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Showing posts from December, 2023

DON’T MAKE NEW (YEAR) RESOLUTIONS. INSTEAD, LEARN TO BE FULLY RESOLVED WITHIN.

Don’t make new (year) resolutions.  Instead, learn to be fully resolved within. Now, being resolved within, means you exist in tune, with the existence, with the consciousness, which is your nature, your reality. In fact, you need to make new resolutions, only, because you don’t know, as how to be in tune, with this existence.  Do you see the existence on the outside. This existence, is total silence, total stillness, because, it has no intention, no agenda, no resolutions, of its own. Only, that which has no resolutions, of its own, can alone be still and silent. Consciousness or existence just exists and makes no resolutions of its own and yet all that needs to happen, just happens effortlessly and without its doing. Because, the existence has no resolutions or conflicts within, with anything on the outside and that’s why, it’s always the same, always ‘as it is’ and always remains untouched by all, that happens, in its very lap.  Because, we have our agenda, our re...

YOU CANNOT BECOME SILENT BY YOUR DOING. SILENCE, RATHER, HAPPENS, FROM WITHIN.

Please understand one thing, that you cannot become silent,  because, trying to become silent, is your doing and hence, it is an imposition from the outside. True silence, rather, arises or happens, from within, since, silence is your very nature. Silence, is the quality of the consciousness, which you are. Consciousness is just a presence and only, that which is just present, meaning, that which is just there, without any doing or agenda of its own, can alone be truly silent.  Noise is of the movement, of the physical and hence, is yours. Noise is a doing of your ego, of the individuality. Hence, trying to become silent, is to impose silence, from outside and therefore, is temporary. But silence, which arises from within, is internal, of your nature, of your reality, of the consciousness and hence, is permanent, which stays with you forever.  Doing is an effort but that which happens, from within, is effortless and hence, is natural.  This existence or the conscio...

UNCONSCIOUSESS COMES FOR FREE BUT CONSCIOUSNESS NEEDS TO BE EARNED

Please know that, unconsciousness and not consciousness is our birthright, because unconsciousness is given to us, by the nature, with the birth itself. So, unconsciousness comes to us, for free but consciousness has to be earned. For consciousness, you need to strive because, without your striving, without your efforts, consciousness will not come to you, though, it’s your very nature.   The physical form itself, which you are in, right now, means, that you exist here, as unconsciousness, because only unconsciousness needs physical expression, and that’s why, this body. Consciousness, on the other hand, needs no physical form, because, it has nothing physical, in it, to express itself. Consciousness is just presence, just being.   The unconsciousness exists in you, in the form of your tendencies; desires etc which, we traditionally know, as vasanas. These vasanas, are physical in nature, because tendencies etc are of the body and for the body only and hence, the uncons...

HUMAN OR THE DIVINE.

These are, the two possibilities, for you, to exist here i.e. you exist here either, as a human or as the divine. Now, this in turn depends, on the way, you deal with the physical. If you compulsively react to the physical, then you exist here, as human, as a person, as an ego or as an individual because reacting is physical, reacting is compulsive and hence, unconsciousness. Unconsciousness is human and consciousness is divine. So, if you pay some attention, then you will notice, that this is, what we are doing all the time i.e. we are compulsively reacting to the physical, all the time, in our wakefulness. Existing in a compulsive state, is to exist here, as a physical, as a body. Now, reacting, is a way of protection and survival of the physical only, because, you see yourself, as this body and you therefore also see others, as physical bodies only. Because, you only know the physical and that’s why, you react, all the time, to the physical. Other creatures are doing just this ...

आध्यात्मिक होने का मतलब है, स्वयं के हाथों, स्वयं की, मौत - हमेशा के लिए.

आध्यात्मिक होने का मतलब है, ख़ुद के हाथों, ख़ुद की मौत  - हमेशा के लिए. स्वयं के हाथों स्वयं की मौत , एक ऐसी मौत है, जिसके बाद, कोई जन्म नहीं है, कोई नया शरीर नहीं है. आध्यात्मिक होने का अर्थ ही यह है, की इस शरीर में होते हुए , स्वयं के हाथों, अपनी चेतना को समेट लेना यानि की चेतना को, अपने शरीर से, धीरे-धीरे, अलग कर देना है. अपने हाथों, चेतना को शरीर से अलग कर देना, नये शरीर के कारण को, हमेशा के लिए मिटा देना है और इसलिए यह एक ऐसी मौत है, जिसके बाद कोई जन्म नहीं है। अध्यात्मिक होने का मतलब है की, अपने प्रयासों से उसको, मार देना है जो जन्म और मृत्यु का कारण है , जो जन्मता है और मरता है, जो नए शरीर का कारण है और नये शरीर लेता है.        एक बात हमें समझनी चाहिए और वह यह, की आपकी वासनाये ही, आपकी चेतना को इस शरीर से बांधे रखने का काम करती है। वासनाएँ, एक गोंद का काम करती है, जो इस चेतना, इस ऊर्जा को शरीर से चिपकाये रखती है। चेतना का शरीर से बंधा होना ही बंधन और चेतना का शरीर से मुक्त यानि अलग हो जाना ही, मुक्ति है। मुक्ति और मोक्ष शरीर के सन्द...

