अपनी जागृत अवस्था को सम्भालिये, क्योंकि वही एक चीज आपके हाथ में है।
एक बात आप जानिए और वह यह की, जिसे आप ज़िंदगी कहते और मानते है, वह आपकी जागृत अवस्था तक ही सीमित है। वास्तव में, ज़िंदगी का मतलब, उससे है, जो वक्त, आप अपनी जागृत अवस्था में बिताते है, क्योंकि, उसी अवस्था में, आप कुछ करते है और कुछ कर सकने की स्थिति में होते है।
आपके
नियंत्रण में, केवल और केवल, आपकी जागृत अवस्था ही है। नींद, जो आपकी दूसरी अवस्था
है, उस पर आपका कुछ भी नियंत्रण नहीं है, क्योंकि नींद तो बेहोशी है। नींद एक मौत
ही है। जैसे, नींद बेहोशी है, वैसे ही मौत भी बेहोशी ही है। नींद और कुछ नहीं,
बल्कि एक छोटी मौत ही है।
तो मैं आपको यह बता रहा था, की जिसे आप ज़िंदगी कहते और समझते है, वह आपकी जागृत अवस्था, तक ही सीमित है, क्योंकि उस अवस्था में आप कुछ मात्रा में सचेत होते है और यदि इस अवस्था में आप कुछ प्रयत्न करें, साधना करें, तो आप पूरी तरह से सचेतन, मतलब कॉन्ससियस हो सकते है यानि की, आप अपनी चेतना की अभिव्यक्ति बन सकते है, जो अध्यात्म का परम लक्ष्य है।
इसी को
सही अर्थ में जागना कहा गया है। सही अर्थ यानि की आध्यात्मिक अर्थ में जागने का
मतलब है, अपने स्वभाव यानि अपने चेतना की अभिव्यक्ति बन जाना, ना की अपने मन या विभाव
की अभिव्यक्ति होना, जैसा की अभी हमारी स्थिति है।
चूँकि,
अभी हम अपने स्वभाव यानि चेतना की अभिव्यक्ति ना होकर, अपने मन यानि विभाव की
अभिव्यक्ति है, और इसलिए अभी हम जागे हुए नहीं, बल्कि सोये हुए है।
जिसे आप
जागृत अवस्था कहते है और स्वयं को जागा हुआ समझते है, वह वास्तव में जागना नहीं,
बल्कि सोना यानि बेहोशी की ही एक दशा है।
चूँकि,
हम जाग्रत अवस्था में, पूरी तरह से मन के अधीन होते है, मन के नियंत्रण में होते है
और इसलिए हम जागे हुए भी सोये हुए ही हैं, क्योंकि मन का दूसरा नाम बेहोशी है। मन
और कुछ नही बल्कि हमारी आदतों, प्रवर्तियों, वासनाओं आदि का एक समूह मात्र है और
यही आदतें, प्रवर्तिया, हमारी जागृत अवस्था में हमको चलाती है और नियंत्रित भी करती
है।
तो यह बेहोशी या सोना है, इसलिये, क्योंकि, आपका वर्तमान, जो आपकी चेतना है, जो आपका स्वभाव है, वह आपको नही चलाता, बल्कि आपका भूत यानि की जो आपने, अभी तक यहाँ से इकट्ठा किया है, मन के रूप में, वह आपको चलाता और नियंत्रित करता है।
क्योंकि,
अपनी जागृत अवस्था में, मन आपको चलता है और वही मन फिर आपको नींद के रूप में
सुलाता भी है और यही मन, एक दिन आपको मौत के रूप में भी सुला देता है।
इस तरह
मौत और कुछ नही बल्कि एक लंबी नींद ही है, जैसे की नींद एक छोटी मौत है। इस तरह आपकी
ज़िंदगी और कुछ नही बल्कि सौना यानि मूर्च्छा में होना है।
अब यह मूर्च्छा, यह बेहोशी, होश में तब्दील हो सकती है और आप बेहोशी की नहीं, बल्कि अपने होश की अभिव्यक्ति बन सकते है यदि, आप अपनी जागृत अवस्था को सँभालें।
क्योंकि,
वही आपके हाथ में है और उसी समय, आप कुछ कर भी सकते है। अपनी जागृत अवस्था में, आप
कुछ होश में होते है, तो आप यदि, अपने होश को सम्भाले, मतलब की प्रति पल अपने होश
को पकड़ कर रखे, तो धीरे-धीरे आपका यह होश बढ़ने लगेगा और आप ज़्यादा से ज़्यादा सचेतन
यानि की अपनी चेतना, अपने स्वभाव के नियंत्रण में आप रहेंगे। मतलब, यह की अब आपका
स्वभाव, आपका होश आपको चलायेगा ना की आपका मन या विभाव।
अपनी चेतना की अभिव्यक्ति होना ही, सही अर्थ में यानि की आध्यात्मिक अर्थ में जागना है। यदि आप अपने प्रयासों से होश को जगा लेते है और अपनी जागृत अवस्था में सचेतन हो जाते है, तो अब आप सोयेंगे नहीं, मतलब अब आपके लिये नीन्द भी समाप्त हो जाएगी क्योंकि अब आप नींद में भी जागे रहेंगे, यानि की अब आपकी नींद, भी आपकी चेतना, आपके होश की अभिव्यक्ति होगी, ना की मन या बेहोशी की।
अब आप
सही अर्थों में जाग गये है। अब आपके लिये नींद और मौत दोनों हमेशा के लिये विदा हो
चुके है। क्योंकि नींद और मौत तभी तक है,
जब तक बेहोशी यानि की आपका मन, आपका अहंकार, आपका विभाव बाक़ी है।
आना-जाना, सोना और जागना, मृत्यु और जन्म अहंकार का है, मन का है। मन के पूरी तरह से ख़त्म होने के बाद, आपके लिए कोई मौत नही है।
अब समय
आने पर, आप मरेंगे नहीं बल्कि पूरे होश में अपना शरीर छोड़ेंगे और होश की मृत्यु
हमेशा के लिए मर जाना है, जबकि बेहोशी का मरना बार-बार का मरना है।
ध्यान यानि मैडिटेशन अपनी जागृत अवस्था में अपने होश को जगाने की विधि का नाम है।
Comments
Post a Comment