भगवान बुद्ध की आँखें बंद क्यों है?

क्या आप जानते है, की भगवान गौतम बुद्ध, की आँखें बंद क्यों है? अब यही बात, जैनो के सभी तीर्थंकरों के लिये भी सही है। उन्हें भी, सभी जगह, बंद आँखों में ही देखा गया है? अब ऐसा क्यों है?

तो, देखिये, बंद आँखों में दिखाने के पीछे एक संदेश है, सभी को, की मुक्ति या मोक्ष, यानि की शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति, का रास्ता बाहर की ओर होकर नहीं बल्कि भीतर से, आपके अंदर से होकर जाता है। और यह सच, की मुक्ति का रास्ता, आपके अन्दर है, आप केवल और केवल बंद आँखों से ही जान पायेंगे, जैसा की गौतम बुद्ध और अन्यों ने जाना।

इस सच को, आप खुली आँखों से, कभी भी नहीं जान पायेंगे। क्योंकि खुली आँखें, मतलब संसार या दूसरा, मतलब की शरीर, क्योंकि दूसरा शरीर से है। अब शरीर का मतलब अहंकार है और इसलिए, आँखे खुली हुई होना और कुछ नहीं बल्कि स्वयं के अहंकार की पुष्टि और अहंकार का प्रदर्शन मात्र है।

अहंकार बेहोशी है और इसलिये बाहर, जो भी आप देखते है, यानि की जो भी गति या मूवमेंट, आपको बाहर दिखाई देता है, वह और कुछ नहीं, बल्कि बेहोशी का प्रदर्शन मात्र है। जो भी यहाँ हो रहा है, वह सब, शरीर द्वारा और शरीर के लिये हो रहा है।

खुली आँखे, आपके लिये केवल और केवल नये-नये संसार यानि भौतिक सुख-सामग्री आदि, जमा कर सकती है। आप दिन भर यानि की जागृत अवस्था में, खुली आँखों से जो कर रहे है, वह और कुछ नही बल्कि इस ‘मैं’ और ‘मेरे’ का विस्तार मात्र है। मतलब भौतिक या शरीर का विस्तार है क्योंकि भौतिक शरीर से है।

तो खुली आँखें मतलब बाहर की दौड़ और बाहर की दौड़, संसार की दौड़ है, जो आपके अहंकार की, और अहंकार की तृप्ति के लिये है।

दौड़ का मतलब आप कुछ बनने की कोशिश कर रहे है। कुछ पाने के लिए दौड़ रहे है। तो बनना-बिगड़ना, पाना-खोना, आदि भौतिक का है, अहंकार का है, नश्वर का है।

अब, कुछ पाने और कुछ बनने की, हमारी यह बैचैनी, यूँही ज़िंदगी भर बनी रहती है और इस तरह हमारा यह करना, भी यूँही बना रहता है। यह करना और बैचैनी, कभी ख़त्म नहीं होती और इसी करने की बैचैनी में ही, हमारी पूरी ज़िंदगी खप जाती है।

तो खुली आँखे और कुच्छ नही बल्कि इस मौक़े को जो हमे मिला है ,उसे व्यर्थ गवाना है। तो, बंद आँखों से, जो संदेश, हमें मिलता है, वह यह की, अपनी दौड़ बंद करो और भीतर ठहर जाओ। क्योंकि भीतर आपका केंद्र है, जो स्थिर और शांत है।

यह बिल्कुल एक समुन्दर की तरह है. लहरें और लहरों की हलचल, लहरों का शोर और उनकी उठा-पटक उपरी है, सतह पर है. जबकि समुन्दर अपनी गहराई में पूरी तरह से शांत और स्थिर है. वहां कोई शोर, कोई हलचल, कोई उठा-पटक नहीं है.

लेकिन यह सच आप तभी जान पाएंगे, जब आप समुन्दर की गहराई में जाएँ, समुन्दर के भीतर की गहराई को मापे.

अब क्योंकि, हम ऊपर, सतह पर लहरों को ही देखते है और जो दिखायी देता है, उसी में अटक जाते है और इसलिए, भीतर जो शांति और स्थिरता है, उससे हम अनभिग्य रह जाते है.      