सन्यास का मतलब, बाहर कुछ छोड़ना नहीं है, बल्कि उस पकड़ को छोड़ना है, जो आपको इस संसार से बांधे रखती है।

सन्यास का मतलब बाहर कुछ छोड़ना नहीं है, बल्कि उस पकड़ को छोड़ना है, जो आपको इस संसार से बांधे रखती है। क्योंकि, जब तक आपके अंदर यह पकड़ बाक़ी है, तब तक आप कुछ ना कुछ अवश्य पकड़ लेंगे, फिर आप कहीं पर भी रहें। घर में या जंगल में। लेकिन, यह पकड़, यदि छूट जाये, तो फिर आप कुछ भी नहीं पकड़ेंगे, फिर आप चाहे कहीं भी रहे, घर में या जंगल में, क्योंकि अब आपके लिये, घर और जंगल, सब एक जैसा ही है. अब आपको कुछ भी नहीं छू सकता, कुछ भी नहीं पकड़ सकता। अब आपके लिये, घर भी जंगल और जंगल भी घर जैसा ही है। पकड़ यदि छूट जाये, तो फिर आपको जंगल या कहीं और जाने की भी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि अब आप कहीं भी रहें, आप कुछ भी नही पकड़ेंगे। हाँ फिर आप यदि चाहे, अपनी सुविधा के हिसाब से, जंगल में रहना, तो, आपकी मर्ज़ी। तो असली मुद्दा भीतरी है, बाहरी नहीं है , क्योंकि पकड़ आपके अंदर यानि की आपके मन की है. पकड़ बाहर, संसार की या विषय-वस्तु की नहीं है। विषय-वस्तु या संसार आपको नहीं पकड़ता बल्कि आप उसे पकड़ते है। पकड़ या पहचान बनाना, आपके माइंड यानि की मन का है। माइंड का दूसरा नाम ही लगाव या पकड़ है, जो दूसरे को द...

अपनी जागृत अवस्था को सम्भालिये, क्योंकि वही एक चीज आपके हाथ में है।

एक बात आप जानिए और वह यह की, जिसे आप ज़िंदगी कहते और मानते है, वह आपकी जागृत अवस्था तक ही सीमित है। वास्तव में, ज़िंदगी का मतलब, उससे है , जो वक्त, आप अपनी जागृत अवस्था में बिताते है, क्योंकि, उसी अवस्था में, आप कुछ करते है और कुछ कर सकने की स्थिति में होते है। आपके नियंत्रण में, केवल और केवल, आपकी जागृत अवस्था ही है। नींद, जो आपकी दूसरी अवस्था है, उस पर आपका कुछ भी नियंत्रण नहीं है, क्योंकि नींद तो बेहोशी है। नींद एक मौत ही है। जैसे, नींद बेहोशी है, वैसे ही मौत भी बेहोशी ही है। नींद और कुछ नहीं, बल्कि एक छोटी मौत ही है। तो मैं आपको यह बता रहा था, की जिसे आप ज़िंदगी कहते और समझते है, वह आपकी जागृत अवस्था, तक ही सीमित है, क्योंकि उस अवस्था में आप कुछ मात्रा में सचेत होते है और यदि इस अवस्था में आप कुछ प्रयत्न करें, साधना करें, तो आप पूरी तरह से सचेतन, मतलब कॉन्ससियस हो सकते है यानि की, आप अपनी चेतना की अभिव्यक्ति बन सकते है, जो अध्यात्म का परम लक्ष्य है। इसी को सही अर्थ में जागना कहा गया है। सही अर्थ यानि की आध्यात्मिक अर्थ में जागने का मतलब है, अपने स्वभाव यानि अपने चेतना की अभ...

