्वभाव का हिस्सा नहीं है।
एक दिन
आएगा जब आप एक चेतना यानि होश मात्र रह जायेंगे, जो आपका असली स्वरूप है।
उसका छूटना जो अनावश्यक है, वही असली त्याग और सन्यास है। सन्यास और त्याग का मतलब बाहर कुछ नही छोड़ना है। त्याग का मतलब, आपको कुछ छोड़ना नहीं है बल्कि अनावश्यक का स्वत छूटना है। ध्यान यानि मैडिटेशन का अभ्यास, उस सभी से आपकी दूरी बनायेगा, जो अनावश्यक है, जो आदत है और जो आपके स्वभाव का हिस्सा नही है।
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