तो, आपके अन्दर की शांति और स्थिरता को भी, आप तभी जान पायेंगे, जब आप आँखें बंद करके यानि की बाहर की दौड़ बंद करके, आप कुछ देर के लिये बैठेंगे।

आँखें बंद करना, ठहर जाना है। आँखें बंद होने के साथ ही, यह संसार आपके लिये लुप्त हो जाता है और तभी आप उस आयाम को जान पाते है, जो केवल है।

करना ऊपरी है, सतह पर है, आपका है और इसलिये अहंकार है। लेकिन होना, अस्तित्व का है, केंद्र का है, उसका है, जो केवल है। एक प्रजेंस या उपस्थिति की तरह। जो हमेशा से स्थिर और शांत है।

सतह पर आपका करना, उस केंद्र की स्थिरता और शांति को, कभी भंग नहीं कर सकता है। आनन्द, अपने केंद्र से जुड़ने का है, उस अस्तित्व का है। जबकि दुख, कष्ट, परेशानी, बंधन, अहंकार का यानि बाहर दौड़ने का है।

आनन्द, जिसे हमने ब्लिस भी कहा है, वह आपके ठहर जाने यानि की भीतर स्थिर हो जाने का है। उस आयाम से जुड़ जाने का है। यही कारण है, की गहरी नीन्द के बाद, आप अपने आप को इतना ताजा और एनर्जेटिक पाते है। क्योंकि गहरी नींद में, आप अपने केंद्र से जुड़ जाते है, अपने स्त्रोत से जुड़ जाते है। आनन्द का स्त्रोत, आनन्द का झरना, आपके भीतर है।

अभी आपके दुख, परेशानी, आपके कष्ट और बंधन का कारण, आपकी आँखों का खुला होना है यानि की बाहर घूमना है। अभी आप केवल दौड़ना और करना जानते है यानि की आपका जुड़ाव परिधि से है यानि की शरीर और मन से है।

शरीर और मन परिधि है। लेकिन आप यदि आँखें  बंद करना सिख लें यानि की आपका ठहरना हो जाये, तो आप जानेंगे की आपका केंद्र, जो इस अस्तित्व का केंद्र भी है, वह तो सदेव से स्थिर और शान्त है और सतह यानि परिधि पर होने वाली हलचल और शोर से अछूता है।

बस एक बार, यदि आपके अनुभव में यह आ जाये, तो फिर आप मुक्त है। फिर आप, सब कुछ करेंगे भी लेकिन वह अब आपको अशान्त और अस्थिर नहीं करेगा, क्योंकि अब आपकी पहचान अपने केंद्र से हो गई है,

अब आप अपने केंद्र से जुड गये है। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब आप थोड़ी देर के लिये अपनी आँखें बंद करके भीतर ठहर जाये।

एक बार आपने यह जान लिया, तो फिर आप खुली आँखों में भी बंद आँखों की तरह ही है, क्योंकि अब दौड़ बंद हुई। अब आप ठहरे हुए है। दौड़ में भी अब आप ठहरे हुए होंगे, क्योंकि अब आपका करना, आपको कभी भी विचलित नहीं कर सकता, कभी भी अन्दर से हिला नहीं सकता।

अब आपका करना भी जारी रहेगा और केन्द्र से जुड़ाव भी। क्योंकि, अब शरीर से उसकी दूरी हो गई, जो हमेशा से दूर और अछूता है।

खुली आँखें मतलब संसार, अहंकार या मन क्योंकि संसार और मन एक दूसरे के पर्याय है और इसलिये संसार और कुछ नही बल्कि मन यानि बेहोशी का विस्तार और प्रदर्शन मात्र है। जब की होश, भीतर केंद्र से जुड़ने यानि अपने स्त्रोत में ठहर जाने से है. अपने अस्तित्व के साथ एक हो जाने से है। जो आप बंद आँखों से ही जान पायेंगे। ध्यान यानि मैडिटेशन और कुछ नहीं बल्कि बंद आँखों से यहाँ होने का शुरुआती अभ्यास है।

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