जन्म और मृत्यु, बिल्कुल वैसे ही जैसे की रात को सौना और सुबह फिर से जागना।

देखिये , जन्म और मृत्यु और कुछ नहीं, बल्कि बिलकुल वैसे ही, जैसे की रात में सौना और सुबह फिर जागना। दोनों में कोई ज़्यादा फर्क नही है। दोनों ही स्थितियाँ बेहोशी की है। सौना बेहोशी है तो, मृत्यु भी बेहोशी ही है। नींद में आप हमेशा बेहोशी में ही प्रवेश करते है, तो मृत्यु में भी आप बेहोशी में ही प्रवेश करते है। नींद में यानि की सौते वक्त, आप सूक्ष्म शरीर के रूप में मोजूद होते है, तो मृत्यु के बाद भी आप सूक्ष्म शरीर के रूप में ही मोजूद होते है। और दोनों ही स्थितियों में, आप फिर से जागते है। फर्क सिर्फ़ इतना ही होता है की, सौने के बाद, आप पुनः उसी शरीर में जागते है, जबकि मृत्यु के बाद आप एक नये शरीर में जागते है।   दोनों ही स्थितियों में, वही पुरानी बेहोशी यानि आपका माइंड फिर से काम करना शुरू कर देता है। देखा जाये, तो वही पुरानी बेहोशी यानि की सूक्ष्म शरीर, ही वास्तव में सौता और जागता है। और यही सूक्ष्म शरीर मरता भी है और फिर से जन्म भी लेता है। तो, असली यात्रा, इस सूक्ष्म शरीर, इस बेहोशी की है, जिसे हमने अहंकार भी कहा है। तो नींद और मृत्यु, इसी बेहोशी की वजह से है और इसी बे...

जब तक़ दूसरा है, तब तक मुक्ति नहीं है, क्योंकि मुक्ति…..

देखिए, एक बात, आप लोग अच्छी तरह से जान लीजिए और समझ लीजिए की, जब तक दूसरा है, तब तक, वह पहला नही है, जो है और जो एक मात्र सच है। अब यह जो दूसरा है, वह हमेशा आपकी जागृत अवस्था में, आपके अंदर काम कर रहा है। जो, दिन भर, आपके अंदर, ख़ुद से बात करता रहता है और बात-बात पर, अपनी प्रतिक्रिया भी करता है। जो देखता और करता भी रहता है , कुछ ना कुछ। जब भी, आप कुछ देखते है, यानि की, आपकी आँखों के सामने कुछ घटित होता है, तो यह दूसरा, तुरंत आपके देखने के साथ ही, अपनी प्रतिक्रिया भी देता है। वैसे, असली देखने वाला यानि दृष्टा, वह पहला ही है, लेकिन उसकी अपनी कोई प्रतिक्रिया या कोई करना नहीं है । करना यानि अहंकार, दूसरे का है, मतलब आपका है. पहला यानि वह जो एक है, वह तो सिर्फ़ है, एक उपस्थिति की तरह, क्योंकि उसमे कोई अहंकार नहीं है , अपने होने का  और करने का। अपनी उपस्थिति का अहंकार तो हमें है और इसलिए हम उस पहले से अलग है, जो है और यही अहंकार, यानि की यह दूसरा ही हमारे दुख, कष्ट, पीड़ा, बंधन आदि का कारण भी है। क्योंकि, जब तक यह दूसरा है, तो आप है, आपका अहंकार है और इसलिये तब तक , आना-जाना...

भगवान बुद्ध की आँखें बंद क्यों है?

क्या आप जानते है, की भगवान गौतम बुद्ध, की आँखें बंद क्यों है ? अब यही बात, जैनो के सभी तीर्थंकरों के लिये भी सही है। उन्हें भी, सभी जगह, बंद आँखों में ही देखा गया है ? अब ऐसा क्यों है ? तो, देखिये, बंद आँखों में दिखाने के पीछे एक संदेश है, सभी को, की मुक्ति या मोक्ष, यानि की शारीरिक अस्तित्व से मुक्ति, का रास्ता बाहर की ओर होकर नहीं बल्कि भीतर से, आपके अंदर से होकर जाता है। और यह सच, की मुक्ति का रास्ता, आपके अन्दर है , आप केवल और केवल बंद आँखों से ही जान पायेंगे, जैसा की गौतम बुद्ध और अन्यों ने जाना। इस सच को, आप खुली आँखों से, कभी भी नहीं जान पायेंगे। क्योंकि खुली आँखें, मतलब संसार या दूसरा, मतलब की शरीर, क्योंकि दूसरा शरीर से है। अब शरीर का मतलब अहंकार है और इसलिए , आँखे खुली हुई होना और कुछ नहीं बल्कि स्वयं के अहंकार की पुष्टि और अहंकार का प्रदर्शन मात्र है। अहंकार बेहोशी है और इसलिये बाहर, जो भी आप देखते है, यानि की जो भी गति या मूवमेंट, आपको बाहर दिखाई देता है, वह और कुछ नहीं, बल्कि बेहोशी का प्रदर्शन मात्र है। जो भी यहाँ हो रहा है, वह सब, शरीर द्वारा और शरीर के लिये हो ...