क्योंकि देखने वाला है, इसलिये दूसरा है। अन्यथा दूसरा नही है।
क्या आप जानते है, की दूसरा इसलिये है, क्योंकि देखने वाला है? अन्यथा दूसरा नही है। दूसरा या दिखायी देने वाला, देखने वाले की वजह से ही है और इसलिये देखना भी है। इस तरह यह तीनों चीजें, यानि देखने वाला, दिखायी देने वाला और देखना आपस में जुड़े हुए है। जैसे की यदि दिखायी देने वाला है, तो इसका मतलब यह हुआ की देखने वाला और देखना भी है।
लेकिन, यदि देखने वाला ना हो, तो दिखायी देने वाला और देखना भी नही हो सकता है। कैसे? यह मैं आप लोगों को समझाता हूँ। क्या आप जानते है, की गहरी नींद में दिखायी देने वाला और देखना, दोनों ही नही होते है क्योंकि देखने वाला नही होता है।
नींद
में देखने वाला भी सो जाता है, यानि कुछ समय के लिये ग़ायब हो जाता है और इसलिये
देखना और दिखायी देने वाला भी नहीं होता है। यही वजह है, की नींद में, आपके चारों
और सब कुछ घटित होता है, जैसे की आपकी जागृत अवस्था में होता है, फिर
भी संसार आपके लिए नहीं होता, आपके अनुभव में नहीं
होता क्योंकि नींद में देखने वाला नही होता है।
नींद
में, एक तरह से सब कुछ यानि पूरा संसार, अचानक आपके लिये ग़ायब हो जाता है,
क्योंकि नींद में देखने वाला ग़ायब हो जाता है।
नींद से जागने के तुरंत बाद, यह देखना और दिखायी देने का काम फिर से शुरू हो जाता है, क्योंकि आपके जागने के साथ ही, देखने वाला भी जाग जाता है। इस तरह नींद से बाहर आते ही संसार भी अचानक आपके लिए पैदा हो जाता है, जो नींद में अचानक ग़ायब हो गया था.
जागृत
अवस्था में आपका मन जागा हुआ होता है और उसी के साथ, ये तीनों काम, यानि देखने
वाला, दिखायी देने वाला और देखना भी होता है। देखना, मन यानि माइंड का है, जो
अहंकार है। नींद में अहंकार यानि देखने वाला यानि मन, मोजूद नहीं होता और इसलिए यह
देखने, दिखाने का खेल भी नही होता है।
तो अब, यदि आप अपनी जागृत अवस्था में, देखना बंद कर दें, जैसे की नींद में आपका देखना नहीं होता हालाँकि नींद में भी आपके चारों ओर सब कुछ घटित होता है, तो जागृत अवस्था में फिर आपके लिये कुछ भी उपस्थित नहीं होगा। सब कुछ होकर भी आपके लिये नही होगा, संसार होकर भी आपके लिये संसार नहीं होगा क्योंकि देखने वाला नहीं होगा। संसार यानि दुसरे के लिए, पहले यानि देखने वाले का होना जरुरी है. संसार खुद के होने यानि अहंकार में और अहंकार से है.
अब नही देखने का मतलब, अपनी आँखों को बंद नहीं करना है। नहीं देखने का मतलब, इतना ही है की, यदि जो भी आपकी आँखों के सामने घटित होता है और वह आपको छू नही पाता यानि आपके अंदर कोई गति, कोई मूवमेंट, कोई कम्पन नही कर पाता, तो फिर बाहर कुछ होकर भी, आपके लिये वह नहीं होता है क्योंकि वह आपको प्रभावित नही करता है।
कोई
चीज, या कोई घटना आपके लिये तभी मायने रखती है, जब वह आपको अंदर गति दे, आपको अंदर
से हिलाए या प्रभावित करे। यदि कोई घटना या कोई भी चीज आपको अंदर से प्रभावित नही
करे तो, एक तरह से वह आपके लिये होकर भी नहीं होती है।
इसी को
नही देखना कहा है। इसी को होकर कर जीना या जागते हुए सोना कहा गया है। इसी को
साक्षी होना भी कहा गया है। और इसको ही अवेयरनेस यानि होश, चेतना, सजगता में होना
कहा गया है। इसी को समर्पण भी कहा गया है. भीतर स्थिर हो जाना, साक्षी होना है,
जागते हुए सोना या देखना बंद कर देना है।
अभी आपका देखना, देखना नही बल्कि अहंकार का प्रदर्शन मात्र है. अहंकार की पुष्टि मात्र है क्योंकि, आपका देखना और कुछ नही बल्कि आपकी प्रतिक्रिया है, इसलिये आपका करना है और करना, अहंकार है। चेतना यानि अवेयरनेस में कोई करना नही है. अवेयरनेस शुद्ध दर्शन यानि सम्यक् दर्शन है जिसका मतलब बिना प्रतिक्रिया या बिना विचारों के देखना। उसी का मतलब भीतर से स्थिर हो जाना भी है यानि भीतर कोई कंपन का या गति का नही होना है।
देखने वाला, देखना और दिखायी देना ये तीनों अहंकार है और बंधन यानि कर्मों के निर्माण का कारण है. संसार आपके होने में है, आपके देखने यानि आपके अहंकार से है। अन्यथा संसार यानि दूसरा वास्तव में नही है।
साक्षी
यानि परमात्मा का मतलब केवल उपस्थिति की तरह यहः होना है यानि देखना बंद कर देना
है। यह अस्तित्व केवल उपस्थिति मात्र है जिसकी अपनी कोई इच्छा या एजेंडा नहीं है.
Comments
Post a Comment