जब तक़ दूसरा है, तब तक मुक्ति नहीं है, क्योंकि मुक्ति…..
देखिए, एक बात, आप लोग अच्छी तरह से जान लीजिए और समझ लीजिए की, जब तक दूसरा है, तब तक, वह पहला नही है, जो है और जो एक मात्र सच है।
अब यह जो दूसरा है, वह हमेशा आपकी जागृत अवस्था में, आपके अंदर काम कर रहा है। जो, दिन भर, आपके अंदर, ख़ुद से बात करता रहता है और बात-बात पर, अपनी प्रतिक्रिया भी करता है। जो देखता और करता भी रहता है, कुछ ना कुछ।
जब भी,
आप कुछ देखते है, यानि की, आपकी आँखों के सामने कुछ घटित होता है, तो यह दूसरा,
तुरंत आपके देखने के साथ ही, अपनी प्रतिक्रिया भी देता है।
वैसे,
असली देखने वाला यानि दृष्टा, वह पहला ही है, लेकिन उसकी अपनी कोई प्रतिक्रिया या
कोई करना नहीं है। करना यानि अहंकार, दूसरे का है,
मतलब आपका है. पहला यानि वह जो एक है, वह तो सिर्फ़ है, एक उपस्थिति की तरह, क्योंकि
उसमे कोई अहंकार नहीं है, अपने होने का और करने का।
अपनी उपस्थिति का अहंकार तो हमें है और इसलिए हम उस पहले से अलग है, जो है और यही अहंकार, यानि की यह दूसरा ही हमारे दुख, कष्ट, पीड़ा, बंधन आदि का कारण भी है। क्योंकि, जब तक यह दूसरा है, तो आप है, आपका अहंकार है और इसलिये तब तक, आना-जाना भी है, क्योंकि आना-जाना यानि जन्म और मृत्यु, अहंकार का है, उस दूसरे का है।
पहले
का कोई आना-जाना या जन्म-मृत्यु नही है। पहला तो, हमेशा से और सदैव से, वही पहला
और एक ही है। उस एक में, कोई दूसरा नहीं है और उसमें कोई बदलाव भी नहीं है। दूसरा
हमारी निर्मिति है, दूसरा अहंकार की वजह से है।
तो, असली मुक्ति तो, इस दूसरे से मुक्त होने पर ही है। अब, इस दुसरे से मुक्ति का काम भी, आपको स्वयं, अपने हाथों, अपने प्रयासों से करना पड़ेगा और वह भी आपको, इस शरीर में होते हुए ही करना पड़ेगा।
कोई दूसरा
आपके लिए, यह काम नहीं कर सकता है। इस दूसरे को, अपने हाथों से मिटाना, यही एक मात्र
साधना है और उसी साधना का दूसरा नाम, आध्यात्मिक होना भी है।
दूसरे
को ख़त्म करने के बाद, पहला यानि मुक्ति स्वतः ही है। आपने स्वयं को यानि अहंकार
को मिटाया, तो मुक्ति यानि जो पहला है, वह तो सदैव से विद्यमान है।
आपके
होने यानि की इस दूसरे ने ही, पहले को छिपाया हुआ है, जैसे की बादलों की ओढ में,
सूरज छिप जाता है। लेकिन बादलों के हटते ही, सूरज तो है। उसी तरह, दुसरे यानि की,
आपके हटते ही, पहला भी मौजूद है।
तो, जब
तक आप उस दुसरे को अपने प्रयासों से, अपने हाथों से नहीं मिटाते, तब तक मुक्ति
संभव नहीं है, क्योंकि मुक्ति केवल एक हो कर, मतलब केवल और केवल, उस एक यानि पहले
के साथ, होकर ही संभव है।
अब, क्योंकि
की, इस दूसरे की निर्मिति भी आपके हाथों हुई है, तो इसका ख़ात्मा भी, केवल और केवल,
आप ही कर सकते है।
तो दूसरे को हटाने का, दूसरे को मिटाने का काम करिए। यही एक मात्र साधना है। दूसरा सभी जो भी आप करते है, अध्यात्म या साधना के नाम पर, लेकिन यदि, यह असली काम, आप नहीं करते है, तो सब व्यर्थ है. इस सुनहरे मौके को गँवाना है.
लेकिन,
यह असली काम, यदि आप इस शरीर में रहते हुए करते है और इस दूसरे को मिटा देते है,
तो फिर आप मुक्त हुए, इस शारीरिक अस्तित्व से,
क्योंकि अब आपका आना-जाना, हमेशा के लिए समाप्त हुआ.
आना-जाना
दुसरे की वजह से है और दुसरे को अपने प्रयासों से मिटा देना, उस कारण को ही मिटा
देना है. अब आप हमेशा के लिए जिन्दा रहेंगे, मतलब समय आने पर, आप उस एक यानि पहले
में समाहित हो जायेंगे जो सदेव से है और एक मात्र सच है.
ध्यान यानि मैडिटेशन, दूसरे को मिटाने की साधना का ही नाम है।
Comments
Post a Comment