क्या आप जानते है की, एक समय के राजकुमार, जिनका नाम सिद्धार्थ था, वे भगवान गौतम बुद्ध कैसे बने?

क्या आप जानते है की, एक समय के राजकुमार, जिनका नाम सिद्धार्थ था, वे भगवान गौतम बुद्ध कैसे बने? यानी की एक सामान्य आदमी से, भगवान का दर्जा उन्होंने कैसे पाया? तो उत्तर है की, ऐसा इसलिये संभव हुआ, क्योंकि, उन्होंने विद्रोह का रास्ता अपनाया। एक बात आप लोग जानिये की आध्यात्मिक होना, ध्यानी होना, विद्रोही होना है। अब यह विद्रोह बाहर किसी आदमी विशेष या किसी सत्ता के विरुद्ध नहीं है, बल्कि, यह विद्रोह, जो हमारी आँखों के सामने हो रहा है यानी की जो भी हमे दिखायी दे रहा है उसके विरुद्ध है। 

तो आध्यात्मिक होने का मतलब है कि जो कुछ भी हो रहा है या माना जा रहा है उसको नहीं मानना, उसको नहीं स्वीकारना बल्कि उसके विरुद्ध जाना यानी की, यह तय करना की मैं इसे मानूँगा नहीं बल्कि स्वयं खोजूँगा यानी की ख़ुद अपने अनुभव से जानूँगा की असलियत क्या है? क्या वही सच है जो चल रहा है, जो माना जा रहा है, जो दिखायी दे रहा है या उसके आगे और भी कुछ है? राजकुमार सिद्धार्थ ने यही किया कि उन्होंने विद्रोह का रास्ता अपनाया, यानी की अपने सारथी की बातों को नहीं माना।जो दिखायी दिया या जो हो रहा है, उसिको यहाँ होने का एक मात्र तरीक़ा नहीं माना बल्कि विद्रोह का रास्ता अपनाया, यानी की, तुरंत यह तय किया कि मैं स्वयं अपने अनुभव से, अपने प्रयासों से यह पत्ता करूँगा कि सच क्या है। और इसीलिए सिद्धार्थ ने उसीरात घर छोड़ दिया। वे “लकीर के फ़क़ीर” नहीं बने मतलब यह कि जो हो रहा या दिखायी दे रहा है उसको ज्यों का त्यों स्वीकारने की बजाय विद्रोह का रास्ता यानी की एक अलग रास्ता चुना। यदि सिद्धार्थ भीअपने सारथी की कही हुई बातों को मान लेते की जो कुछ हो रहा है वही होता है या वही सच है यानी की बुढ़ापा आता है, बीमारी होती है, मृत्यु भी होती है, तो सिद्धार्थ भी, एक सिद्धार्थ होकर ही यानी की एक सामान्य आदमी होकर ही हो जाते और हमे भगवान बुद्ध नहीं मिल पाते। 

सिद्धार्थ, भगवान बुद्ध बन ही इसलिये पाये, क्योंकि उन्होंने सांत्वना यानी सारथी की कही बातों को यों ही नहीस्वीकार किया बल्कि उसके विरोध में खड़े हो गये और भरी जवानी में, राज-पाट, वैभव आदि और अपनी जवान और सुंदर पत्नी और नवजात पुत्र को, उसी रात छोड़कर, सत्य की खोज में जंगल चले गये। तो अध्यात्म का मार्ग यानी ध्यान का मार्ग विद्रोह का मार्ग है। भगवान बुद्ध का, महावीर का रास्ता, यानी की, ज्ञान-मार्ग विद्रोह का रास्ता है। जितनी भी विधियाँ है, इस ज्ञान मार्ग पर है, जैसे की ध्यान, आत्म-जाँच, आदि वे और कुछ नही बल्कि विद्रोही यानी की आध्यात्मिक होने के तरीक़े है। तो, जो भी यहाँ होता है दिखायी देता है उसे ऐसे ही मत स्वीकार करिए, बल्कि उसके विरोध में खड़े होइए यानी की अपने प्रयासों से यह जँचिये और परखिये की सत्य क्या है? क्या यह फिजिकल यानी की भौतिक जो दिखायी देता है, क्या वही सत्य है या उसके आगे भी कुछ है? सिद्धार्थ, गौतम बुद्ध तब कहलाये, जब उन्होंने अपने अनुभव से यह जाना कि इस शरीर के आगे भी कुछ ऐसा है जो कभी बीमार नहीं होता, कभी बुड्ढा नही होता और जो कभी मरता भी नहीं है। 


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